उच्च शिक्षा का काला सच

हजारों योग्य नेट-पीएचडी धारक शिक्षक 15 से 20 हजार रुपए के मानदेय पर ठेके पर पढ़ाने को मजबूर हैं। जिस शिक्षक के पास खुद का भविष्य सुरक्षित नहीं है, वह छात्रों के भविष्य का निर्माण कैसे करेगा? फर्जी जर्नल्स और कट-कॉपी-पेस्ट रिसर्च हो रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पेटेंट और मौलिक शोध में योगदान बेहद कम है। अकादमिक तरक्की पाने के लिए पेड जर्नल्स में नकली शोध पत्र छपवाने का एक पूरा रैकेट फल-फूल रहा है…
देश में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि चिंता का कारण है। आज से 40-50 साल पहले व्यवसायी का बच्चा 10-12 क्लास पढ़ कर व्यापार में लग जाता था और कुछ लोगों को नौकरी भी देता था। आज उनके बच्चे भी नौकरी देने के बजाय उच्च शिक्षा प्राप्त कर नौकरी की लाइन में खड़े हो गए हैं। इधर पढऩे के बाद सबको आराम की नौकरी चाहिए। इसीलिए ज्यादा से ज्यादा लोग सरकारी नौकरी खोजते हैं। शिक्षित युवा छोटा काम करने से गुरेज करते हैं। जब यह मानसिकता हावी रहेगी तो बेरोजगारी बढ़ेगी ही बढ़ेगी। इसके लिए हमारा उच्च शिक्षा का सिस्टम भी जिम्मेवार है। आईये, इस सिस्टम की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पड़ताल करें। हमेशा से भारतीय समाज में शिक्षा को सदियों से बौद्धिक उत्थान का माध्यम माना गया था। आधुनिक दौर में इसका स्थान आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा की गारंटी ने ले लिया है। बचपन में जब कोई बच्चा पहली बार स्कूल जाता है, तो परिवार और समाज मिलकर उसके दिल और दिमाग में एक ही विचार ठोकते जाते हैं कि बस बारहवीं पास कर लो, फिर जीवन संवर जाएगा। बारहवीं के बाद यह वादा ग्रेजुएशन और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन तक खिसक जाता है। माता-पिता अपनी जीवनभर की जमा पूंजी, जमीन-जायदाद या पेंशन का पैसा दांव पर लगाकर संतान को हायर एजुकेशन की अंधी दौड़ में झोंक देते हैं। वर्षों की मेहनत और लाखों के खर्च के बाद जब यह युवा डिग्री लेकर बाजार में खड़ा होता है, तो जीवन की हकीकत का काला सच उसके सारे भ्रम तोड़ देता है। तब अहसास होता है कि जिस व्यवस्था को छात्र अच्छा भविष्य समझ रहा था, वह असल में उसकी उम्मीदों का शमशान साबित हुई। आज उच्च शिक्षा रूपी उद्योग हर साल लाखों की तादाद में इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए, वकील और आट्र्स-साइंस ग्रेजुएट्स तैयार करने वाली एक विशाल डिग्री फैक्टरी बन चुका है। लेकिन इस संख्यात्मक विकास के पीछे गुणात्मक पतन का एक भयावह सच छिपा है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रोजगार सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि देश के लगभग 50 प्रतिशत से अधिक ग्रेजुएट सीधे तौर पर उद्योग की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं।
इसको कौन ठीक करेगा? विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम आज की तकनीकी क्रांति (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, ऑटोमेशन) से कोसों दूर दशकों पुराने ढर्रे पर चल रहा है। कॉलेज कक्षाओं में छात्रों को कुछ नया करना या समस्या समाधान नहीं सिखाया जाता, बल्कि केवल परीक्षा पास करने के लिए सिद्धांतों को रटने की कला सिखाई जाती है। नतीजा यह है कि हाथ में प्रथम श्रेणी की डिग्री होने के बावजूद युवा एक साधारण फॉर्म भरने या ईमेल ड्राफ्ट करने में असहज महसूस करते हैं। इसके लिए कौन जिम्मेवार है? हायर एजुकेशन का प्रवेश द्वार अब एक बहु-अरब डॉलर के कोचिंग उद्योग से होकर गुजरता है। कोटा, दिल्ली, पटना, हैदराबाद और इंदौर जैसे अनेक शहर अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि फैक्टरियों में तब्दील हो चुके हैं। 