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पहाड़ की पीड़ा : समस्या और समाधान

स्वच्छ और शांत पहाड़ पर्यटन के लिए आदर्श हैं। यदि स्थानीय युवाओं को होमस्टे, बिना नए निर्माण के परंपरागत घरों से, साहसिक पर्यटन/गाइडिंग और जैविक भोजन सेवाओं से जोड़ा जाए तो यह स्थायी आजीविका का बड़ा स्रोत बन सकता है। 3. ऊर्जा आत्मनिर्भरता : छोटे हाइड्रो, सोलर और बायोगैस प्लांट्स से गांवों को बिजली दी जा सकती है। इससे न केवल ऊर्जा की समस्या सुलझेगी, बल्कि रोजगार भी उत्पन्न होगा। 4. महिला स्वावलंबन और युवा उद्यमिता : महिला स्वयं सहायता समूहों को माइक्रो फाइनेंस और प्रशिक्षण देकर हस्तशिल्प, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग जैसे कार्यों से जोड़ा जाए। युवाओं के लिए ‘पर्वतीय इनोवेशन फंड’ बनाकर स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा सकता है। 5. सडक़, स्वास्थ्य और शिक्षा का सशक्त नेटवर्क : सडक़ और संचार केवल सुविधा नहीं, बल्कि विकास का आधार हैं। टेलीमेडिसिन और ऑनलाइन शिक्षा से दूरस्थ गांवों तक आधुनिक सेवाएं पहुंचाई जा सकती हैं। 6. पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील विकास नीति : निर्माण कार्यों में पारिस्थितिक संतुलन को प्राथमिकता दी जाए…

भारत के पहाड़ी राज्य, विशेषकर उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर ृऔर हिमाचल प्रदेश, प्राकृतिक सौंदर्य और संसाधनों से भरपूर हैं, लेकिन यहां के लोगों की पीड़ा गहरी और पुरानी है। सवाल यह है कि जब पहाड़ जल, जंगल और जमीन से समृद्ध हैं, तो यहां के लोग क्यों परेशान हैं? क्यों गांव खाली हो रहे हैं, और क्यों पलायन रुक नहीं रहा? पहाड़ की असली पीड़ा : पहाड़ का जीवन कठिन है, लेकिन विकास की असमानता ने इस कठिनाई को और बढ़ा दिया है। आज भी हजारों गांव ऐसे हैं जहां न बिजली है, न सडक़, न पीने का साफ पानी, न स्वास्थ्य सुविधा। शिक्षा के अभाव में युवाओं को अवसर नहीं मिलते, और रोजगार के अभाव में उन्हें मैदानों या शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। रोजगार और आजीविका का संकट, यहां की सबसे बड़ी समस्या है। खेती अब लाभकारी नहीं रही, पशुपालन घटा है, और पारंपरिक हस्तशिल्प या जड़ी-बूटी आधारित व्यवसाय धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। पर्यटन कुछ चुनिंदा इलाकों तक सीमित है, जिससे व्यापक आर्थिक विकास नहीं हो पा रहा। महिलाएं इस संकट की सबसे बड़ी मार झेल रही हैं। जल, लकड़ी और चारे के लिए उन्हें आज भी कई किलोमीटर चलना पड़ता है। जब पुरुष बाहर कमाने जाते हैं, तो पूरा बोझ महिलाओं के कंधों पर आ जाता है। विकास के नाम पर अनियोजित निर्माण, वृक्ष कटान और अवैज्ञानिक बांध व हाईवे निर्माण ने पहाड़ की समस्याओं को और बढ़ा दिया है। नदियों के किनारे और ढलानों पर अंधाधुंध निर्माण से भूस्खलन, जलस्रोतों के सूखने और पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन जैसी गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। बिना पर्यावरणीय संवेदनशीलता के किए गए ये प्रोजेक्ट पहाड़ की नाजुक भौगोलिक संरचना के लिए खतरा बन गए हैं।

