निराशावाद का हल है गीता ज्ञान

आप चाहें किसी भी परिस्थिति में हों, किसी भी समस्या से जूझ रहे हों, चाहे वो बाहरी हो या आंतरिक, गीता प्रत्येक दशा में आपका मार्गदर्शन कर सकती है। आज की युवा पीढ़ी बेहद भ्रमित और उलझी हुई है। कई लोगों के लिए जीवन एक अनबूझ पहेली की तरह है जिसे ठीक से न समझकर वो अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण ने उपदेश देकर न केवल अर्जुन का उद्धार किया था, बल्कि उन्होंने आने वाली सभी पीढ़ी को वो ज्ञान दिया जिससे वे अपने जीवन के गूढ़ रहस्य को समझ सकें। गीता ज्ञान निराशावाद का सामना कर रही आज की युवा पीढ़ी के लिए भी प्रासंगिक है और बड़ी ही गहनता के साथ उनका मार्गदर्शन कर सकती है…
आजकल मनोवैज्ञानिक इस बात को लेकर बहुत चिंतित हैं कि देश में हर उम्र के लोग और खास तौर पर हमारी युवा पीढ़ी निराशावाद का शिकार हो रहे हैं। मनुष्य क्यों निराशावादी हो जाता है, यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। क्या उसके जीवन की परिस्थितियां उसको निराशावादी बना देती हैं या फिर इसके पीछे अन्य कारण हैं। सबसे पहले देखें कि एक निराशावादी व्यक्ति की पहचान क्या होती है। मनोवैज्ञानिक इसके कुछ लक्षण बताते हैं। निराशावादी को हर काम मुश्किल लगता है। कोई भी काम शुरू करने से पहले ही निराशावादी खुद को असफल मान लेते हैं। निराशावादी को दुनिया बहुत खराब और दुश्मन लगती है। उनकी बातों में कभी किसी की तारीफ नहीं होती, ये दूसरों की असफलताओं पर बहुत चर्चा करते हैं। आप इनको कितने भी अच्छे अवसर दे दो, खुश होने के, ये उसमें भी कुछ बुरा ढंूढ लेते हैं। इनके अंदर एक भय हमेशा रहता है। ये जब भी बात करते हैं तो उन बातों में आपको दुख, भय, हार, जीवन के प्रति निराशा, अपनों के लिए शिकायतें ही मिलेंगी, निराशावादी हमेशा सुरक्षित रहना और आराम करना पसंद करते हैं। इनको कुछ भी करने का मन नहीं करता, और आलस इनकी दिनचर्या को खराब करने लगता है। ये मानसिक रूप से कमजोर होते हैं और इनको हर काम कठिन लगता है। इनमें दृढ़ संकल्प की कमी होती है। क्या आपमें भी ऐसा होता है?-
निराशावाद क्यों पैदा होता है? मनोविज्ञानी बताते हैं कि जब-जब व्यक्ति झूठी आशा करेगा, निराशा हाथ लगेगी। जब-जब व्यक्ति किस्मत के भरोसे जिएगा, उसे निराशा हाथ लगेगी। जब-जब व्यक्ति दूसरों के सहारे जिएगा, उसे निराशा हाथ लगेगी। जब-जब व्यक्ति हर मुसीबत में हाथ फैलाएगा, उसे निराशा हाथ लगेगी। जब-जब व्यक्ति सोच का दायरा सीमित रखेगा, उसे निराशा हाथ लगेगी। इन चीजों को दूर करना जरूरी है। निराशावाद का उपयुक्त जवाब आशावाद है। निराशावादी व्यक्ति हर कदम पर निराश होने की वजह खोज सकता है, और हर आशावादी व्यक्ति बड़ी से बड़ी मुसीबत में, नाउम्मीदी में भी उम्मीद की किरण खोज सकता है। एक आशावादी इनसान अपनी आशाओं के साथ सोता है और नई आशाओं के साथ सुबह जगता है क्योंकि उसे अपनी बहुत सारी आशाओं को पूरी होने की उम्मीद है। दूसरी तरफ निराशावादी इनसान अपने आप को एक जगह स्थिर कर अपना सब कुछ खत्म कर बैठता है, उसे किसी से कोई उम्मीद नहीं है। आशावादी इनसान अपनी आशाओं के अनुसार कुछ न कुछ (कर्म) करता हुआ रहता है। उसकी कुछ आशा पूरी होती जाती हैं और कुछ नई आशाओं का आगमन होता जाता है। कुल मिलाकर ऐसा व्यक्ति आगे बढ़ता हुआ रहता है लेकिन निराशावादी इनसान कुछ भी (कर्म) नहीं करता है, क्योंकि उसे उम्मीद ही नहीं है और जो इनसान कुछ भी नहीं करने की सोचता है, आगे बढऩा तो दूर, विपरीत दिशा में गतिमान रहता है। एक निराशावादी को हर अवसर में कठिनाई दिखाई देती है और एक आशावादी को हर कठिनाई में अवसर दिखाई देता है। गीता ज्ञान निराशावाद को आशावाद में बदलने का अचूक अस्त्र है। गीता, कुरुक्षेत्र युद्ध