नौकरी छोड़ मिट्टी से ‘सोना’ उगा रहे ये इंजीनियर साहब, सिर्फ एक्स्ट्रा इनकम आ रही ₹75000

रीवा: मुंबई में रहने वाले नीरज कुमार सिंह, जो मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स डिग्री और अच्छी कॉर्पोरेट नौकरी होने के बावजूद मध्य प्रदेश के रीवा में प्राकृतिक खेती को अपना चुके हैं। वह अपने परिवार से दूर रहकर भी अपने जुनून को पूरा कर रहे हैं। वे रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल किए बिना, गाय के गोबर और मूत्र से बने पंचगव्य और जीवामृत जैसे प्राकृतिक उर्वरकों का उपयोग करके प्रति एकड़ 2 से 3 गुना ज्यादा उपज प्राप्त कर रहे हैं।
75000 की होती है एक्स्ट्रा इनकम
नीरज, सोना मोती गेहूं और बुद्ध चावल जैसी प्राचीन अनाज किस्मों की खेती करके भी मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने 2014 में अपनी नौकरी छोड़ दी और रीवा लौट आए। उन्होंने 2013 में आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित प्राकृतिक खेती शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया, जिसने उन्हें प्रेरित किया। आज वे 3 एकड़ अपनी जमीन और 25 एकड़ लीज पर ली हुई जमीन पर खेती करते हैं। गायों से उन्हें न केवल प्राकृतिक उर्वरक मिलते हैं, बल्कि दूध और दूध उत्पादों से हर महीने लगभग 75,000 रुपये की अतिरिक्त आय भी होती है।
पत्नी और बच्चे देते हैं साथ
नीरज कहते हैं कि ‘मेरी पत्नी और बच्चों ने मेरे जुनून को जीने में मेरा पूरा साथ दिया है, भले ही इसका मतलब है कि मुझे अक्सर यात्रा करनी पड़ती है और लंबे समय तक उनसे दूर रहना पड़ता है। मैं आभारी हूं।’
चुनौतियों से भी जूझते हैं नीरज
प्राकृतिक खेती में कुछ चुनौतियां भी हैं, जैसे आवारा पशुओं से फसल की सुरक्षा और कुशल मजदूरों की कमी। नीरज का मानना है कि इन समस्याओं का समाधान सरकारी एजेंसियों, गैर-लाभकारी संगठनों और किसानों के बीच सहयोग से ही संभव है। वे कहते हैं, ‘प्राकृतिक खेती सिर्फ भोजन के बारे में नहीं है। इससे मिट्टी ठीक होती है, स्वास्थ्य बहाल करने और किसान के जीवन में गरिमा वापस लाने के बारे में है।’
युवाओं के लिए प्रेरणा बना ब्लॉग
नीरज का फार्म आज कई युवा किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। वे मानते हैं कि भविष्य हमारे अतीत के ज्ञान और आज के स्मार्ट समाधानों के संयोजन में निहित है। वे कहते हैं, ‘मैं तकनीक या आधुनिक प्रथाओं के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन मेरा मानना है कि हमारा भविष्य हमारे अतीत के ज्ञान को आज के स्मार्ट समाधानों के साथ जोड़ने में है।’




