संपादकीय

अराजकता का कूपन

अब इंडिगो ने अपनी अराजकता पर पर्दा डालने के मद्देनजर ‘कूपन’ (वाउचर) बांटने की पेशकश की है। ये कूपन 10,000 रुपए के होंगे और ‘गंभीर रूप से प्रभावित यात्रियों’ को ही दिए जाएंगे। क्या ऐसे यात्रियों की परिभाषा और पात्रता इंडिगो ने स्पष्ट की है? क्या सरकारी तंत्र भी 9 लाख से अधिक यात्रियों की परेशानी और नुकसान की कीमत की भरपाई इस कूपन को स्वीकार कर रहा है? क्या अदालत इस कूपन को मान्यता देगी? फिलहाल मौखिक बयान आ रहे हैं कि ये कूपन मुआवजे से अतिरिक्त होंगे। यात्री अगले 12 माह तक इंडिगो की किसी भी यात्रा में इन कूपन का उपयोग कर सकेंगे, लेकिन इंडिगो ने डीजीसीए के नियमानुसार अभी तक मुआवजा नीति को अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं किया है। यह अनिवार्य नियम है। सरकारी निर्देश ये भी हैं कि मुआवजा नकद, बैंक ट्रांसफर अथवा यात्री की सहमति पर ही कूपन के रूप में दिया जा सकता है। एकतरफा कूपन की पेशकश नियमानुसार नहीं है। बहरहाल देश ने टीवी चैनलों पर एक चित्र देखा होगा, जिसमें इंडिगो के सीईओ पीटर एल्बर्स हाथ जोड़े केंद्रीय नागर विमानन मंत्री राममोहन नायडू के पास बैठे हैं, मानो देश से माफी मांग रहे हों! देश ऐसे माफ नहीं करेगा। इंडिगो ने उड़ानों में 10 फीसदी की कटौती का शैड्यूल सरकारी तंत्र के सामने रखा है, लेकिन गुरुवार, 11 दिसंबर, को दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु की 220 उड़ानें भी कंपनी ने रद्द की हैं। ऐसा क्यों किया गया? क्या यह पूर्वघोषित था? नतीजा यह रहा कि यात्रियों को एक बार फिर तकलीफ, परेशानी उठानी पड़ी। इंडिगो की कार्य-प्रणाली और गवर्नेंस मॉडल की जांच सेबी और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने भी शुरू कर दी है। इंडिगो का संचालन मॉडल ही संदेह के घेरे में माना जा रहा है। सेबी का बयान आया है कि सूचीबद्ध कंपनियों को नोटिस जैसी संवेदनशील जानकारी स्टॉक एक्सचेंज को देनी होती है। इंडिगो को डीजीसीए ने ही दो गंभीर नोटिस जारी कर रखे हैं। चार सदस्यीय समिति ने भी कंपनी के सीईओ से सवाल-जवाब किए हैं। इंडिगो के मुख्यालय में डीजीसीए की निगरानी टीम तैनात कर दी गई है, जिसमें तकनीकी अधिकारी भी हैं, लेकिन सरकार ने अभी तक न तो कोई जुर्माना थोपा है और न ही कोई अन्य दंड दिया है, बल्कि गुरुवार को नागरिक उड्डयन मंत्रालय की ओर से संसद को बताया गया कि इंडिगो ने 2024-25 में कुल 7253 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया, जबकि अन्य विमानन कंपनियां घाटे में रहीं। सरकार को इस पहलू की भी चिंता करनी पड़ेगी कि विमानन कंपनियां घाटे में क्यों हैं?

क्या इंडिगो उनकी उड़ानों पर कब्जा करके मुनाफा कमा रही है? यही कारण हो सकता है कि इंडिगो का विमानन क्षेत्र में एकाधिकार है। क्या इससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित नहीं होती? जब इंडिगो के कारण देश के लाखों यात्री बंधक की स्थिति में थे, तो दूसरी कंपनियों ने खूब कालाबाजारी की। यह सवाल दिल्ली उच्च न्यायालय में भी उठा कि विमानन कंपनियों ने सरकार द्वारा किराया तय करने, फ्रीज करने के बावजूद 80-90 हजार रुपए तक का किराया कैसे वसूल किया? उच्च न्यायालय का निर्देश है कि लूट की यह रकम यात्रियों को वापस की जाए। भारत कोई ‘केला गणतंत्र’ देश नहीं है कि मनमर्जी के किराए वसूले जाएंगे और इंडिगो जैसी कंपनियां सरकार के आदेशों को मानने से इंकार कर देंगी। इंडिगो ने यह नहीं बताया है कि कितनी देरी, मिस्ड कनेक्शन अथवा रात भर फंसे यात्रियों को स्वत: ही कूपन का पात्र मान लिया जाएगा। एक अनुमान बताया जा रहा है कि 5000 से अधिक उड़ानें रद्द की गईं, लिहाजा करीब 5 लाख यात्रियों को ‘गंभीर रूप से प्रभावित’ मानना चाहिए। यह तो इंडिगो स्पष्ट करेगी। बहरहाल यह आर्थिक अराजकता भी है और सार्वजनिक सेवा में एकाधिकार का दुरुपयोग भी है, लिहाजा सभी विमानन कंपनियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है। यह दायित्व भारत सरकार का ही है। सवाल यह है कि जब नए नियम सभी एयरलाइन कंपनियों पर लागू होते हैं, पर इसका सबसे ज्यादा असर इंडिगो पर ही क्यों दिखा? इसका जवाब है कि इंडिगो के पास पायलटों की कमी हो गई है। इंडिगो ने जानबूझ कर यह कमी की। अन्य एयरलाइंस कंपनियों की तरह इंडिगो के पास भी नए पायलटों की भर्ती के लिए पर्याप्त समय था, किन्तु कंपनी ने भारी आर्थिक भार को टालने के लिए भर्ती नहीं की।

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