जब अराजकता देती है लोकतंत्र को चुनौती

समकालीन विश्व की राजनीति में एक चिंताजनक प्रवृत्ति तेजी से उभरती हुई दिखाई दे रही है, जो स्थापित लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बजाय संगठित अव्यवस्था, सड़कों पर टकराव और राजनीतिक उथल-पुथल के माध्यम से सरकार बदलने की बढ़ती प्रवृत्ति से संबंधित है। जब ‘शासन-परिवर्तन’ (रिजीम-चेंज) शब्द का इस्तेमाल लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकारों को डराने-धमकाने, हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को योजनाबद्ध ढंग से ध्वस्त करके सत्ता से हटाने के प्रयासों को उचित ठहराने के लिए किया जाता है, तब यह शब्द विशेष रूप से चिंताजनक अर्थ ग्रहण कर लेता है। यह एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करता है-क्या कोई लोकतंत्र संगठित अराजकता को मतपेटी के विकल्प के रूप में स्वीकार कर सकता है?
भारत शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक सत्ता-परिवर्तनों के विश्व के सबसे प्रभावशाली उदाहरण प्रस्तुत करता है। 1977 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की शक्तिशाली सरकार को मतपत्र के माध्यम से पराजित किया गया और जनता पार्टी सत्ता में आई। यह एक ऐतिहासिक प्रमाण था कि सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नेतृत्व को भी आम नागरिकों की सामूहिक इच्छाशक्ति के माध्यम से सत्ता से हटाया जा सकता है। 1980 में मतदाताओं ने एक बार फिर अपना निर्णय बदला और इंदिरा गांधी को सत्ता में वापस ला दिया। 1989 में एक और बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ, जब कांग्रेस सरकार सत्ता से बाहर हो गई और वी.पी. सिंह ने प्रधानमंत्री पद संभाला। 1996, 1998 और 1999 में भारत ने राजनीतिक नेतृत्व और सत्तारूढ़ गठबंधनों में कई और बदलाव देखे। ये सभी परिवर्तन संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में हुए।
2004 में, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने चुनावी जनादेश को स्वीकार किया, जिससे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यू.पी.ए.) की सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ। 2014 में मतदाताओं ने एक और निर्णायक जनादेश दिया, जिसके परिणामस्वरूप नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय सत्ता में आए। इन सभी परिवर्तनों ने भारतीय लोकतंत्र की एक असाधारण शक्ति को प्रदर्शित किया-राजनीतिक सत्ता अस्थायी होती है लेकिन संवैधानिक वैधता स्थायी होती है। कुछ आंदोलन वास्तव में जनसमस्याओं और जन-असंतोष से प्रेरित होते हैं तथा शांतिपूर्ण बने रहते हैं। वहीं, कुछ अन्य आंदोलनों के हिंसक गुटों, अवसरवादी राजनीतिक तत्वों या जनाक्रोश का लाभ उठाने की कोशिश करने वाले समूहों के प्रभाव में आने की आशंका रहती है। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। जवाबदेही की मांग करने वाला शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र की अभिव्यक्ति है। ङ्क्षहसा और डराने-धमकाने के माध्यम से राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करने का संगठित प्रयास संवैधानिक शासन पर हमला है।
सड़क पर होने वाली क्रांतियों का महिमामंडन करते समय अक्सर उनके परिणामों की अनदेखी कर दी जाती है। इन परिणामों में आर्थिक गतिविधियों में व्यवधान, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को नुकसान, संस्थाओं का कमजोर होना, राजनीतिक अनिश्चितता और चरम परिस्थितियों में लंबे समय तक बनी रहने वाली अस्थिरता शामिल हैं। भीड़ किसी शहर का जनजीवन ठप्प कर सकती है लेकिन वह पूरे राष्ट्र के संवैधानिक जनादेश का दावा नहीं कर सकती। भारत का संविधान अभिव्यक्ति, वाक्स्वातंत्र्य, शांतिपूर्ण सभा और राजनीतिक संगठन बनाने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, बशर्ते इन अधिकारों पर संविधान द्वारा अनुमत प्रतिबंधों का पालन किया जाए। वास्तव में, असहमति के बिना लोकतंत्र अपना वास्तविक अर्थ खो देगा। हालांकि, लोकतांत्रिक विरोध और गैरकानूनी दबाव के बीच स्पष्ट अंतर है।
सार्वजनिक संपत्ति को जलाना, सुरक्षा कर्मियों पर हमला करना, नागरिकों को धमकाना,हिंसा के माध्यम से आवश्यक सेवाओं में बाधा डालना या संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनाने का प्रयास करना केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का हवाला देकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। एक सशक्त लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की रक्षा करने और ङ्क्षहसा का सहारा लेने वालों के विरुद्ध दृढ़ कार्रवाई करने, दोनों की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन इसकी वास्तविक कीमत आम नागरिक चुकाते हैं। राजनीतिक टकराव के ये लोग शायद ही कभी लाभार्थी होते हैं।
हिंसक प्रदर्शनों के दौरान नष्ट की गई सार्वजनिक संपत्ति किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं होती, वह भारत की जनता की संपत्ति होती है। लंबे समय तक बनी रहने वाली अव्यवस्था से होने वाला आॢथक नुकसान अंतत: करदाताओं और आने वाली पीढिय़ों पर बोझ बन जाता है।
इसलिए राजनीतिक टकराव और व्यवधान को बढ़ावा देने वालों से यह प्रश्न पूछना उचित है-आपको किसने यह अधिकार दिया है कि आप अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की कीमत लाखों निर्दोष नागरिकों पर थोप दें? राजनीतिक असहमति किसी को भी दूसरों के जीवन, आजीविका और सुरक्षा को खतरे में डालने का अधिकार नहीं देती। यदि आपको सरकार पसंद नहीं है, तो उसे अपने वोट से बदलें, हिंसा से नहीं। मतपेटी लोकतांत्रिक परिवर्तन का वैध साधन है। सड़कों को कभी भी जनता की सर्वोच्च इच्छा के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।-कुंवर विक्रम सिंह




