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ईरान में इंदिरा गांधी की तरह उलझते दिखे डोनाल्ड ट्रंप, धड़ाधड़ चल रही मीटिंग, लेकिन सेना के जवाब से राष्ट्रपति हैरान

Iran Protest US Army: ईरान में जारी सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों की मदद का मन बना लिया है. अमेरिका सैन्य कार्रवाई, साइबर अटैक और इंटरनेट सपोर्ट जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है. इजरायल ने सार्वजनिक दखल से दूरी बनाई है. वहीं अमेरिकी सांसद और सेना इस कदम के जोखिमों को लेकर बंटे हुए नजर आ रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां खुले तौर पर ईरानी प्रदर्शनकारियों के समर्थन और कार्रवाई के संकेत दे रहे हैं, वहीं अमेरिका की सेना में इस पर गंभीर मंथन चल रहा है. सवाल यह नहीं है कि अमेरिका कदम उठाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि कब और किस हद तक. इसी बीच ट्रंप को अमेरिकी सेना ने वही जवाब दिया है जो कभी सैम मानेकशॉ ने इंदिरा गांधी को कहा था. ये घटना इतिहास के उसे चर्चित मोड़ की याद दिलाता है, जिससे बांग्लादेश बना. अब शिया देश में भी  यरुशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों की मदद करने का मन बना लिया है. हालांकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि यह मदद किस रूप में होगी और कब दी जाएगी. सूत्रों के अनुसार ट्रंप प्रशासन के भीतर बीते कुछ दिनों से लगातार बैठकों का दौर चल रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने मूल रूप से यह फैसला कर लिया है कि अमेरिका ईरानी प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ा होगा, लेकिन तरीका और समय अभी तय नहीं है.

ईरान में अमेरिका क्या-क्या कर सकता है?

शनिवार को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान आजादी की ओर देख रहा है और अमेरिका मदद के लिए तैयार है. इसके बाद अमेरिका में चर्चाएं तेज हो गईं. इन चर्चाओं में कई विकल्प रखे गए हैं, जिनमें सीधे सैन्य हमले से लेकर साइबर अटैक, इंटरनेट सपोर्ट और स्टारलिंक जैसी सैटेलाइट सेवाएं उपलब्ध कराने तक के सुझाव शामिल हैं. सूत्रों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन यह नहीं मानता कि ईरानी शासन तुरंत खत्म होने वाला है, लेकिन यह जरूर माना जा रहा है कि बीते एक हफ्ते में अमेरिका को ऐसी दरारें नजर आई हैं जो पहले नहीं दिखती थीं. इंटरनेट ब्लैकआउट, प्रदर्शनकारियों की भारी संख्या और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई ने अमेरिका को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है.

क्या ईरान से सीधा भिड़ेगा इजरायल?

रिपोर्ट के मुताबिक ईरान की ओर से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई में करीब 500 से ज्यादा लोगों की मौत की खबरों ने भी ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ाया है. इससे पहले अमेरिका को नहीं लगता था कि प्रदर्शन उस स्तर तक पहुंच गए हैं, जहां सरकार घबरा जाए. इसी बीच इजरायल ने भी ईरान की स्थिति पर हाई लेवल मीटिंग की है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मंत्रियों और सुरक्षा अधिकारियों के साथ बैठक कर फैसला लिया कि इजरायल सार्वजनिक तौर पर दखल नहीं देगा और अमेरिका को आगे बढ़ने देगा. साथ ही यह भी तय किया गया कि अगर ईरान ध्यान भटकाने के लिए मिसाइल हमला करता है तो पूरी तैयारी रखी जाएगी.

ब्रिटिश न्यूज आउटलेट द टेलीग्राफ की रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने ट्रंप के ईरान पर हमले के प्लान पर वही जवाब दिया है, जो सैम मानेकशॉ ने पूर्वी पाकिस्तान में हमले से पहले दिवंगत पीएम इंदिरा गांधी को दिया था. दरअसल 1971 में भारत-पाकिस्तान की जंग हुई थी. लेकिन उससे पहले पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में हाल खराब थे. इंदिरा गांधी चाहती थीं कि मार्च में ही पूर्वी पाकिस्तान पर हमला किया जाए, तब जनरल सैम मानेकशॉ ने जवाब दिया था कि सेना तैयार नहीं है और उन्हें अभी अतिरिक्त समय चाहिए. बाद में जब भारत ने हस्तक्षेप किया तो बांग्लादेश एक आजाद देश बनकर उभरा. रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप भी चाहते हैं कि ईरान में जल्द से जल्द अमेरिका की कार्रवाई हो. रिपोर्ट के मुताबिक यूएस आर्मी ने ट्रंप को आगाह किया गया है कि यह जल्दबाजी होगी और ईरान पर किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले और समय चाहिए. सैन्य कमांडरों का कहना है कि अमेरिकी ठिकानों और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किए बिना हमला ईरान की जवाबी कार्रवाई को न्योता दे सकता है, जो भारी नुकसान का कारण बनेगी.

ट्रंप को कथित तौर पर तेहरान में गैर सैन्य ठिकानों और सुरक्षा एजेंसियों के नेताओं को निशाना बनाने जैसे विकल्पों पर भी ब्रीफ किया गया है. हालांकि अमेरिका के भीतर ही इस पर मतभेद हैं. कुछ सांसदों का मानना है कि सैन्य कार्रवाई उल्टा असर डाल सकती है और ईरानी जनता को सरकार के पक्ष में खड़ा कर सकती है. वहीं कुछ नेता चाहते हैं कि ट्रंप खुलकर प्रदर्शनकारियों को मजबूत करें और शासन को डराएं. ईरान ने साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा.

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