13-14 साल के बच्चों को स्कूल छोडक़र 14-16 घंटे कोचिंग और टेस्ट सीरीज के अंतहीन भंवर में डाल दिया जाता है। नीट से पैदा हुई परेशानियों को कौन भूल सकता है। होर्डिंग्स पर चमकते टॉपर्स के चेहरों के पीछे उन लाखों गुमनाम छात्रों की चीखें दब जाती हैं जो अफलता के डर, एकाकीपन और परिवार की भारी अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाते हैं। हर साल आने वाली छात्रों की आत्महत्याओं और डिप्रेशन की खबरें इस बात का प्रमाण हैं कि यह व्यवस्था युवाओं को भविष्य देने के बजाय उनका वर्तमान छीन रही है। इसे कौन ठीक करेगा? शिक्षा का यह बाजारीकरण मध्यमवर्गीय परिवारों की जेब और युवाओं की मानसिक शांति दोनों को खाली कर रहा है। पिछले दो दशकों में निजी शिक्षण संस्थानों की जो बाढ़ आई है, उसने शिक्षा को एक शुद्ध मुनाफा कमाने वाले व्यवसाय में बदल दिया है। संगमरमर से सजे परिसर, एसी क्लासरूम, गोल्फ कोर्स और स्विमिंग पूल दिखाकर लाखों रुपए की फीस वसूली जाती है।
लेकिन जब बात फैकल्टी और लैब की गुणवत्ता की आती है, तो ये संस्थान पूरी तरह खोखले साबित होते हैं। अनेक अध्यापकों को अनेक जगह पर मजदूर से कम अदायगी हो रही है। न्यूनतम उपस्थिति और बिना किसी बौद्धिक मशक्कत के ग्रेड्स बांटे जाते हैं ताकि अगले साल के दाखिलों के लिए आकर्षक ब्रोशर तैयार किए जा सकें। शिक्षा के इस व्यवसायीकरण ने एक गहरी सामाजिक खाई पैदा कर दी है। जहां धनाढ्य वर्ग का औसत छात्र मोटी फीस देकर मैनेजमेंट कोटा से डिग्री हासिल कर लेता है, वहीं प्रतिभाशाली गरीब छात्र फीस के अभाव में प्रवेश से वंचित रह जाता है। मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवन की सारी सुरक्षा त्यागकर बच्चों की उच्च शिक्षा में निवेश करते हैं। इसे वे अपने भविष्य की सबसे सुरक्षित एफडी मानते हैं। लेकिन इसका रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट बेहद निराशाजनक है। जब 20 लाख रुपए का एजुकेशन लोन लेकर पढ़ाई पूरी करने वाले युवा को 15000 रुपए की नौकरी मिलती है, तो वह लोन की किस्त चुकाने में ही असमर्थ हो जाता है। चपरासी या नगर निगम की सफाई कर्मचारी भर्ती में जब पीएचडी और एम. टेक पास युवा कतार में खड़े दिखते हैं, तो यह केवल बेरोजगारी का संकट नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था के दिवालियापन का प्रमाण है। इसके लिए कौन जिम्मेवार है। किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की रीढ़ उसके शिक्षक और शोध की संस्कृति होती है।
भारत की अधिकांश यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में यह रीढ़ ही टूटी हुई है। हजारों योग्य नेट-पीएचडी धारक शिक्षक 15 से 20 हजार रुपए के मानदेय पर ठेके पर पढ़ाने को मजबूर हैं। जिस शिक्षक के पास खुद का भविष्य सुरक्षित नहीं है, वह छात्रों के भविष्य का निर्माण कैसे करेगा? फर्जी जर्नल्स और कट-कॉपी-पेस्ट रिसर्च हो रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पेटेंट और मौलिक शोध में योगदान बेहद कम है। अकादमिक तरक्की पाने के लिए पेड जर्नल्स में नकली शोध पत्र छपवाने का एक पूरा रैकेट फल-फूल रहा है। अनेक राज्यों में उच्च शिक्षा का पूरा सिस्टम ही लीपापोती का शिकार हो चुका है। इस निराशाजनक दलदल से बाहर निकलने के लिए केवल नारों की नहीं, बल्कि बुनियादी और कठोर सुधारों की जरूरत है। कौशल-आधारित शिक्षा की आवश्यकता है। समाज को यह समझना होगा कि हर किसी के लिए परंपरागत कॉलेज डिग्री जरूरी नहीं है। कारपेंट्री, प्लंबिंग, डिजाइनिंग, कोडिंग और नर्सिंग जैसे वोकेशनल ट्रेड्स को सामाजिक प्रतिष्ठा और बेहतर आर्थिक विकल्प के रूप में स्थापित करना होगा। डिग्री केवल कागज का एक टुकड़ा है, यदि उसके पीछे ज्ञान, कौशल और आत्मनिर्भरता की ताकत न हो। यदि हमने तुरंत अपनी उच्च शिक्षा की दिशा और दशा को नहीं बदला, तो यह डिग्रियों का समुंदर देश के जनसांख्यिकीय लाभांश को एक जनसांख्यिकीय आपदा में बदल देगा। शिक्षा को बाजार के चंगुल से छुड़ाकर वापस ज्ञान और सशक्तीकरण का माध्यम बनाना आज के समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता है। लेकिन इसे कौन करेगा?-डा. वरिंद्र भाटिया




