थ्रिलर के नाम पर उबाऊ ड्रामा, स्विमिंग पूल में डूबी फिल्म की कहानी

नई दिल्ली. अगर आप एक ऐसी फिल्म की तलाश में हैं जो आपको रोमांच के नाम पर केवल सिरदर्द दे, तो बिजॉय नांबियार की ‘तू या मैं’ आपके लिए ही बनी है. साल 2018 की थाई फिल्म ‘द पूल’ का यह आधिकारिक रीमेक बॉलीवुड की उस पुरानी बीमारी का शिकार है, जहां मेकर्स को लगता है कि किसी बेहतरीन विदेशी फिल्म की बस फोटोकॉपी कर देने से ही काम चल जाएगा. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी सुस्त रफ्तार और कमजोर स्क्रिप्ट है. एक खाली स्विमिंग पूल में फंसी जिंदगी और मौत की इस जंग में न तो कहीं डर महसूस होता है और न ही किरदारों के प्रति सहानुभूति.
शनाया कपूर के चेहरे के सपाट भाव इस थ्रिलर को और भी फीका बना देते हैं. आदर्श गौरव जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता को यहां पूरी तरह बर्बाद किया गया है. ऐसा लगता है जैसे वह भी इस फिल्म के पूल में नहीं, बल्कि खराब निर्देशन के गड्ढे में फंस गए हों. आनंद एल राय और बिजॉय नांबियार जैसे बड़े नामों से ऐसी उम्मीद नहीं थी. फिल्म सर्वाइवल थ्रिलर के नाम पर दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेती है.
कहानी
फिल्म ‘तू या मैं’ की कहानी इंसान भूल और नियति के क्रूर खेल के इर्द गिर्द घूमती है. फिल्म की कहानी मारुति कदम (आदर्श गौरव) और मिस वैनिटी (शनाया कपूर) की लव स्टोरी से शुरू होती. ये दोनों ही एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं. इसी बीच दोनों गोवा जाते हैं, जहां दोनों एक स्विमिंग पूल में फंस जाते हैं. मामला तब और खराब हो जाता है, जब स्विमिंग पूल में एक मगरमच्छ आ जाता है. अब सवाल ये उठता है कि क्या दोनों की जान बच पाती है? आखिर फिल्म के अंत में क्या होता है, ये जानने के लिए आपको सिनेमाघर जाकर पूरी फिल्म देखनी होगी.
कमियां
निर्देशक बिजॉय नांबियार की ‘तू या मैं’ एक ऐसी फिल्म है जो अपनी दिशा भटक गई है. फिल्म का पहला हिस्सा किसी सर्वाइवल थ्रिलर जैसा नहीं, बल्कि एक म्यूजिक वीडियो एल्बम की तरह लगता है. ऐसा महसूस होता है जैसे पूरी टीम गाना बनाने की प्रैक्टिस कर रही थी और जिसे जहां जगह मिली, वहां बेमतलब गाना ठूंस दिया. एक बड़ी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को अचानक एक ‘छपरी’ लड़का कैसे पसंद आ जाता है, यह केमिस्ट्री दर्शकों के गले नहीं उतरती. कहानी में जुड़ाव की इतनी कमी है कि हर थोड़ी देर में आने वाले गाने मनोरंजन के बजाय केवल इरिटेट करते हैं. फिल्म का असली रोमांच दूसरे हाफ में शुरू तो होता है, लेकिन वह न तो आपको डराने में कामयाब होता है और न ही कहानी से बांध पाता है. स्क्रीनप्ले में लॉजिक की भारी कमी खली है, जहां कई बार चीजें वास्तविकता से कोसों दूर लगती हैं.
