अदृश्य डकैती : कैसे बैंक कर्मचारी जमाकर्ताओं से धोखा करते हैं

एक अनिवासी भारतीय (एन.आर.आई.) ग्राहक, जो 2 साल बाद अपनी होम-ब्रांच में आई थी, ने कुछ असामान्य बात नोटिस की… उसकी एक टर्म डिपॉजिट (सावधि जमा) पर लियन मार्क (बंधक) लगा हुआ था, एक ऐसी जमा राशि, जिसे उसने कभी किसी ऋण के लिए बंधक नहीं रखा था। उसने इस बैंक से कभी कर्ज नहीं लिया था। एक बार भी नहीं।
लियन एक कानूनी अधिकार या दावा है, जो कोई बैंक या लेनदार किसी ग्राहक के धन, संपत्ति या परिसंपत्तियों पर रखता है, ताकि ऋण या वित्तीय दायित्व के भुगतान को सुरक्षित किया जा सके। जब किसी बैंक खाते पर लियन लगा दिया जाता है, तो खाते की शेष राशि का एक विशिष्ट हिस्सा अस्थायी रूप से ब्लॉक या फ्रीज कर दिया जाता है। ग्राहक खाते में कुल राशि देख सकता है लेकिन उस लॉक की गई राशि को निकाल, ट्रांसफर या खर्च नहीं कर सकता। इसके बाद जो हुआ, वह केवल एक धोखाधड़ी का पर्दाफाश ही नहीं था, बल्कि एक अंतर-बैंक सिंडिकेट का भंडाफोड़ था-मिलीभगत करने वाले कर्मचारियों, जाली दस्तावेजों, काल्पनिक ऋणों और रीयल एस्टेट सौदों का एक सावधानीपूर्वक बुना गया जाल। यह ढांचा उन लोगों के फिक्स्ड डिपॉजिट की मूक चोरी पर बनाया गया है जो इसका पता लगाने में सबसे कम सक्षम हैं-एन.आर.आई., जो वर्षों तक बाहर रहते हैं और बुजुर्ग नागरिक, जो डिजिटल बैंकिंग से बहुत परिचित नहीं हैं।
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी द्वारा 2026 की शुरुआत में राज्यसभा में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि बैंक कर्मचारियों से जुड़े धोखाधड़ी के मामले वित्त वर्ष 25 में 1,935 रहे, जो वित्त वर्ष 21 के 2,624 से कम हैं। वित्त वर्ष 26 की पहली छमाही में ऐसे मामलों की संख्या घटकर 400 पर आ गई। भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) के आंकड़ों का हवाला देते हुए आई.आई.एम. बेंगलुरु का एक शोध पत्र कहता है कि लगभग 34 प्रतिशत बैंकिंग धोखाधडिय़ां आंतरिक होती हैं, जिनका श्रेय जूनियर और मिड-लैवल के कर्मचारियों को जाता है, जो बैंकों की अखंडता, विश्वसनीयता, अस्तित्व और प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता है।
आइए वापस एन.आर.आई. के मामले पर आते हैं। पहले चरण में, सिस्टम तक पहुंच रखने वाला एक बैंक कर्मचारी जाली दस्तावेजों का उपयोग करके एन.आर.आई. की टर्म डिपॉजिट पर लोन बना देता है। मूल टर्म डिपॉजिट रसीद कभी डिस्चार्ज नहीं की जाती। सिस्टम में लियन मार्क मौजूद रहता है लेकिन एन.आर.आई. ग्राहक को इसकी जानकारी नहीं होती। दूसरे चरण में, हम एक अंतर-शाखा बचाव खेल देखते हैं। एन.आर.आई. के वापस लौटने से पहले, दूसरी शाखा में एक और लोन लिया जाता है… इस बार, किसी अन्य जमाकत्र्ता को निशाना बनाया जाता है और उस राशि का उपयोग पहले लोन को बंद करने के लिए किया जाता है। लियन हटा लिया जाता है। सबूत मिटा दिए जाते हैं और दूसरे खाते से नई चैक बुक जारी कर दी जाती है, वह भी जमाकत्र्ता की जानकारी के बिना।
