एआई से तस्वीरें बनाना मुफ्त नहीं, इसकी कीमत चुका रही है धरती और निजता

मनुष्य के लिए तकनीक अब एक जरूरी साधन बन गई है। वह कल्पनाओं में नए रंग भर रही है और वर्तमान से भविष्य तक की अनेक योजनाओं को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और अब कृत्रिम मेधा यानी एआइ ने तकनीक को ऐसे-ऐसे मंच प्रदान किए हैं, जिनके जरिए एक आम इंसान अपने सपनों को हकीकत में बदलने की कोशिश करता है।
इसका उदाहरण हाल में एआइ की मदद से आभासी दुनिया में अस्सी के दशक की अपनी तस्वीरें तैयार करने और उन्हें प्रचारित करने को लेकर मची होड़ है। यह रुझान हमें एक नई डिजिटल तकनीक से रूबरू होने का मौका दे रहा है, जिससे लोग बिना खर्च किए अपनी पुरानी यादों में लौट सकते हैं। मगर अहम सवाल यह है कि क्या सच में यह सुविधा मुफ्त है या इसकी कोई लागत नहीं है? क्या इस तकनीक से मनुष्य और धरती को कोई खतरा नहीं है?
दरअसल, सोशल मीडिया पर प्रचारित हो रहे इस तकनीकी प्रबंध का काम यह है कि इसमें लोग अपनी किसी मौजूदा तस्वीर को एआइ की मदद से पलभर में ऐसी छवि में बदल सकते हैं, मानो वह तस्वीर किसी पुराने फोटो स्टूडियो में खिंचाई गई हो। यह तरकीब लोगों को उस दौर में ले जाती है, जिसमें वे कभी रहे थे। मगर सवाल इन तस्वीरों में नहीं, बल्कि उनके पीछे की प्रक्रिया में हैं। स्क्रीन पर लगभग मुफ्त दिखने वाली इस सुविधा के निर्माण में दुनिया में कहीं कोई मशीन काम करती है, इसके लिए बिजली खर्च होती है, सर्वर को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल होता है और इस पूरी प्रक्रिया के संचालन में और भी कई तरह के संसाधनों का उपयोग होता है। डिजिटल दुनिया में ‘अमूर्त’ दिखने वाली चीजें भी भौतिक संसाधनों से बनती और संचालित होती हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या एआइ हमें डिजिटल उपभोग की ऐसी दुनिया में ले जा रहा है, जहां उपयोगकर्ता को उसकी कीमत का एहसास नहीं होता?
पिछली यानी बीसवीं सदी में उपभोग को पहचानना आसान था। पेट्रोल-डीजल से गाड़ी चलती थी, तो ईंधन खर्च, एयर कंडीशनर चलने पर बिजली खर्च और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के इस्तेमाल के पर्यावरणीय प्रभाव सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनते थे। इसी से ‘कार्बन उत्सर्जन’ और ‘टिकाऊ उपभोग’ जैसी अवधारणाएं आईं। मगर इक्कीसवीं सदी के डिजिटल उपभोग ने इस संबंध को लगभग अदृश्य कर रखा है। हम गूगल पर सर्च करते हैं, क्लाउड में हजारों तस्वीरें रखते हैं, वीडियो स्ट्रीम करते हैं, एआइ से सवाल पूछते हैं, तस्वीरें और वीडियो बनाते हैं। अब उपयोगकर्ता के सामने सिर्फ एक स्क्रीन है। उसके पीछे मौजूद डेटा सेंटर नजर नहीं आता है। इसलिए भ्रम पैदा होता है कि डिजिटल चीजों की शायद कोई भौतिक लागत नहीं होती। हमें इसका पता नहीं चलता है कि ‘क्लाउड’ वास्तव में आसमान का कोई बादल नहीं, बल्कि धरती पर मौजूद विशाल कंप्यूटिंग ढांचा है, जहां हर खोजबीन, सवाल-जवाब, तस्वीर-वीडियो निर्माण के लिए भी संसाधनों का इस्तेमाल होता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आइईए) के मुताबिक, वर्ष 2024 में दुनिया के डेटा सेंटरों ने करीब 415 टेरावाट-घंटे बिजली का इस्तेमाल किया, जो वैश्विक खपत का डेढ़ फीसद था। यह मांग पिछले दो वर्षों में कई गुना बढ़ी है, क्योंकि अब एआइ मॉडल तेजी से विकसित हो रहे हैं और उनका इस्तेमाल किया जा रहा है। सिर्फ बिजली ही नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में पानी की खपत ने भी डेटा सेंटरों को धरती और मनुष्य के लिए खतरे का कारक बना दिया है। आइईए का अनुमान है कि फिलहाल ये डेटा सेंटर करीब 560 अरब लीटर पानी हर साल सोख रहे हैं, जो वर्ष 2030 तक 1,200 अरब लीटर सालाना तक हो सकता है। हालांकि, एआइ की मदद से तस्वीर बनाने में आमतौर पर यही लगता है कि यह पलभर का काम है और इसकी लागत भी मामूली होगी, लेकिन जब यह प्रक्रिया अरबों दफा दोहराई जाती है, तो इसकी लागत भी बढ़ती जाती है।
यह डिजिटल उपभोग की नई अर्थव्यवस्था है। इसमें एक व्यक्ति के स्तर पर लागत नगण्य लगती है, लेकिन वैश्विक पैमाने पर नई सुनामी प्रतीत होती है। सोचिए कि क्या हम सिर्फ एक तस्वीर पर रुकते हैं। एक तस्वीर पसंद नहीं आई तो एआइ से दूसरी, तीसरी और इसी तरह अनगिनत तस्वीरें बना डालते हैं। तस्वीरों से आगे बढ़कर आवाजें, संगीत, वीडियो डेटा और कंप्यूटिंग की मांग भी बढ़ती जाती है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि आखिर डिजिटल उपभोग को जिम्मेदार कैसे बनाया जाए?
