अंतर्राष्ट्रीय

नाटो की ‘अग्निपरीक्षा’ है ग्रीनलैंड, यूरोप की एकता ने उड़ाए ट्रंप के होश, रोकना पड़ गया कब्जे का प्लान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिलहाल ग्रीनलैंड के प्लान को होल्ड पर डाल दिया है. उन्होंने 10 फीसदी टैरिफ के साथ यूरोपीय देशों को जून तक के लिए मोहलत दी है कि वो उनका साथ दें, वरना टैरिफ बढ़ाया जाएगा.

ग्रीनलैंड को लेकर हाल के दिनों में जो कूटनीतिक हलचल देखने को मिली, उसने एक बार फिर यह साफ कर दिया कि बदलती वैश्विक राजनीति में यूरोप की सामूहिक आवाज अब अमेरिका को भी सोचने पर मजबूर कर सकती है. जिस मुद्दे पर वॉशिंगटन आक्रामक रुख अपनाने की तैयारी में था, उसी पर यूरोपीय देशों ने एक सुर में विरोध जताया और नतीजा यह हुआ कि अमेरिका को कदम पीछे खींचने पड़े. क्या वाकई डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड के सपने को होल्ड कर दिया है या फिर ये उनकी किसी स्टैटजी का हिस्सा है?

ग्रीनलैंड क्यों है रणनीतिक रूप से अहम

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और भले ही वहां आबादी कम हो, लेकिन उसकी जियोपॉलिटिकल महत्ता अहमियत बेहद बड़ी है. आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण यह इलाका सैन्य, ऊर्जा और व्यापारिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है. बर्फ पिघलने के साथ नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और खनिज संसाधनों तक पहुंच आसान हो रही है. यही वजह है कि अमेरिका लंबे समय से ग्रीनलैंड में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश करता रहा है.

क्यों ग्रीनलैंड के मुद्दे पर बेचैन है अमेरिका?

हाल के घटनाक्रम में अमेरिका ने ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य और रणनीतिक गतिविधियां तेज करने के संकेत दिए. माना गया कि वॉशिंगटन यहां अपने प्रभाव को और मजबूत करना चाहता है, ताकि रूस और चीन जैसी ताकतों को आर्कटिक में संतुलित किया जा सके. हालांकि ये रुख यूरोप को रास नहीं आया. चूंकि ग्रीनलैंड, डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है और इसलिए यह मुद्दा सीधे तौर पर यूरोपीय संप्रभुता से जुड़ गया.

ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड पर कोई भी एकतरफा कदम स्वीकार्य नहीं होगा. नाटो सहयोगी होने के बावजूद यूरोप ने अमेरिका को यह संदेश दिया कि सुरक्षा के नाम पर क्षेत्रीय संतुलन से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता. यूरोपीय नेताओं का तर्क था कि इस तरह की पहल से आर्कटिक क्षेत्र में तनाव बढ़ेगा और स्थानीय आबादी की इच्छा की अनदेखी होगी. इतना ही नहीं जर्मनी ने अपने कुछ सैनिक भी ग्रीनलैंड में उतार दिए, जिनकी संख्या ज्यादा नहीं थी लेकिन संकेत बड़ा था.

क्यों अमेरिका को झुकना पड़ गया?

यूरोप का यह विरोध सिर्फ कूटनीतिक बयानबाजी नहीं थी, जैसा शुरू में डोनाल्ड ट्रंप समझ रहे थे. इसके पीछे नाटो की एकता, आर्कटिक में स्थिरता और वैश्विक छवि का सवाल जुड़ा था. अमेरिका समझता है कि अगर वह यूरोपीय सहयोगियों को नाराज करता है, तो उसका असर सिर्फ ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यूक्रेन, मध्य पूर्व और एशिया जैसे मुद्दों पर भी सहयोग कमजोर पड़ सकता है. यही वजह रही कि कड़े विरोध के बाद अमेरिका ने अपने कदमों को फिलहाल होल्ड कर दिया.

ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां 25 मई से 25 जुलाई के बीच सूर्य डूबता ही नहीं और दिन रात सूर्य को देखा जा सकता है.

इतनी आसानी से मान जाएंगे डोनाल्ड ट्रंप?

हालांकि अमेरिका ये कदम इसलिए भी रुका हुआ है क्योंकि वो बातचीत के जरिये इस समस्या का समाधान निकालना चाहता है. उसने अपने एक विशेष दूत को मार्च में ग्रीनलैंड जाने के लिए कहा है, जो इस मुद्दे पर डेनमार्क और नाटो से बात करेंगे. अमेरिका उम्मीद जता रहा है कि इससे कुछ समाधान निकल जाए. ऐसे में मार्च तक ये मामला रुका हुआ है. हालांकि इस बीच 10 फीसदी टैरिफ और 25 फीसदी टैरिफ की धमकी से ट्रंप ये माहौल बना रहे हैं कि ग्रीनलैंड उनके एजेंडे से बाहर नहीं गया है.

ग्रीनलैंड का मामला बताता है कि दुनिया अब एकतरफा फैसलों के दौर से बाहर निकल रही है. यूरोप यह दिखाने में सफल रहा कि वह सिर्फ अमेरिका का अनुसरण करने वाला नहीं, बल्कि अपने हितों के लिए खड़ा होने वाला शक्ति केंद्र भी है. वहीं अमेरिका के लिए यह एक सबक है कि भविष्य की रणनीतियों में उसे सहयोगियों की सहमति को ज्यादा महत्व देना होगा. अगर उसे रूस और चीन के साथ शक्ति संतुलन करना है तो उसे नाटो जैसे संगठन और यूरोपीय देशों की जरूरत पड़ेगी ही.

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