तीसरे चरण में, सिंडिकेट सामने आता है। जब एक आंतरिक जांच (एक शिकायत से शुरू हुई) आखिरकार पैसे के लेन-देन के निशान को ट्रैक करती है, तो पता चलता है कि एक दुष्ट कर्मचारी अकेले काम नहीं कर रहा। यह एक ही शहर के कई बैंकों के कर्मचारियों का एक गिरोह है, जो एक-दूसरे के ट्रैक को छुपाने के लिए धोखाधड़ी वाले ऋणों को रोटेट करते रहते हैं। इस राशि का उपयोग आमतौर पर संपत्ति के सौदों के लिए किया जाता है। जब भी कोई उत्सुक ग्राहक सवाल पूछता है, तो पिछली कडिय़ों को बंद करने के लिए किसी दूसरे बैंक से एक नया लोन आ जाता है। ऐसी ‘योजनाएं’ बैंकिंग के उस भरोसेमंद ढांचे का फायदा उठाती हैं, जहां शाखा कर्मचारियों को बिना किसी उचित रीयल-टाइम निगरानी के जमा राशि को नवीनीकृत करने, ग्राहकों (एन.आर.आई. या अन्य) की सहायता करने और बुजुर्ग खाताधारकों के कागजी काम को संभालने का अधिकार होता है। मैं कहानी नहीं गढ़ रहा। हाल के वर्षों में भारतीय बैंकों में यह सब घटित हुआ और दर्ज किया गया है।
चेन्नई, 2025 : सैंट्रल क्राइम ब्रांच, जो कि एक विशेष, शहर-स्तरीय पुलिस विंग है और जटिल, संगठित व हाई-प्रोफाइल अपराधों की जांच के लिए जिम्मेदार है, ने धोखाधड़ी, गबन और अनधिकृत निकासी से जुड़े 18 मामलों के संबंध में 49 बैंक कर्मचारियों को गिरफ्तार किया। आरोपियों में क्लर्क, कैशियर और मैनेजर शामिल थे। जांचकत्र्ताओं ने पाया कि बैंक कर्मचारियों ने सुनियोजित तरीके से एन.आर.आई. फिक्स्ड डिपॉजिट को निशाना बनाया था, जिसमें जाली हस्ताक्षरों और कैश वाऊचरों का उपयोग करके विभिन्न एन.आर.आई. खातों से 8 करोड़ रुपए हड़प लिए गए थे। एक मामले में, एक बड़े नए निजी बैंक का शाखा प्रबंधक जाली दस्तावेज बनाकर एन.आर.आई. निवेश से 7.5 करोड़ रुपए चुराने के बाद देश छोड़कर भाग गया। इसके बाद उसके खिलाफ रैड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया।
मोहाली, 2025 : एक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के शाखा प्रबंधक पर एक सेवानिवृत्त शिक्षिका के फिक्स्ड डिपॉजिट पर 93 लाख रुपए का ऋण लेने का मामला दर्ज किया गया। धोखाधड़ी का तब पता चला जब पीड़िता ने अनधिकृत ऋण लिए जाने के 6 महीने बाद नियमित रूप से शाखा का दौरा किया। ऐसे और भी कई मामले हैं।ऐसी धोखाधड़ी का पता चलने पर क्या होता है? बैंक कर्मचारियों के जेल में सडऩे के मामले सामने आए हैं लेकिन कोई भी इस पैटर्न को नजरअंदाज नहीं कर सकता-धोखाधड़ी का पता चलना आकस्मिक है, वसूली अधूरी है और जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है-अक्सर इसलिए क्योंकि बैंक संस्थागत प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए आपराधिक मुकद्दमेबाजी की बजाय चुपचाप समझौते को प्राथमिकता देते हैं।-तमाल बंधोपाध्याय




