संपादकीय

एआई के ‘प्रणेता’ और ‘चोर’…

एआई के महाकुंभ में कुछ भारतीय ‘प्रणेताओं’ की खूब चर्चा है। उनके अनुसंधान और नवाचार समाजपरक, व्यावहारिक, शिक्षक, भाषाविद, वैज्ञानिक आदि की श्रेणियों में हैं, लिहाजा प्रशंसा और पुरस्कार दोनों मिल रहे हैं। भारतीय स्टार्टअप ‘सर्वम एआई’ ने एक साथ 11 एआई प्लेटफॉर्म पेश कर पूरी दुनिया को चौंका दिया है। सर्वम केज (चश्मा), बिक्रम, सारस, बुलबुल, सर्वम डब, सर्वम विजन, संवाद, आर्या, सर्वम एज, सर्वम 105बी (सुपर स्मार्ट मॉडल) और सर्वम 30बी वे प्लेटफॉर्म हैं, जिनसे साधारण फीचर फोन पर कॉल के जरिए एआई की सेवाएं ली जा सकती हैं। ऐसा भी एआई है, जो इंटरनेट के बिना भी फोन पर चलेगा। दरअसल मनुष्य के भीतर जो चेतना होती है अथवा उसके अवचेतन में जो मौजूद रहता है या मस्तिष्क शेष शरीर को संचालित करता है, दिशा दिखाता है, ये एआई प्लेटफॉर्म भी लगभग उसी भूमिका में हैं। अर्थात् यह भी साबित हो रहा है कि एआई मानवोपयोगी है, उसका सहायक है। बेशक नई प्रौद्योगिकी के कारण आईटी कंपनियों में हलचल है और बड़े स्तर पर कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है, लेकिन आईटी में ही एक निश्चित समय के बाद उछाल लौट कर आएगा। फिर एआई और आईटी समन्वित रूप से दुनिया पर राज करेंगे। एआई के इन अनुसंधानों और उपलब्धियों की ही चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन सुर्खियों में नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी है, जिसने न केवल भारत की छवि को कलंकित किया है, बल्कि नवाचार के नाम पर ‘चोर’ साबित हुई है। गलगोटिया से सिर्फ स्टॉल ही खाली नहीं कराना चाहिए था, बल्कि उसके खिलाफ ‘बौद्धिक चोरी’ का केस दर्ज करा, दोषी व्यक्ति को, जेल भिजवाना चाहिए था। गलगोटिया ने अपने बूथ पर प्रदर्शित ‘रोबोटिक डॉग’ को ‘इन-हाउस इनोवेशन’ बताया था, जो बाद में चीन का उत्पाद साबित हुआ। गलगोटिया द्वारा घोषित ‘ड्रोन सॉकर’ भी दक्षिण कोरिया का निकला। यह कोई स्कूली प्रदर्शनी नहीं है, अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन है, जिसका आयोजन भारत अपनी राजधानी दिल्ली में कर रहा है।

गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई कहते हैं कि भारत एआई के साथ दुनिया में एक असाधारण मुकाम हासिल करेगा। एआई हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘प्लेटफॉर्म शिफ्ट’ (तकनीकी बदलाव) है और भारत ‘फुल-स्टैक प्लेयर’ बनने की स्थिति में है। मेटा के एआई प्रमुख एलेक्जेंडर वैंग ने माना है कि भारत एआई के क्षेत्र में बहुत ही सकारात्मक केस स्टडी है। उसमें ‘वैश्विक पॉवरहाउस’ बनने की पूरी क्षमता है, लेकिन गलगोटिया सरीखे कलंक और ‘तकनीकी चोर’ सामने आए हैं, तो इसमें आयोजकों की निगरानी, जांच-पड़ताल भी सवालिया है, छिद्रपूर्ण है। दरअसल यह कोई पुराना, धार्मिक मेला नहीं है। यह राष्ट्राध्यक्षों, प्रौद्योगिकी के शीर्ष नेतृत्व, वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की निगाहों का मेला है। दिल्ली में पहले दिन ही अराजकता, अस्त-व्यस्त भीड़ दिखी। यह भारत की फजीहत की शुरुआत थी। लोगों ने सभा-स्थलों में प्रवेश करने को धक्के दिए, संघर्ष किए, क्योंकि व्यवस्था दुरुस्त नहीं थी। पंजीकरण प्रणाली और डिजिटल भुगतान को लेकर शिकायतें सामने आईं। हमारे पास स्वर्णिम अवसर था कि हम दुनिया को दिखा सकते थे कि भारत प्रथम दर्जे का, तकनीकी रूप से सम्पन्न आयोजक है। यह पश्चिम को यूपीआई की ताकत, कुशलता, सुगमता दिखाने का भी मौका था, लेकिन दूसरे ही दिन चीन के ‘रोबोडॉग चोरी’ के मामले ने आयोजकों की मिट्टी पलीद कर दी। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को माफी मांगनी पड़ी। बहरहाल भारत अभी एआई के शीर्ष दावेदारों में शामिल नहीं है। हमारे यहां करीब 150 डाटा केंद्र हैं, जबकि अमरीका में 5100 से अधिक केंद्र हैं। स्टैनफोर्ड ग्लोबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंडेक्स 2025 के मुताबिक, भारत ‘एआई वाइब्रेंसी’ में दुनिया में तीसरे स्थान पर है, लेकिन 0.49 के स्कोर के साथ भारत 174 देशों में 72वें स्थान पर है, जबकि चीन 31वें स्थान पर है। डाटा केंद्रों की सूची में भारत 14वें स्थान पर है। भारत एक संदर्भ में 47वें स्थान पर भी है और उसे ‘उभरती अर्थव्यवस्था’ की श्रेणी में रखा गया है। भारत में 17 वर्षीय प्रणेत खेतान, आदित्य भंडारी और मान्या चतुर्वेदी सरीखे ‘प्रणेताओं’ की जरूरत है।

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