इस सबके कारण पहाड़ के हजारों गांव विशेषत: उत्तराखंड में ‘घोस्ट विलेज’ बन चुके हैं। वहां अब बस टूटे हुए मकान, सूखे खेत और यादें रह गई हैं। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी है। समाधान की दिशा : अब जरूरत है समग्र और स्थानीय समाधान की। विकास की योजना दिल्ली या देहरादून, शिमला या श्रीनगर में नहीं, बल्कि गांव के स्तर पर बने, ‘लोकल एक्शन प्लान’ के रूप में। 1. स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार : पहाड़ में कृषि, उद्यानिकी और औषधीय पौधों में अपार संभावनाएं हैं। बुरांश, जड़ी-बूटी, शहद, खस घास और बांस जैसे उत्पादों से मूल्य संवर्धन कर छोटे उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। इससे युवाओं को गांव में ही काम मिलेगा। कृषि क्षेत्र में मोटे अनाज जिन्हें पहाड़ के लोग न सिर्फ पारंपरिक खेती के रूप में उगाते थे, बल्कि वही उनके भोजन का मुख्य अंश भी थे, अब जैसे जैसे स्वास्थ्यवर्धक भोज्य पदार्थों की जानकारी बढ़ी है, मोटे अनाज यानी जौ, कोदा, कंगनी, चिना, चौलाइ, कुटु, झींगोरा, नाचनि, ज्वार, बाजरा, जिनकी न सिर्फ औषधीय गुणों के चलते मांग बढ़ी है बल्कि वो पर्वतीय कृषि अर्थव्यवस्था का संबल बन सकते हैं, जरूरत है इनके संवर्धन की, ताकि पहले इन्हें खेत में प्रतिस्थापित किया जाए, फिर उचित विपणन व्यवस्था से समर्थन मूल्य के माध्यम से इनके श्रीअन्न के दर्जे को ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था का स्तंभ बनाया जा सके। उद्यानिकी के क्षेत्र में जहां ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब, कीवी, पलम, नाख (नाशपाती), खुबानी जैसे फलों की उन्नत किस्में लगा कर किसानों की समृद्धि का रास्ता उचित विपणन व्यवस्था और छोटे कोल्ड स्टोर और कोल्ड चैन विकसित करके खोला जा सकता है। मैदानी क्षेत्रों में आम और लीची जैसे परंपरागत फलों के साथ स्ट्राबेरी, ब्लू बेरी, परसीमन, ड्रैगन फ्रूट, सीता फल उगा कर इस आर्थिकी को नयी दिशा दी जा सकती है। पॉलीहाउस में बेमौसमी सब्जियों और फूलों की खेती एक सुदृढ़ विकल्प हो सकता है।

2. इको-टूरिज्म और होमस्टे मॉडल : स्वच्छ और शांत पहाड़ पर्यटन के लिए आदर्श हैं। यदि स्थानीय युवाओं को होमस्टे, बिना नए निर्माण के परम्परागत घरों से, साहसिक पर्यटन/गाइडिंग और जैविक भोजन सेवाओं से जोड़ा जाए तो यह स्थायी आजीविका का बड़ा स्रोत बन सकता है।

3. ऊर्जा आत्मनिर्भरता : छोटे हाइड्रो, सोलर और बायोगैस प्लांट्स से गांवों को बिजली दी जा सकती है। इससे न केवल ऊर्जा की समस्या सुलझेगी, बल्कि रोजगार भी उत्पन्न होगा।

4. महिला स्वावलंबन और युवा उद्यमिता : महिला स्वयं सहायता समूहों को माइक्रो फाइनेंस और प्रशिक्षण देकर हस्तशिल्प, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग जैसे कार्यों से जोड़ा जाए। युवाओं के लिए ‘पर्वतीय इनोवेशन फंड’ बनाकर स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा सकता है।

5. सडक़, स्वास्थ्य और शिक्षा का सशक्त नेटवर्क : सडक़ और संचार केवल सुविधा नहीं, बल्कि विकास का आधार हैं। टेलीमेडिसिन और ऑनलाइन शिक्षा से दूरस्थ गांवों तक आधुनिक सेवाएं पहुंचाई जा सकती हैं।

6. पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील विकास नीति : निर्माण कार्यों में पारिस्थितिक संतुलन को प्राथमिकता दी जाए। वृक्षारोपण, जल संरक्षण और पारंपरिक निर्माण तकनीकों को बढ़ावा देकर टिकाऊ विकास सुनिश्चित किया जा सकता है। जलागाम परियोजना को अधिक सहभागितापूर्ण बनाया जाए।

निष्कर्ष : पहाड़ की पीड़ा को दूर करने के लिए पहाड़ को ‘नीति का केंद्र’ बनाना होगा, न कि परिधि। समाधान बाहर से नहीं, बल्कि गांव की मिट्टी, लोक ज्ञान और स्थानीय संसाधनों से निकलेगा। पलायन तभी रुकेगा जब पहाड़ में ‘सम्मानजनक जीवन, रोजगार और आशा’ का वातावरण बनेगा। यह समय है कि हम पहाड़ को केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि ‘संभावनाओं के केंद्र’ के रूप में देखें। तभी पहाड़ मुस्कराएगा, और उसकी पीड़ा सचमुच दूर होगी। पहाड़ों पर प्रकृति का संरक्षण करना निहायत ही जरूरी है। अगर प्रकृति से छेड़छाड़ इसी तरह जारी रही, जिस तरह पहाड़ों के सीने बेरहमी से छलनी हो रहे हैं, तो वे दिन दूर नहीं जब पहाड़ों पर पहले से जारी तबाही और भी भयंकर रूप धारण कर लेगी।

डा. राकेश कपूर

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