शुरू होने से पहले भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच होने वाला पथप्रदर्शक वार्तालाप है। भगवान कृष्ण की शिक्षाओं ने जीवन के बारे में अर्जुन के दृष्टिकोण को बदलने में मदद की। जब इनसान को चारों तरफ हताशा और निराशा नजर आती है, तो उसे श्रीमद्भगवद्गीता पढऩे की सलाह दी जाती है। गीता में जीवन का गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। जो इनसान इसे अच्छी तरह से पढक़र अपने जीवन में अनुसरण करता है, उसे किसी भी प्रकार का दुख-दर्द नहीं सताता है।
गीता के उपदेश जितने प्रासंगिक महाभारत काल में थे, उतने ही आज भी हैं। यह इनसान के मार्गदर्शक का काम करता है। ऐसे में जो इनसान दुख-दर्द, परेशानियों से गुजर रहा है, उसे गीता के इन खास उपदेशों को जरूर याद रखना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। अगर दुख है तो एक दिन सुख भी मिलेगा। अगर आप किसी काम में आज असफल हुए हैं तो काम करना बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि कर्म करते रहने से एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है। ऐसे में जीवन में चाहे जितना भी बुरा समय आ जाए, इनसान को अपना कर्म करते रहना चाहिए। गीता उपदेश के अनुसार, जीवन में सफल होने के लिए व्यक्ति को सपने देखने चाहिए। जिंदगी चाहे जैसी है, इनसान को हमेशा बड़े सपने देखने चाहिए, क्योंकि जब इनसान सपने देखता है तभी इनसान उसे पूरे करने की कोशिश भी करता है। ऐसे में जब सपने बड़े होंगे तो इनसान उसे पूरा करने के लिए लगातार कोशिश करता रहेगा। गीता ज्ञान कहता है जिस इनसान में सहनशीलता और माफ करने का गुण होता है, उसे निराशा और हताशा कभी नहीं होती है, क्योंकि माफ करने का गुण होने से इनसान फिजूल की बातों पर चिंतित नहीं होता है। यह दुश्मनी के भाव को खत्म करने का काम करता है। भगवान श्रीकृष्ण गीता उपदेश में कहते हैं कि बदलाव होना प्रकृति का नियम है। ऐसे में सफलता पाने के लिए इनसान को समय के हिसाब से अपने आप में बदलाव लाते रहना चाहिए। जो इनसान समय के साथ-साथ चलता है, वह कभी हताश और निराश नहीं हो सकता है। ऐसे इनसान अपने काम में एक न एक दिन जरूर सफल होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, इनसान की हर परेशानी की जड़ उसका क्रोध होता है। ऐसे में इनसान को क्रोध पर नियंत्रण करना चाहिए। जो व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण कर लेता है, उसे किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है।
गीता केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है बल्कि जीवन का सार है। आप चाहें किसी भी परिस्थिति में हों, किसी भी समस्या से जूझ रहे हों, चाहे वो बाहरी हो या आंतरिक, गीता प्रत्येक दशा में आपका मार्गदर्शन कर सकती है। आज की युवा पीढ़ी बेहद भ्रमित और उलझी हुई है। कई लोगों के लिए जीवन एक अनबूझ पहेली की तरह है जिसे ठीक से न समझकर वो अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण ने उपदेश देकर न केवल अर्जुन का उद्धार किया था, बल्कि उन्होंने आने वाली सभी पीढ़ी को वो ज्ञान दिया जिससे वे अपने जीवन के गूढ़ रहस्य को समझ सकें। गीता ज्ञान निराशावाद का सामना कर रही आज की युवा पीढ़ी के लिए भी प्रासंगिक है और बड़ी ही गहनता के साथ उनका मार्गदर्शन कर सकती है। तभी तो स्वामी विवेकानंद ने सभी को गीता पढऩे की सलाह दी थी। कुल मिलाकर निराशावाद एक बड़ी सामाजिक और मानसिक समस्या बन चुकी है। ईश्वर से प्राप्त कीमती जिंदगी को सकारात्मक नजरिए से जीना ही निराशावाद का सही इलाज है। आखिर में, ‘ना मुंह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो, गमों का दौर भी आए तो मुस्करा के जियो।’-डा. वरिंद्र भाटिया




