नफरत फैलाने के मामलों पर प्राथमिकता से सुनवाई…

सुप्रीम कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा के एक हेट वीडियो के खिलाफ पटीशन पर सुनवाई करने से मना कर दिया है, जिसमें वह बंदूक पकड़े हुए मुस्लिम कम्युनिटी के 2 लोगों पर गोली चला रहे हैं। इसकी बजाय कोर्ट ने पटीशनर्स से कहा है कि वे रूटीन फॉलो करें और असम हाई कोर्ट जाएं। इस छोटे वीडियो क्लिप के टाइटल थे ‘प्वॉइंट ब्लैंक शॉट’ और ‘नो मर्सी’ और इसे किसी भी लिहाज से ङ्क्षहसा का जश्न मनाने वाला सबसे खुलेआम कम्युनल पोस्ट कहा जा सकता था। और यह किसी आम नागरिक ने नहीं, बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री ने किया था। सच कहूं तो, राज्य भाजपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से सोशल मीडिया पर डाली गई वीडियो क्लिप को काफी बुराई के बाद हटा दिया गया था, लेकिन मुख्यमंत्री ने इस बात की कोई परवाह नहीं की कि वीडियो में क्या दिखाया जा रहा है। उनसे उम्मीद थी कि वह वीडियो के कंटैंट की खुलकर बुराई करेंगे और इसे बनाने और अपलोड करने वाले व्यक्ति के खिलाफ सख्त एक्शन लेंगे। इसकी बजाय उन्होंने पूरी तरह चुप्पी साधे रखी और यह साफ कर दिया कि उन्हें नहीं लगता कि वीडियो क्लिप बुराई के लायक है।
सरमा, जो जल्द ही असम में असैंबली चुनाव का सामना करने वाले हैं, शायद उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ के बाद सबसे ज्यादा सांप्रदायिक सोच वाले मुख्यमंत्री के तौर पर उभरे हैं। सत्ता बनाए रखने की उनकी बेचैनी समझ में आती है, लेकिन समाज को इस तरह के सांप्रदायिक जहर की जो बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है, उसके लंबे समय तक चलने वाले नतीजे होंगे। कोई भी समझदार नागरिक उम्मीद करता कि सबसे बड़ी अदालत सरमा के शुरू किए गए हेट कैंपेन पर खुद से नोटिस लेगी। लेकिन ऐसा करने की बजाय, उसने जाने-माने लोगों के एक ग्रुप की अर्जी पर भी सुनवाई करने से मना कर दिया और उनसे पहले राज्य की हाई कोर्ट जाने के नियम का पालन करने को कहा।
इस मामले की गंभीरता को नजरअंदाज करते हुए, भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली शीर्ष अदालत ने कहा कि जब भी चुनाव राडार पर होते हैं, तो ‘यह कोर्ट एक राजनीतिक लड़ाई का मैदान बन जाता है’। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी थी क्योंकि उसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इसमें कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि राज्य सरकार का प्रमुख शामिल था। चीफ जस्टिस ने कहा, ‘‘पूरी कोशिश हाई कोर्ट को कमजोर करने और उनका हौसला तोडऩे की है, जो हमें मंजूर नहीं है। हाई कोर्ट की अथॉरिटी को कमजोर करने की यह एक बहुत ही सोची-समझी चाल है। वे संवैधानिक कोर्ट हैं और उनके पास हमसे ज्यादा शक्ति है।’’ हालांकि, यह पहली बार नहीं था जब पटीशनर सीधे सुप्रीम कोर्ट गए थे। एक पटीशनर की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ए.एम. सिंघवी ने 17 ऐसे मामलों का जिक्र किया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आॢटकल 32 के तहत अपने रिट जूरिस्डिक्शन का इस्तेमाल करते हुए सीधे पटीशन पर सुनवाई की थी। सिंघवी ने कहा, ‘‘हाई कोर्ट की शक्ति पर कोई शक नहीं है। लेकिन आर्टिकल 32 क्यों बनाया गया था? इसे बड़े केस के लिए बनाया गया था।’’ आॢटकल 32 लोगों को अपने मूलभूत अधिकारों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है।
सिंघवी ने कहा कि जब चीफ जस्टिस हाई कोर्ट का हौसला तोडऩे की बात कर रहे थे, ‘‘यहां एक व्यक्ति देश के संवैधानिक माहौल का हौसला तोड़ रहा है।’’ पटीशन पर सुनवाई करने से मना करते हुए, कोर्ट ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि किसी भी हाई कोर्ट के लिए मुख्यमंत्री के खिलाफ पटीशन पर सुनवाई करना बहुत मुश्किल होता है। दूसरी बात, हाई कोर्ट के आदेश पर किसी भी जांच के लिए राज्य मशीनरी की मदद की जरूरत होगी, जिसमें पुलिस भी शामिल है, जो गृह मंत्री के जरिए मुख्यमंत्री को रिपोर्ट करती है। यह वाकई सुप्रीम कोर्ट के लिए जल्दी दखल देने का एक सही मामला था। हालांकि, एक और मामले की सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजनेताओं को भाईचारा बढ़ाना चाहिए और बड़े सरकारी अधिकारियों को संविधान के आदर्शों पर चलना चाहिए।
कोर्ट एक पटीशन पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें मुख्यमंत्रियों, सीनियर नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के ऐसे सार्वजनिक बयानों के उदाहरण दिए गए थे, जो पूरे समुदायों को बदनाम करते हैं, भेदभाव वाले शासन को सही ठहराते हैं और राज्य की समान नागरिकता के वादे में जनता का भरोसा कम करते हैं। इसने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी पद पर बैठे लोग और सीनियर एग्जीक्यूटिव अधिकारी, जो लगातार अपमानजनक भाषण देते हैं, वे आम बोलने वाले नहीं हैं।
कोर्ट ने ‘सार्वजनिक हस्तियों’ के लिए भी एक जरूरी कोड ऑफ कंडक्ट बनाने का सुझाव दिया, जैसा ‘लोक सेवकों’ पर लागू होता है। सी.जे.आई. सूर्यकांत ने कहा, ‘‘हम सभी राजनीतिक दलों को संवैधानिक नैतिकता, मूल्य और आपसी सम्मान की अहमियत समझाना चाहते हैं। इन नियमों को हर जगह एक जैसा लागू किया जाना चाहिए, हम यही उम्मीद करते हैं। जब सार्वजनिक हस्तियों और लोक सेवकों की बात आती है, तो स्थिति अलग होती है। लोक सेवकों के लिए, बहुत सारे कानून, नियम और मैंडेट्स हैं जो व्यवहार को नियंत्रित करते हैं, सब कुछ पहले से ही मौजूद है। सार्वजनिक हस्तियों के लिए भी कुछ ऐसा ही कोड ऑफ कंडक्ट होना चाहिए।’’ यह करना सही होता, लेकिन सबसे बड़ी कोर्ट को असम हेट वीडियो का संज्ञान लेना चाहिए था, यह देखते हुए कि इसमें तुरंत दखल देना जरूरी था। इससे नफरत फैलाने वालों को स्पष्ट संकेत मिलता।-विपिन पब्बी




