छत्तीसगढ़

कोयला घोटाला में ‘टाइप्ड बयान’ विवाद : कोर्ट ने ACB-EOW चीफ समेत 3 अफसरों के खिलाफ दायर याचिका की खारिज

रायपुर। छत्तीसगढ़ की एक स्थानीय अदालत ने एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB/EOW) के चीफ अमरेश मिश्रा, एडिशनल एसपी चंद्रेश ठाकुर और डीएसपी राहुल शर्मा के विरुद्ध दायर परिवाद को खारिज कर दिया है. रायपुर की प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट आकांक्षा बेक की अदालत ने यह फैसला क्षेत्राधिकार (ज्यूरिडिक्शन) के अभाव में सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले पर विचारण करने का अधिकार उसके पास नहीं है.

क्या था कोर्ट का मुख्य आधार?

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 183 के तहत दर्ज बयानों के संबंध में सुनवाई का अधिकार उसी न्यायालय को है, जहाँ वे बयान साक्ष्य के रूप में पेश किए गए हों. वर्तमान परिवाद में कोर्ट को विचारण की अधिकारिता प्राप्त नहीं थी, इसलिए इसे निरस्त किया गया. अदालत ने यह भी साफ किया कि परिवाद प्रचलनशील न होने के कारण प्रारंभिक साक्ष्य और धारा 94 BNSS से संबंधित आवेदनों पर भी विचार नहीं किया जा सकता.

अधिकारियों पर क्या थे आरोप?

परिवादी पक्ष ने आरोप लगाया था कि एसीबी के इन वरिष्ठ अधिकारियों ने कूट रचना (Forging) कर धारा 164 के तहत कथन दर्ज कराए थे. परिवादी ने इसे आपराधिक कृत्य बताते हुए अदालत से अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी.

अदालत में हुई तीखी बहस

परिवाद की स्वीकार्यता को लेकर राज्य सरकार और परिवादी पक्ष के बीच जोरदार बहस हुई:

  • बचाव पक्ष (राज्य सरकार): अधिवक्ता रवि शर्मा ने तर्क दिया कि यह मामला कोर्ट के क्षेत्राधिकार से बाहर है. साथ ही उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारी अपने शासकीय कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे थे, इसलिए उन्हें वैधानिक संरक्षण प्राप्त है.
  • परिवादी पक्ष: अधिवक्ता फैजल रिजवी ने दलील दी कि किसी भी अपराध की सूचना देना एक संवैधानिक अधिकार है और अदालत को इस पर विचार करना चाहिए.

अदालत के फैसले के बाद परिवादी पक्ष के वकील फैजल रिजवी ने स्पष्ट किया है कि वे इस आदेश के खिलाफ रिवीजन पेश करेंगे. उन्होंने कहा कि परिवाद में लगाए गए आरोप तथ्यों पर आधारित हैं और उनकी कानूनी लड़ाई जारी रहेगी.

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