कांग्रेस को आंखें दिखाने वाली ममता के आंसू

गठबंधन की बैठक में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बचाने के लिए दीदी अब कांग्रेस और सोनिया गांधी के दरबार में मदद की गुहार लगा रही हैं। देश की सबसे कद्दावर विपक्षी चेहरा रहीं ममता बनर्जी की हकीकत अब यही है कि ‘इंडिया’ गठबंधन में किंगमेकर या प्रधानमंत्री पद की दावेदार वाली उनकी पुरानी मजबूत स्थिति अब नहीं रही। इसलिए वह इंडिया गठबंधन की शरण में हैं। कांग्रेस बेशक लोकसभा और ज्यादातर राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को टक्कर नहीं दे सकी, किन्तु गठबंधन में कांग्रेस का दबदबा है, इसलिए ममता को लगता है कि सहानुभूति पाकर कांग्रेस से डूबते को तिनका का सहारा मिल सकता है। राजनीति में जमीर को एक तरफ करके सत्ता के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। दरअसल नेताओं में नैतिकता या सिद्धांत बचा नहीं है। ऐसा नहीं है कि सत्ता की राजनीति में आवरण बदलने का काम सिर्फ ममता ने ही किया हो, इससे पहले भाजपा, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने दूसरे दलों से गठबंधन करके और मौका पाकर उनको छिटक कर यह काम किया है…
राजनीति में नेता कब चोला बदल ले, पता नहीं चलता। कांग्रेस को आंखें दिखाने वाली पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब सोनिया गांधी से मिली, उनकी आंखों में आंसू भर आए। यह वाक्या बताता है कि राजनीति में कुछ भी स्थिर नहीं है। दोस्त कब दुश्मन बन जाएं और दुश्मन कब दोस्त, इसका राजनीतिक इतिहास पुराना है। इंडिया गठबंधन की दिल्ली बैठक के दौरान सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की भावुक मुलाकात ने कांग्रेस-टीएमसी के 30 साल पुराने उतार-चढ़ाव वाले संबंधों और बंगाल चुनाव के बाद आई दरारों को फिर से चर्चा में ला दिया। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी अपनी पार्टी में टूट के बीच जब बैठक में पहुंचीं, तो कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आगे बढक़र उन्हें गले लगा लिया। बंद कमरे में अपनी पुरानी सहेली और राजनीतिक साथी को सामने देख ममता बनर्जी के आंसू छलक पड़े।
ममता के ये आंसू दरअसल कांग्रेस के साथ किए गए अपने खराब पुराने बर्ताव या कांग्रेस से अलग होने की गलती के एहसास की वजह से नहीं आए, बल्कि भाजपा द्वारा विधानसभा चुनाव जीत कर सारा दंभ हवा होने से गई सत्ता गंवाने और अपने सांसदों के टूटने की वजह से आए। दरअसल पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने और पार्टी के सांसदों के विद्रोह से ममता के राजनीतिक अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है, जिसकी ममता बनर्जी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। ममता को सोनिया गांधी से मिली ‘जादू की झप्पी’ सिर्फ व्यक्तिगत ढाढस नहीं थी। यह कांग्रेस और टीएमसी के बीच पिछले 3 दशकों से चले आ रहे उतार-चढ़ाव, पुरानी राजनीतिक दरारों और बंगाल में एक-दूसरे के वजूद को मिटाने की खूनी क्रोनोलॉजी का अंतिम और सबसे असहाय पड़ाव था। 1997-98 में ममता बनर्जी ने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व (सोनिया गांधी के उभार के समय) पर वामपंथियों (वाममोर्चा) के खिलाफ ढुलमुल रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस से नाता तोड़ लिया था। ममता ने अलग तृणमूल कांग्रेस पार्टी का गठन किया था। अगले दो दशक में ममता बनर्जी ने वामपंथ के साथ-साथ कांग्रेस को भी बंगाल में शून्य कर दिया। