दुष्प्रवृत्तियों की रोकथाम पर हो मन की बात

प्रधानमंत्री जी आपसे विनम्र विनती है कि आप सबसे पहले सामाजिक बुराइयों के इस आधुनिक रूप को अपने स्तर पर, अपने आग्रह पर, अपने निर्देश पर नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ें। उदाहरण के लिए आपके मार्गदर्शन में मोटरगाडिय़ां यानी कि कारें, मोटरसाइकिलें बनाने वाली कंपनियों के लिए ये नियम निर्धारित हो कि वे अपनी-अपनी गाडिय़ों के हॉर्न ऐसे बनाएं जो तीखे, असहनीय, कर्कश न होकर कानों के लिए सहज, सुरीले व कम ध्वनि वाले हों। नियम यह भी हो कि कंपनियों द्वारा बनाया गया हॉर्न कहीं भी कभी भी बदला न जा सके। आप अपने मन की बात कार्यक्रम में किशोरों-युवाओं को गली-मोहल्लों में तेज गति से मोटरगाडिय़ां नहीं चलाने का मार्गदर्शन भी दे सकते हैं। आप सौ से लेकर पांच सौ या हजार मीटर तक की यात्रा, साइकिल द्वारा अथवा पैदल चलकर करने की, प्रेरणा भी दे सकते हैं। आप युवाओं को टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, मोटरसाइकिल के नियंत्रित व न्यून उपयोग को प्रेरित कर सकते हैं…
ये आलेख अतिवृष्टि में दिवंगत हुए लोगों को याद करके उनके प्रति श्रद्धांजलि है। प्रकृति तो चलो मानवों पर दया कर सकती है। इसलिए आशा करता हूं कि आने वाली वर्षा ऋतु पहाड़ी प्रांतों के लिए आपदा विहीन होगी। किंतु आधुनिकता की आड़ में राक्षसी होते मनुष्यों की दुष्प्रवृत्तियों पर रोक कैसे लगेगी। आधुनिक वस्तुओं-सेवाओं का प्रयोग, उपयोग व भोगोपभोग मानव हिंसक जानवरों की तरह न करके मानव की तरह करना कब आरंभ करेगा। क्षमा करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सोचता हूं कि आर्थिक-भौतिक-वैज्ञानिक-सामरिक रूप में शीघ्र ही विश्व का सर्वाधिक तृतीय शक्तिशाली देश बनने जा रहा भारत सामाजिक-सांस्कृतिक-प्राकृतिक-व्यक्तिगत-ग्रामीण रूप में कब शीर्ष स्तर की ओर बढऩा आरंभ करेगा। आप गत दस-ग्यारह वर्षों से देश को अपने मन की बातें बता रहे हैं, जो विभिन्न स्तरों पर देश की प्रगति के लिए उपयुक्त बातें हैं। किंतु आप सार्वजनिक जीवन, सडक़ों, गलियों, घरों, समाज-परिवारों में अव्यवस्थित होकर उपस्थित युवा पीढ़ी को समझाने के लिए भी कृपया कुछ प्रेरणापरक बातें बताएं। जो किशोर, युवा और प्रौढ़ भारतीय सज्जन हैं वे तो संभवत: आपकी प्रेरणादायी बातों की यात्रा के आरंभ होने से पहले ही अपने विभिन्न कार्यकत्र्तव्यों का समुचित ढंग से निर्वाह कर रहे हैं, और दुर्भाग्य से ऐसे सज्जनों की संख्या देश-विदेश में सब देशस्थानों में कम है। विशेषकर भारत में किशोरों व युवाओं की अधिसंख्य पीढ़ी घर-बाहर बुरी तरह अमानवीय होकर दुराचरण व दुव्र्यवहार कर रही है। ये पीढ़ी घर पर होती है तो टेलीविजन, कंप्यूटर स्क्रीन और मोबाइल फोनों की स्क्रीन्स पर अधिक समय व्यतीत कर रही है।
इस कारण एक ही घर में रहते हुए भी ये लोग माता-पिता, दादा-दादी व भाई-बहनों से पारिवारिक संबंधों के अनुसार बातचीत व आचार-व्यवहार नहीं कर रहे। इन्होंने घर को केवल अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम बना रखा है। इन्हें कुछ समझाओ तो ये उग्र होकर काटने को दौड़ते हैं। इन्हें सद्गुणों, सात्विक भोजन, प्राकृतिक रहन-सहन, परंपरा-प्रकृति, धर्म-साहित्य के संदर्भ के साथ कोई शिक्षा या सीख दो तो ये विपरीत नास्तिक होकर माता-पिता, बड़े-बूढ़ों व अन्य अभिभावकों का घृणित तिरस्कार करने लगते हैं। ऐसी पीढ़ी के साथ माता-पिता तथा अन्य परिवारीजनों का दैनिक जीवन-संघर्ष जीवन के लिए अत्यंत दु:खदायी बना हुआ है। इस पीढ़ी के किशोर व युवा जब अपने परिवार की उपेक्षा, अपमान तथा तिरस्कार करके मोटरसाइकिलों, स्कूटियों तथा कारों में बैठकर सडक़ों