चेहरे पर मुस्कान, लेकिन दिल में खालीपन! कहीं आप भी तो नहीं महसूस कर रहे ये संकेत?…

फरीदाबाद: क्या आप भी लोगों के सामने हंसते हैं, अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं, ऑफिस जाते हैं और परिवार के साथ समय बिताते हैं, लेकिन अंदर से खालीपन महसूस करते हैं? क्या पहले जिन चीजों से खुशी मिलती थी, अब उनमें भी मन नहीं लगता? ऐसी स्थिति को केवल उदासी समझकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है. कई बार लगातार तनाव और भावनात्मक थकान के कारण भी ऐसा महसूस हो सकता है. फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के मनोचिकित्सा विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर और मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. गायत्री भाटिया बताती हैं कि भावनात्मक परेशानी हमेशा आंसुओं के रूप में सामने नहीं आती, बल्कि कई बार व्यक्ति इसे पहचान भी नहीं पाता.
हंसने के बावजूद अंदर से खालीपन क्यों महसूस होता है?
डॉ. गायत्री भाटिया बताती हैं कि कई बार व्यक्ति हंसता है, रोता है, ऑफिस जाता है और घर की जिम्मेदारियां भी निभाता है, लेकिन अंदर से खालीपन महसूस करता है. जीवन में पहले जिन चीजों से खुशी मिलती थी, उनमें रुचि कम होने लगती है. इसे भावनात्मक सुन्नता या भावनात्मक थकान के रूप में महसूस किया जा सकता है. इसके लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं. व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ने लगता है, लोगों से जुड़ने में परेशानी होती है और अपने करीबियों के साथ भी भावनात्मक दूरी महसूस होने लगती है. कई बार उसे मदद की जरूरत होती है, लेकिन वह अपनी परेशानी किसी को बता नहीं पाता.
डॉक्टर गायत्री भाटिया बताती कि जीवन की भागदौड़ में लोग अक्सर अपनी भावनात्मक सेहत को पीछे छोड़ देते हैं. वे सुख-दुख को नजरअंदाज करके हर हाल में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहते हैं. कई बार दूसरों को खुश रखने के लिए ऐसे काम भी करते रहते हैं, जिनसे उन्हें खुद खुशी नहीं मिलती. धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी जरूरतों और भावनाओं को समझना बंद कर देता है. लगातार ऐसा होने पर भावनात्मक थकान और सुन्नता महसूस हो सकती है.
थकान और भावनात्मक सुन्नता में क्या है अंतर?
डॉ. गायत्री भाटिया बताती हैं कि भावनात्मक परेशानी का असर केवल मन पर ही नहीं, शरीर पर भी पड़ सकता है. पर्याप्त सात से आठ घंटे सोने के बाद भी थकान महसूस होना, चिड़चिड़ापन और पाचन संबंधी परेशानियां इसके साथ दिखाई दे सकती हैं. कई बार व्यक्ति अलग-अलग जांच और उपचार कराने के बावजूद परेशानी महसूस करता रहता है. हालांकि, इन लक्षणों के दूसरे शारीरिक कारण भी हो सकते हैं, इसलिए सही वजह जानने के लिए डॉक्टर से परामर्श जरूरी है.
भावनाएं कम महसूस हों तो डॉक्टर से कब मिलें?
डॉ. गायत्री भाटिया बताती हैं कि अगर लंबे समय से खुशी महसूस नहीं हो रही, रोना चाहते हुए भी रो नहीं पाते, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आने लगा है या शरीर लगातार थका रहता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर व्यक्ति तनाव से निपटने के लिए शराब, धूम्रपान या दूसरे हानिकारक तरीकों का सहारा लेने लगे, तो यह भी चिंता का संकेत है. ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए. डॉक्टर के मुताबिक, शराब या अन्य चीजों के सहारे तनाव से राहत पाने की कोशिश अस्थायी हो सकती है और आगे चलकर नुकसान पहुंचा सकती है.




