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दुनिया भारत से सीखे डील का हुनर, ट्रंप की खुशामद की जरूरत नहीं


भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर शंका करने की कई वजहें थीं। लग रहा था कि डील होगी नहीं या फिर कम से कम निकट भविष्य में तो कोई समझौता नहीं होने जा रहा। वजह कि दोनों देशों के रिश्तों में तनाव था और भरोसा काफी हद तक टूट चुका था। नई दिल्ली राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को डील से बाहर रखने पर अड़ी थी। वहीं, अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने यह कहकर तनाव बढ़ा दिया कि पिछले साल पीएम नरेंद्र मोदी ने डॉनल्ड ट्रंप को कॉल नहीं किया और इस वजह से भारत ने डील का बड़ा मौका गंवा दिया है।

Time की अहमियत

इस डील के लिए भारत ने हरसंभव कदम उठाए। उसने कई टैरिफ कम या खत्म कर दिए। रूस से तेल आयात भी कम कर दिया, पर बात नहीं बनी। तो फिर यह समझौता क्यों हुआ, और वह भी अभी? इसके पीछे तीन संभावित कारण दिखाई देते हैं और इनका संबंध रणनीतिक आकलन से ज्यादा राजनीतिक और आर्थिक है।

  • पहली वजह यह है कि ट्रंप नवंबर में होने वाले मिड टर्म चुनावों के बारे में अभी से सोच रहे होंगे। उन्हें यह भी पता होगा कि उनकी टैरिफ नीतियों की वजह से अमेरिका में खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ गए हैं। उनके समर्थकों को यह पसंद नहीं होगा, इसलिए ट्रंप ने टैरिफ से थोड़ा पीछे हटने का फैसला किया।
  • दूसरी वजह यह हो सकती है कि भारत और EU के बीच हुए नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) ने वाइट हाउस को सतर्क कर दिया हो। उसे यह आशंका रही होगी कि भारत के साथ कारोबार करने वाले अमेरिकी उद्यमियों को नुकसान हो सकता है।
  • अगली वजह हैं सर्जियो गोर, भारत में अमेरिका के नए राजदूत। वह मानो इस मिशन के साथ नई दिल्ली पहुंचे हैं कि द्विपक्षीय रिश्तों को फिर से सुधारना है। उन्होंने साझेदारी को लेकर सकारात्मक माहौल बनाया, उच्च स्तर पर बातचीत की और सुलह के लिए कदम उठाए। भारत को पैक्स सिलिका का न्योता देना ऐसी ही पहल रही। वॉशिंगटन में गोर का खासा दखल है। संभव है कि उन्होंने ही ट्रंप को मोदी से बातचीत करने के लिए राजी किया हो।

Deal के सबक

भारत ने भी धैर्य बनाए रखा, न ही कोई तीखी प्रतिक्रिया दी। इसी वजह से आखिरकार ट्रंप को समझौते पर आना पड़ा। भारत ने दिखा दिया कि अपनी बात मनवाने के लिए ट्रंप की खुशामद करने की जरूरत नहीं। इसके पांच अहम निहितार्थ हैं –

1. दोनों देशों के बीच डील अभी तक सुरक्षित मुकाम पर नहीं पहुंची है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ किया है कि अभी केवल फ्रेमवर्क एग्रीमेंट हुआ है, डील नहीं। ट्रंप के अनिश्चित स्वभाव को देखते हुए कहना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में क्या हो जाए।

2. यह समझौता भले अभी औपचारिक न हो, पर द्विपक्षीय रिश्तों को बड़ा बल देता है। यह भरोसा बढ़ाने वाला अहम कदम है। तनाव और भरोसे की कमी के बावजूद दोनों देश किसी नतीजे तक पहुंच पाए हैं। यह सच है कि रिश्तों को नए सिरे से मजबूत करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है, खासकर जब ट्रंप लगातार पाकिस्तान और असीम मुनीर की तारीफों के पुल बांधते नजर आते हैं।

अगला अहम संकेत QUAD होगा। अगर भारत को लगा कि अमेरिका के साथ रिश्तों में इतनी नरमी आ चुकी है कि लंबे समय से टल रही इसके नेताओं की बैठक की मेजबानी की जा सके तो द्विपक्षीय रिश्तों को बड़ा सहारा मिलेगा। ऐसा इसलिए भी क्योंकि तब ट्रंप का भारत दौरा हो सकता है। ट्रंप तभी आएंगे, जब उनके पास दिखाने के लिए कुछ हो और ट्रेड डील बिल्कुल मुफीद है।

3. अगर यह ट्रेड डील रिश्तों को स्थिर करती है, तो अमेरिका के साथ भविष्य को लेकर भारत के मन में जो अनिश्चितता थी, उसमें कुछ राहत मिल सकती है। इसी अनिश्चितता की वजह से भारत संतुलन की नीति अपनाए हुए है। वह चीन के साथ व्यापारिक सहयोग बढ़ा रहा है। संतुलन की नीति में थोड़ी भी ढील वॉशिंगटन के लिए संकेत होगी कि पेइचिंग को काउंटर करने के अमेरिकी प्लान में भारत साथ है।

4. यह डील उन आलोचकों को जवाब होगी, जो कहते रहे हैं कि भारत FTA के लिए सही देश नहीं है और संरक्षणवाद को बढ़ावा देता है।

5. भारत का अपनी रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देना सही रहा। पिछले एक साल में तमाम झटकों के बावजूद रूस के साथ रिश्ते मजबूत बने रहे, चीन संग संबंधों में स्थिरता आई है और अमेरिका के साथ संबंध सुधर रहे हैं। यह उपलब्धि तारीफ के काबिल है।
लेखक: माइकल कुगेलमैन
(लेखक दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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