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने बंगाल में कांग्रेस को महज दो सीटों पर ही लोकसभा चुनाव लडऩे की पेशकश की थी, मगर कांग्रेस टीएमसी से 10-12 सीटों की डिमांड कर रही थी। ममता बनर्जी ने कांग्रेस की 10-12 लोकसभा सीटों की मांग को ‘अनुचित’ बताया था और पश्चिम बंगाल में सीट बंटवारे पर चर्चा में देरी के लिए कांग्रेस की आलोचना की थी। ममता ने ‘एकला चलो’ की नीति अपनाते हुए बहरमपुर में यूसुफ पठान को उतारकर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को हरा दिया। इससे दिल्ली का कांग्रेस नेतृत्व अंदर से बेहद आहत था। कांग्रेस पार्टी के पारंपरिक गढ़ों (मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर) को भी पूरी तरह से ममता बनर्जी ने निगल लिया। अधीर रंजन चौधरी जैसे कद्दावर नेताओं को साइडलाइन कर उन्होंने कांग्रेस के वोट बैंक पर अपना एकछत्र राज स्थापित कर लिया था। ममता की राजनीतिक महत्वाकांक्षा इतनी प्रबल हो गई कि पश्चिम बंगाल तक सीमित होने के बावजूद कांग्रेस का नेतृत्व किसी रूप में स्वीकार करने से इंकार कर दिया। इससे भी आगे बढ़ कर इंडिया गठबंधन के नेतृत्व का दावा तक पेश कर दिया था।
इस नेतृत्व का मतलब था गठबंधन की तरफ से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी। ममता बनर्जी ने चुनावों और उपचुनावों में इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर निराशा जाहिर करते हुए कहा था कि वह इसकी कमान संभालने को तैयार हैं। कांग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने तब कहा था कि ‘ममता बनर्जी को ऐसा लगता है पर हमें ऐसा नहीं लगता। चर्चा करेंगे। उनके कहने से उनकी पार्टी चलती है। हम तो कांग्रेस के कहने से चलते हैं।’ केरल में वाम शासन को कांग्रेस के हाथ गंवा चुकी लेफ्ट ने भी कांग्रेस पर सवाल उठाए थे। तब लेफ्ट नेता डी राज्या ने भी कहा था कि कांग्रेस को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। राज्या ने कहा था कि कांग्रेस ने हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों में गठबंधन सहयोगियों को समायोजित नहीं किया। अगर कांग्रेस ने इंडिया ब्लॉक सहयोगियों की बात सुनी होती तो लोकसभा और हरियाणा-महाराष्ट्र में नतीजे अलग होते। बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जब भारतीय जनता पार्टी ने 207 सीटें जीतकर ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया, तो अचानक से पूरी बाजी पलट गई। सत्ता हाथ से जाते ही टीएमसी के भीतर सांसदों और विधायकों में भगदड़ मच गई।
टीएमसी से बगावत करने वाले सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिख कर अलग से सीट देने की मांग की है। इससे पहले टीएमसी के विधायक पश्चिम बंगाल विधानसभा में यह कारनामा कर चुके हैं। इसके बाद ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन की याद आई। गठबंधन की बैठक में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बचाने के लिए दीदी अब कांग्रेस और सोनिया गांधी के दरबार में मदद की गुहार लगा रही हैं। देश की सबसे कद्दावर विपक्षी चेहरा रहीं ममता बनर्जी की हकीकत अब यही है कि ‘इंडिया’ गठबंधन में किंगमेकर या प्रधानमंत्री पद की दावेदार वाली उनकी पुरानी मजबूत स्थिति अब नहीं रही। इसलिए वह इंडिया गठबंधन की शरण में हैं। कांग्रेस बेशक लोकसभा और ज्यादातर राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को टक्कर नहीं दे सकी, किन्तु गठबंधन में कांग्रेस का दबदबा है, इसलिए ममता को लगता है कि सहानुभूति पाकर कांग्रेस से डूबते को तिनका का सहारा मिल सकता है। राजनीति में जमीर को एक तरफ करके सत्ता के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। दरअसल नेताओं में नैतिकता या सिद्धांत बचा नहीं है। ऐसा नहीं है कि सत्ता की राजनीति में आवरण बदलने का काम सिर्फ ममता ने ही किया हो, इससे पहले भाजपा, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने दूसरे दलों से गठबंधन करके और मौका पाकर उनको छिटक कर यह काम किया है।-योगेंद्र योगी




