युद्ध के परिणाम किसी एक देश तक सीमित नहीं रहते

आज की दुनिया गहराई से जुड़ी हुई है। जब एक देश संघर्ष का रास्ता चुनता है, तो उसके परिणाम केवल उसकी अपनी सीमाओं के भीतर नहीं रहते। वे $ईंधन की कीमतों, खाद्य लागत, शिपिंग मार्गों, नौकरियों और मुद्रास्फीति और महंगाई आदि के माध्यम से फैलते हैं। यही कारण है कि कई आम लोगों को लगता है कि जब शक्तिशाली देश युद्ध में जाते हैं तो वे केवल एक-दूसरे से नहीं लड़ रहे होते, वे बाकी दुनिया को उन फैसलों की कीमत चुकाने पर मजबूर कर रहे होते हैं जो उनके कभी थे ही नहीं।
भारत इसका एक अच्छा उदाहरण है। भले ही यह किसी दूर के संघर्ष का हिस्सा न हो लेकिन इसके नागरिक फिर भी दैनिक जीवन में इसका प्रभाव महसूस कर सकते हैं। पैट्रोल के दाम बढ़ जाते हैं, सब्जियां महंगी हो जाती हैं, रसोई गैस महंगी हो जाती है और परिवहन की लागत बढ़ जाती है। एक मध्यमवर्गीय परिवार जो अपने हर रुपए का प्रबंधन सावधानी से करता है, अचानक अपने मासिक बजट को दबाव में पाता है। युद्ध भले ही दूर कहीं हो रहा हो लेकिन उसकी कीमत उनकी रसोई की मेज तक पहुंच जाती है।
यही कारण है कि कई लोग ऐसे संघर्षों को बाकी दुनिया के साथ अन्याय के रूप में देखते हैं। अक्सर युद्ध सत्ता के संघर्ष, क्षेत्रीय विवादों, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं या नेताओं द्वारा समझौता करने से इंकार करने के कारण शुरू होते हैं। कुछ मामलों में व्यावहारिक समझदारी की तुलना में गर्व, प्रतिद्वंद्विता या राष्ट्रीय अहंकार अधिक मजबूत हो जाता है। जब देश यह विश्वास करते हुए कि वे ताकत के बल पर परिणाम बदल सकते हैं, इस तरह के राजनीतिक अहंकार में आकर काम करते हैं तो बोझ केवल उन तक ही सीमित नहीं रहता। यह उन देशों और लोगों तक फैल जाता है जिनकी इस विवाद में कोई आवाज नहीं थी।
रूस और यूक्रेन ने दिखाया है कि कैसे एक क्षेत्रीय युद्ध दुनिया भर में असर डाल सकता है। ऊर्जा की कीमतें बढ़ गईं, अनाज का निर्यात बाधित हो गया और एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप के देशों में महंगाई बढ़ गई। जिन देशों का मूल संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं था, उन्हें भी ईंधन और भोजन के लिए अधिक भुगतान करना पड़ा। यही वैश्विक अन्याय है। आर्थिक नुकसान सांझा हो जाता है, भले ही राजनीतिक निर्णय केवल कुछ ही लोगों द्वारा लिया गया हो।
यही स्थिति तब भी होती है जब तेल उत्पादक क्षेत्रों में तनाव बढ़ता है। प्रमुख शिपिंग लेन के पास संघर्ष तुरंत तेल की आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। चूंकि भारत अपने कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए इसका सीधा असर पड़ता है। डीजल की कीमतें ट्रकिंग, खेती और सार्वजनिक परिवहन को प्रभावित करती हैं। इसका मतलब यह है कि दूध से लेकर दवा तक सब कुछ महंगा हो जाता है। मध्यम वर्ग इसे हर दिन महसूस करता है तथा गरीब इसे और भी अधिक तीव्रता से महसूस करते हैं। मध्यम वर्ग के लिए यह संघर्ष अक्सर शांत होता है क्योंकि वे इतने गरीब नहीं हैं कि कई सहायता योजनाओं के पात्र बन सकें लेकिन इतने अमीर भी नहीं हैं कि बढ़ती लागतों को नजरअंदाज कर सकें। उनकी सैलरी वैसी ही रह सकती है जबकि हर बिल बढ़ जाता है। किराया, स्कूल की फीस, किराना, बिजली और स्वास्थ्य सेवा सब बढ़ जाते हैं। वही पारिवारिक आय हर महीने कम सामान खरीद पाती है। यहीं पर किसी एक खर्च के कारण नहीं बल्कि इसलिए हताशा पैदा होती है कि सब कुछ एक ही समय में थोड़ा और कठिन हो जाता है।