इसके साथ एक अन्य महत्त्वपूर्ण मसला भी जुड़ा है- हमारा डेटा, निजता और पहचान। अगर हमें अस्सी के दशक में ली जाने वाली तस्वीरों के अनुभव का अहसास करना हो, तो हम एआइ को आज का अपना चेहरा सौंपते हैं। यह तस्वीर हमारी पहचान से जुड़ी एक निजी सूचना है। चूंकि अलग-अलग एआइ मॉडल की तस्वीरों के भंडारण, इस्तेमाल और प्रशिक्षण से जुड़ी नीतियां अलग-अलग होती हैं, इसलिए हमें यह साफ पता नहीं चलता कि हम जिस मंच को अपनी पहचान सौंप रहे हैं, डेटा को लेकर उसकी नीतियां क्या हैं।
इंटरनेट के शुरुआती दौर में लोगों ने वेबसाइटों के साथ अपना नाम और ई-मेल साझा किया। सोशल मीडिया आया, तो लोगों ने अपनी पसंद, मित्र-मंडली, परिवार, विचार और सामाजिक संबंधों को उससे साझा कर दिया। स्मार्टफोन के जरिए हमारी लोकेशन, व्यवहार और लगभग प्रत्येक गतिविधि का डेटा किसी इंटरनेट कंपनी के पास पहुंच गया। ‘जनरेटिव एआइ’ के दौर में हम इससे भी आगे बढ़ रहे हैं। अब मशीनों के पास हमारी तस्वीरें, आवाज, लेखन शैली और कल्पनाएं भी पहुंच रही हैं। पहले हम अपनी पहचान से जुड़ी सारी जानकारी विभिन्न मंचों पर साझा कर देते हैं, फिर सवाल उठाते हैं कि आखिर साइबर सेंधमारों को हमारी निजी जानकारियां कैसे मिल जाती हैं! आज दुनिया को अगर जिम्मेदार एआइ चाहिए, तो केवल उपयोगकर्ताओं की सतर्कता ही पर्याप्त नहीं है।
एआइ कंपनियों को भी बताना होगा कि उनके बनाए मॉडल कितनी ऊर्जा-पानी की खपत करते हैं और उपयोगकर्ता की निजता का कितना खयाल रखा जाता है। जब फ्रिज-एयर कंडीशनर खरीदते समय स्टार रेटिंग हमें बताती है कि उसकी ऊर्जा दक्षता क्या है, तो डिजिटल सेवाओं पर भी इंटरनेट-एआइ कंपनियों के लिए इसी तरह की कसौटी क्यों नहीं हो सकती। एआइ कंपनियों को यह बताना चाहिए कि उनके मॉडल के संचालन की अनुमानित लागत और बिजली-पानी जैसे संसाधनों का खर्च क्या है।
इससे बेहतर और ज्यादा दक्ष तकनीक के लिए प्रतिस्पर्धा पैदा होगी। एआइ को आज रोकना न तो संभव है और न जरूरी, क्योंकि इसकी मदद से चिकित्सा, शिक्षा, विज्ञान, संचार, प्रशासन और रचनात्मक उद्योगों में नई संभावनाएं बन रही हैं। मगर संसाधनों के खर्च और उपयोगकर्ता की निजी जानकारियों के इस्तेमाल को लेकर अगर धुंधलका कायम रहता है, तो पारदर्शिता का सवाल हमेशा उठता रहेगा। इसी तरह उपयोगकर्ता को भी सजगता, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ तकनीक का इस्तेमाल करना होगा।