पर भागते हैं तो मोटर वाहनों की गति, तेज हार्न पर इनका कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसे लगता है जैसे ये पैदल चलने वाले लोगों को अपनी आधुनिक कुंठा के कारण कुचल कर रख देना चाहते हैं। मुख्य मार्गों, उप-मार्गों के अतिरिक्त आवासीय घरों की छोटी-पतली गलियों में भी इनकी मोटर गाडिय़ों की गति कम नहीं होती। इनके वाहनों के कर्कश, कानफोड़ू हॉर्न घरों तक में शोर का तूफान उठाते रहते हैं। इन्हें इतना ज्ञान नहीं होता कि जब इनकी मोटर गाडिय़ों का इंजन ढुगढुग की आवाज के साथ पूरी सडक़, गली, मोहल्ला व शहर को अपने चलने-होने का संकेत दे रहा है, तो फिर इन्हें उस हल्ले के साथ हॉर्न का हल्ला क्यों करना चाहिए। रात में, आधी रात में व सुबह चार बजे भी सडक़ों और गलियों में, जब केवल इक्के-दुक्के आवारा कुत्ते ही होते हैं, तब भी ये आते-जाते अपनी गाडिय़ों के तीखे-तेज-असहनीय-कानफोड़ू-कर्कश हॉर्न बजाकर चलते हैं। ये इस पीढ़ी पर कैसा मनोरोग चढ़ा हुआ है। यातायात विभाग भी स्थानीय राजनीति और नेताओं के दबाव में ऐसी पीढ़ी पर यातायात नियमों के उल्लंघन की कोई बड़ी कार्रवाई नहीं करता है। माना जाता है कि ऐसी पीढ़ी को अपना वोट बैंक समझकर नेतागण, यातायात प्राधिकारियों को इन पर कार्रवाई न करने का दबाव बनाते रहते हैं। ये पीढ़ी इतने सार्वजनिक अत्याचार करने तक ही सीमित नहीं है।
ये मदिरापान, धूम्रपान, तंबाकू चर्वण, मादक पदार्थों के सेवन, वेश्यावृत्ति इत्यादि सामाजिक रूप में अवांछनीय कामों में भी लिप्त हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये इन कामों को गुप्त ढंग से करते हों और सार्वजनिक जीवन में सज्जनता के साथ रहने का विकल्प ढ़ूढते लोगों के लिए कोई समस्या खड़ी नहीं करते हों। ये इन कामों की आड़ लेकर ही, इनके नशे में पतित होकर ही सार्वजनिक जीवन को अराजक बनाए हुए हैं। देश-दुनिया में जो भी जमे-जुमाए दुर्गण थे, वे तो इन्होंने अपनाए ही अपनाए, साथ ही साथ ये हर नए वैश्विक दुर्गुण को स्वदुष्प्रेरणा से अपना रहे हैं और प्रतिक्षण मानव समाज को प्राकृतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-पारिवारिक रूप में ध्वस्त करने पर लगे हुए हैं।
प्रधानमंत्री जी आपसे विनम्र विनती है कि आप सबसे पहले सामाजिक बुराइयों के इस आधुनिक रूप को अपने स्तर पर, अपने आग्रह पर, अपने निर्देश पर नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ें। उदाहरण के लिए आपके मार्गदर्शन में मोटरगाडिय़ां यानी कि कारें, मोटरसाइकिलें बनाने वाली कंपनियों के लिए ये नियम निर्धारित हो कि वे अपनी-अपनी गाडिय़ों के हॉर्न ऐसे बनाएं जो तीखे, असहनीय, कर्कश न होकर कानों के लिए सहज, सुरीले व कम ध्वनि वाले हों। नियम यह भी हो कि कंपनियों द्वारा बनाया गया हॉर्न कहीं भी कभी भी बदला न जा सके। आप अपने मन की बात कार्यक्रम में किशोरों-युवाओं को गली-मोहल्लों में तेज गति से मोटरगाडिय़ां नहीं चलाने का मार्गदर्शन भी दे सकते हैं। आप द्वारा सौ से लेकर पांच सौ या हजार मीटर तक की यात्रा, साइकिल द्वारा अथवा पैदल चलकर करने की, प्रेरणा भी दी जा सकती है। आप युवाओं को टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, मोटरसाइकिल के नियंत्रित व न्यून उपयोग के लिए प्रेरित कर सकते हैं। उन्हें मदिरा, तंबाकू व मादक पदार्थों के सेवन से बचने की सलाह दे सकते हैं। आप से आशा है कि दिग्भ्रमित युवाओं को इन बुराइयों से बचाएं। ऐसे युवाओं की सार्वजनिक अराजकता से असुरक्षित सज्जनों को शासकीय-प्रशासकीय-सामाजिक उपायों द्वारा सुरक्षा प्रदान करें। युवाओं को खुद भी व्यसनों से बचना होगा, तभी उनका व देश का कल्याण होगा।
विकेश कुमार बडोला




