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गोवर्धन पूजा का महत्त्व

भारतीय संस्कृति का प्रत्येक पर्व जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेरणा से ओत-प्रोत एक संदेश बनकर हमारे समक्ष आता है। दीपावली के आनंद और प्रकाश में डूबा मन जब अन्नकूट अथवा गोवर्धन पूजा के अवसर पर झुककर गोवर्धन पर्वत और गौमाता की आराधना करता है तो यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, प्रकृति, पर्यावरण और जीवमात्र के प्रति कृतज्ञता का उत्सव होता है। इस पर्व की मूल भावना यही संदेश देती है कि सच्ची समृद्धि धन के भंडार से नहीं, विनम्रता, संतुलन और प्रकृति के सम्मान से आती है। यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार गोवर्धन पूजा 22 अक्तूबर को है। सामान्यत: महालक्ष्मी पूजन के अगले दिन यह पर्व आता है, परंतु इस बार तिथियों के संयोग के कारण गोवर्धन पूजा एक दिन विलंब से मनाई जा रही है। इस दिन को अन्नकूट कहा जाता है, जिसका अर्थ है अनेक प्रकार के अन्न और व्यंजनों का पर्वत। यह नाम ही इस बात का द्योतक है कि यह दिन केवल पूजा नहीं अपितु अन्न, प्रकृति और गौवंश के प्रति आभार का पर्व है। द्वापर युग से चली आ रही इस परंपरा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण के उस अद्भुत प्रसंग से है जब उन्होंने देवराज इन्द्र के अहंकार को नष्ट कर ब्रजवासियों को यह सिखाया कि मनुष्य का जीवन प्रकृति के सहयोग पर आधारित है, किसी देवता के भय पर नहीं। ब्रज के लोग तब इन्द्र का यज्ञ करते थे, क्योंकि वे मानते थे कि वर्षा उसी की कृपा से होती है पर श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि वर्षा गोवर्धन पर्वत की हरियाली और प्रकृति के संतुलन से होती है, न कि किसी देवता के क्रोध या प्रसाद से। यही कारण है कि उन्होंने इन्द्र यज्ञ का विरोध कर गोवर्धन पूजन का आरंभ कराया।

जब इन्द्र ने क्रोधित होकर ब्रज पर भीषण वर्षा की, तब श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और पूरे सात दिनों तक ब्रजवासियों को वर्षा और प्रलय से बचाया। अंतत: इन्द्र को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि इस दिन से प्रत्येक वर्ष गोवर्धन की पूजा कर प्रकृति और गोधन का सम्मान करना चाहिए। इस कथा के पीछे गहन आध्यात्मिक और वैज्ञानिक संदेश निहित है। यह घटना केवल एक धार्मिक कथा नहीं बल्कि अहंकार और विनम्रता के संघर्ष का शाश्वत प्रतीक है। जब देवताओं के राजा इन्द्र अपने सामथ्र्य और पद के घमंड में अंधे हो गए, तब कृष्ण ने उन्हें सिखाया कि सृष्टि में कोई भी शक्तिशाली नहीं, महान केवल वह है, जो अपने सामथ्र्य का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करे। अन्नकूट पर्व इसीलिए हमें यह संदेश देता है कि मनुष्य चाहे जितनी प्रगति कर ले, उसे प्रकृति, जल, अन्न, पशु और पर्यावरण के प्रति नम्र रहना चाहिए। इस दिन घर-घर में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक रूप बनाया जाता है। यह प्रतीक मात्र मिट्टी या गोबर का नहीं बल्कि उसमें पृथ्वी की उर्वरता, गोधन की महिमा और पर्यावरण की जीवनदायिनी शक्ति का समावेश होता है। गोवर्धन पूजा के दौरान बनाए गए 56 प्रकार के व्यंजनों (जिन्हें छप्पन भोग कहा जाता है) का भी एक गूढ़ अर्थ है। छप्पन अंक प्रतीक है उस पूर्णता का, जिसमें इन्द्रियों के छ: समूह (पांच ज्ञानेन्द्रियां, मन और कर्मेन्द्रियां) अपने नियंत्रण में रहते हुए ईश्वर को समर्पित हो जाते हैं। अन्नकूट में तैयार किए जाने वाले विविध पकवान (सब्जियां, मिठाईयां, कढ़ी-चावल, खीर, रबड़ी, मक्खन, पूड़ी, पेड़े, मिश्री और पुए) केवल स्वाद के प्रतीक नहीं बल्कि अर्पण की भावना के विस्तार हैं। जब ब्रजवासी यह विविध अन्न भगवान को अर्पित करते हैं तो वे यह स्वीकार करते हैं कि अन्न केवल उपभोग की वस्तु नहीं, ईश्वर का वरदान है।

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