एक्टिंग
एक्टिंग की बात करें तो फिल्म का पूरा दारोमदार आदर्श गौरव के कंधों पर है और उन्होंने एक बार फिर अपनी पीढ़ी के सबसे शानदार एक्टर्स में से एक होने का अपना स्टेटस साबित किया है. मौत का डर और जिंदा रहने की चाहत- आदर्श ने अपनी आंखों और बॉडी लैंग्वेज से इन सभी इमोशंस को बहुत अच्छे से दिखाया है. उनकी परफॉर्मेंस ही फिल्म की एकमात्र ताकत है. दूसरी ओर, शनाया कपूर की परफॉर्मेंस निराश करती है. उनमें एक सर्वाइवल थ्रिलर के लिए जरूरी रॉ और डीप इमोशंस की कमी है. कई इंटेंस सीन में उनके चेहरे के एक्सप्रेशन एक जैसे रहते हैं, जिससे दर्शक उनके कैरेक्टर के दर्द से जुड़ नहीं पाते. दोनों के बीच की केमिस्ट्री ऊपरी लगती है और उसमें गहराई की कमी है. दूसरे सपोर्टिंग एक्टर्स भी ज्यादा असर नहीं डाल पाते, क्योंकि स्क्रिप्ट उन्हें डेवलप होने का ज्यादा मौका नहीं देती. कुल मिलाकर, एक्टिंग के मामले में फिल्म वन-मैन शो बनी हुई है, जिसमें आदर्श गौरव ने अपना बेस्ट दिया है, लेकिन बाकी कास्ट उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए.
डायरेक्शन
बेजॉय नांबियार अपने स्टाइल और विजुअल्स के लिए जाने जाते हैं, लेकिन यहां उनका डायरेक्शन थोड़ा कन्फ्यूज्ड लगता है. एक सर्वाइवल थ्रिलर के लिए सबसे जरूरी चीज है दम घोंटने वाला टेंशन. बेजॉय ने फिल्म के विजुअल्स पर ध्यान दिया, लेकिन कहानी का सार नहीं पकड़ पाए. पहले हाफ में कमजोर कैरेक्टर डेवलपमेंट उनके डायरेक्शन की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुए. उन्होंने एक सिंपल सर्वाइवल स्टोरी की गंभीरता को बेवजह स्टाइलिश बनाने की कोशिश में कम कर दिया.
सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की सबसे मजबूत बात इसकी सिनेमैटोग्राफी है. पूरी फिल्म एक खाली स्विमिंग पूल के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक सिनेमैटोग्राफर के लिए एक मुश्किल काम है. कैमरा एंगल पूल की गहराई और उसमें फंसे लोगों की बेबसी को पूरी तरह से कैप्चर करते हैं. पूल के अकेलेपन को दिखाने के लिए ड्रोन शॉट्स का अच्छे से इस्तेमाल किया गया है, जिससे दर्शकों को उस जगह के डरावनेपन का एहसास होता है.
बैकग्राउंड स्कोर
बैकग्राउंड म्यूजिक सस्पेंस बनाए रखने के लिए सर्वाइवल फिल्मों की रीढ़ की हड्डी है. ‘तू या मैं’ का बैकग्राउंड स्कोर कई बार रोंगटे खड़े कर देने वाला है, खासकर मगरमच्छ वाले सीन में. हालांकि, कई बार यह बहुत ज्यादा लाउड हो जाता है, जिससे इमोशनल सीन का असर कम हो जाता है, लेकिन ‘साइलेंस’ और पानी की बूंदों जैसे बैकग्राउंड साउंड का इस्तेमाल थ्रिल बढ़ाने में मदद करता है.
अंतिम फैसला
कुल मिलाकर, ‘तू या मैं’ एक बहुत ही औसत दर्जे की फिल्म साबित होती है. अगर आप इसे देखना ही चाहते हैं, तो केवल इसके बेहतर दूसरे हाफ और आदर्श गौरव की शानदार परफॉर्मेंस के लिए एक बार देख सकते हैं. बाकी कलाकारों और निर्देशन के मामले में यह फिल्म गहरा निराश करती है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार.