एक नैतिक हताशा भी होती है। दुनिया भर के आम नागरिकों को अक्सर लगता है कि वे सरकारों के घमंड और अहंकार की कीमत चुका रहे हैं। नेता लोग रणनीति संप्रभुता या राष्ट्रीय सुरक्षा की बात कर सकते हैं, लेकिन आम परिवार केवल उसकी लागत का अनुभव करते हैं। जो युद्ध भू राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण शुरू होता है, उसका मतलब यह हो सकता है कि भारत में एक माता-पिता को घरेलू खर्चों में कटौती करनी पड़े या बच्चे की ट्यूशन क्लासों को टालना पड़े। यह संबंध भले ही दूर का लगे लेकिन यह वास्तविक है। यही कारण है कि कई लोग तेजी से यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या शक्तिशाली देश अपने कार्यों के वैश्विक परिणामों पर पूरी तरह विचार करते हैं। एक जुड़ी हुई दुनिया में युद्ध अब कोई स्थानीय घटना नहीं है। यह एक देश में भोजन की कमी पैदा कर सकता है, दूसरे में ईंधन की महंगाई बढ़ा सकता है तथा कहीं और बेरोजगारी ला सकता है। जब सरकारें कूटनीति के सभी रास्ते आजमाए बिना संघर्ष को बढ़ाती हैं तो दुनिया इसकी कीमत चुकाती है।
सोशल मीडिया ने इसे और भी अधिक स्पष्ट बना दिया है। लोग अब देख सकते हैं कि वैश्विक नेताओं के फैसले महाद्वीपों के आम परिवारों को कैसे प्रभावित करते हैं। नागरिक बढ़ती कीमतों, घटती बचत और आर्थिक चिंता की तुलना करते हैं। वे भले ही सार्वजनिक रूप से न बोलें लेकिन वे नोटिस करते हैं कि कितनी जल्दी यह बोझ फैसला लेने वालों के बजाय आम घरों पर आ गिरता है। एक गहरा सच यह भी है। युद्ध अक्सर यह दिखाता है कि वैश्विक तौर पर झेला जाने वाला दुख कितना असमान है। शामिल देशों के पास रणनीतिक भंडार, सैन्य बजट और राजनीतिक प्रभाव हो सकता है, लेकिन शामिल न होने वाले या छोटे देशों को फिर भी आयातित मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ता है। भारत जैसे देशों में परिवार चुपचाप तालमेल बिठाते हैं। कम सामान खरीदना, कम बचत करना और योजनाओं को टालना।
इसका प्रभाव एक दिन में नाटकीय नहीं दिखता लेकिन महीनों में यह दैनिक जीवन को बदल देता है। यही कारण है कि कई लोग वैश्विक संघर्ष को केवल एक सैन्य मुद्दे के रूप में नहीं बल्कि एक विश्वव्यापी आर्थिक अन्याय के रूप में देखते हैं। एक देश का समझौता करने से इंकार करना कहीं और लाखों लोगों के लिए भोजन की लागत बढ़ा सकता है। एक नेता का निर्णय उन परिवारों के लिए रसोई गैस की कीमत बढ़ा सकता है जिन्होंने कभी उस विवादित क्षेत्र का नाम तक नहीं सुना है। अंत में, यह हताशा समझ में आने योग्य है। लोगों को लगता है कि शक्तिशाली देश जब प्रतिद्वंद्विता या अहंकार में आकर काम करते हैं तो वे बाकी दुनिया के साथ अन्याय कर रहे होते हैं। उनका संघर्ष राजनीतिक हो सकता है लेकिन इसके परिणाम बाकी सभी के लिए व्यक्तिगत बन जाते हैं।
भारत का मध्यम वर्ग इसे बहुत स्पष्ट रूप से समझता है। वे टैलीविजन पर युद्ध देख सकते हैं लेकिन वे इसका अनुभव किराना बिल, ईंधन टैंक, स्कूल की फीस और घटती मासिक बचत के माध्यम से करते हैं। यही कारण है कि वैश्विक शांति इतनी गहराई से मायने रखती है क्योंकि आज की दुनिया में कोई भी संघर्ष स्थानीय नहीं रहता। दुनिया इसकी कीमत सांझा करती है, चाहे वह युद्ध के लिए सहमत थी या नहीं। इन सबके ऊपर डर का कारक है, असुरक्षा का स्तर और सरकार तथा जनता द्वारा महसूस की जाने वाली लाचारी की भावना। मीडिया हमें युद्धग्रस्त देशों पर पडऩे वाले विनाशकारी प्रभाव- तबाही, मरते हुए निर्दोष लोग, शरणार्थी शिविरों में बेघर छोड़े गए बच्चे दिखाता है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अक्षम्य है।-देवी एम. चेरियन




