संपादकीय

नीतीश ही ‘नेता’ हैं

बिहार ने इस बार भाजपा-एनडीए को प्रचंड, ऐतिहासिक और अप्रत्याशित जनादेश दिया है। साबित हो गया कि नीतीश कुमार ही बिहार के ‘सर्वोच्च नेता’ हैं। चुनाव नीतीश के नेतृत्व में ही लड़ा गया। यह नीतीश के राजनीतिक करियर की शानदार उपलब्धि है, क्योंकि जनता दल-यू ने 2020 की तुलना में लगभग दोगुनी सीटों पर बढ़त बनाई है। मतगणना के दिन सुबह 9.56 बजे भाजपा 69 और जद-यू 76 सीट पर आगे थीं। उसके बाद भी दोनों साथी दलों की बढ़त 71-71, 75-75, 79-79 बरकरार रही। क्या कमाल का जनादेश मिला है! अंतत: भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। यदि अंतिम जनादेश यही रहा, तो भाजपा-एनडीए के पक्ष में अभूतपूर्व जनादेश होगा। एनडीए सबसे पहले 190 सीट पर आगे रहा, जबकि तब महागठबंधन 50 सीटों पर ही आगे था। कितना व्यापक फासला था! निश्चित है कि चुनावी मुकाबला एकतरफा साबित हुआ। भाजपा के ‘चाणक्य’ एवं गृहमंत्री अमित शाह का आकलन भी 160 सीटों के आसपास का था, लेकिन नतीजे ‘बंपर’ साबित हुए। आश्चर्य है कि नीतीश कुमार 20 लंबे साल तक सत्ता में रहे हैं, उसके बावजूद स्वीकार्य और प्रासंगिक साबित हुए हैं। हमने ऐसा ही विश्लेषण कुछ दिन पहले किया था कि नीतीश के विरुद्ध कोई नहीं है, ‘लहर’ तो बहुत दूर की कौड़ी है। अब नीतीश को बिहार का नया ‘जननायक’ मानना चाहिए। यकीनन नीतीश उस जमात और पीढ़ी के ‘अंतिम नेता’ हैं, जिसने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में, ‘संपूर्ण क्रांति’ के बैनर तले, राजनीति की शुरुआत की थी। जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव, कर्पूरी ठाकुर, रामविलास पासवान आदि की पीढ़ी दिवंगत हो चुकी है, लालू यादव अस्वस्थ हैं, नीतीश ही शेष हैं, जिन्हें इस ऐतिहासिक जनादेश के बाद ‘जननायक’ करार देना चाहिए। यह बिहार में नीतीश की स्वीकार्यता और प्रधानमंत्री मोदी की आम आदमी के बीच लोकप्रियता की ही प्रचंड जीत है। बिहार में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा-एनडीए ने यह लगातार, पांचवां चुनाव जीता है। शुरुआत 2014 के लोकसभा चुनाव से हुई थी। यह 2010 की भाजपा-एनडीए की आंधी, तूफान वाली जीत की पुनरावृत्ति भी है। सदन में विपक्ष का नेता चुनना भी कठिन लगता है। भाजपा-एनडीए जनादेश महज ‘दस हजारी’ महिलाओं के बंपर समर्थन का ही जनादेश नहीं है, बल्कि यह बिहार के अधिसंख्य अगड़ों-सवर्णों, पिछड़ों-अति पिछड़ों, दलितों-महादलितों, युवाओं-बुजुर्गों और यहां तक कि मुसलमानों का भी जनादेश है।

जाति, धर्म, जमात, नस्ल, लिंग आदि के पार जाकर एनडीए को वोट दिए गए हैं। बेशक यह ‘स्वीप’ जनादेश है। बिल्कुल कल्पनातीत जनादेश है। यह संपादकीय लिखने तक एनडीए 206 और विपक्षी गठबंधन मात्र 30 सीटों पर बढ़त बनाए थे। भाजपा 95 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है, जबकि जद-यू की बढ़त 82 सीटों पर थी। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (आर) ने भी 20 सीटों पर बढ़त बना कर अपना अमूल्य योगदान दिया है। विपक्ष के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी यादव के राजद की बढ़त 25 सीटों पर ही थी। तेजस्वी खुद पीछे चल रहे थे। कांग्रेस के हिस्से मात्र 3 सीटें ही दिख रही थीं। जाहिर है कि बिहार में उसका सूपड़ा ही साफ हो गया है। आंकड़ों में कुछ बदलाव हो सकता है, अलबत्ता जनादेश यही रहेगा। कांग्रेस ने 2020 में 19 सीट जीती थीं। विपक्ष में सीपीआई (माले) भी 4 सीट पर ही सिमटने के आसार हैं। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता पवन खेड़ा ने टिप्पणी की है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता बिहार की जनता पर भारी पड़ गए। यह एक कुंठित टिप्पणी है। बहरहाल यह चुनाव अतुलनीय साबित हुआ, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी लगातार मदद कर रहे प्रधानमंत्री मोदी के लिए कई चुनौतियां हैं। पलायन सबसे संवेदनशील मुद्दा है, जिससे रोजगार प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। बिहार में 3 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी-रेखा से ऊपर किया गया है, लेकिन अब भी 33 फीसदी से अधिक आबादी ‘गरीब’ है। बिहार सबसे युवा राज्य है, जहां 58 फीसदी आबादी की औसत उम्र 32 साल है। एनडीए ने एक साल के भीतर बिहार को बाढ़-मुक्त करने का वायदा किया है। यह समस्या तब से है, जब देश आजाद भी नहीं हुआ था, लिहाजा यह ब्लू प्रिंट सामने आना चाहिए कि बिहार बाढ़-मुक्त कैसे होगा। बहरहाल प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री समेत पार्टियों के समस्त काडर को जीत के जश्न की बधाई और भविष्य की शुभकामनाएं।

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