अंतर्राष्ट्रीय

पाकिस्तानी जमीन को ‘छीनने’ की चीन और अमेरिका में लगी रेस, विदेशी कंपनियां देश से क्यों कर रहीं पलायन?

इस्लामाबाद: पाकिस्तान में पिछले कुछ महीनों से विदेशी कंपनियों का तेजी से पलायन शुरू हो गया है। एक के बाद एक इंटरनेशनल कंपनियां देश छोड़कर बाहर जा रही हैं। प्रॉक्टर एंड गैंबल ने करीब तीन दशक बाद अपने पाकिस्तान में अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। माइक्रोसॉफ्ट 25 साल बाद बंद हो गया है। शेल बिक गया। टेलीनॉर, उबर, कैरीम और फाइजर, बायर और सनोफी जैसी दवा कंपनियाों ने पाकिस्तान में अपना बोरिया बिस्तर बांध लिया है। विदेशी कंपनियों का यह पलायन अभूतपूर्व है और इनके जाने से पता चलता है कि पाकिस्तान में विदेशी कंपनियों का भविष्य नहीं बचा है।

विदेशी कंपनियों के बाहर निकलने से देश में बेरोजगारी और तेजी से बढ़ी है। लेकिन जहां एक तरफ विदेशी कंपनियां देश से भाग रही हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार अपनी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को विदेशी ताकतों के हाथों गिरवी रख रही है। पहले चीन पाकिस्तान में जमीन छीनने के लिए हर कथकंडे अपना रहा था और अब अमेरिका भी इस रेस में शामिल हो चुका है।

पाकिस्तान से विदेशी कंपनियों का पलायन
पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता, लगातार बदलते नियम, विदेशी मुद्रा नियंत्रण, जटिल टैक्स व्यवस्था, ऊर्जा संकट और सुरक्षा जोखिमों ने मिलकर देश को निवेशकों के लिए काफी मुश्किल बना दिया है। लेकिन सबसे बड़ा झटका घटती खपत ने दिया है। यानि पाकिस्तान के अंदर लोगों ने सामान खरीदना काफी कम कर दिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह देश की 42 प्रतिशत आबादी का गरीबी रेखा से नीचे होना है। जब 42 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जी रही हो, तब मल्टीनेशनल कंपनियों को ग्राहकों की उम्मीद कहां से मिलेगी?

देश में एक तरफ जहां मल्टीनेशनल कंपनियां ढहते बाजार से भाग रही हैं, वहीं पाकिस्तान एक हताश जमींदार की तरह अपनी जमीन बेच रहा है। ग्वादर बंदरगाह सहित बलूचिस्तान की 2,000 एकड़ से ज्यादा जमीन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के समझौते के तहत 40 साल से ज्यादा समय के लिए चीन को पट्टे पर दे दी गई है। इस क्षेत्र में अब चीन के पास ही टैक्स वसूलनों और तमाम ऑपरेशंस को संभालने का अधिकार दे दिया गया है। यानि पाकिस्तान ने अपनी संप्रभुता को अस्तित्व के लिए बेच दिया गया है।

चीन वाले खेल में उतरे डोनाल्ड ट्रंप
अब डोनाल्ड ट्रंप भी इस खेल में उतर आए हैं। 2025 में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान से दुर्लभ खनिजों के नमूने लेकर ट्रंप को लुभाने की कोशिश की थी। पाकिस्तान के सैन्य नियंत्रण वाले फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गनाइजेशन और मिसौरी स्थित यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स के बीच 50 करोड़ डॉलर के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गये हैं। ट्रंप कलम लेकर आए और पाकिस्तान ने उन्हें अपनी खनिज संपदा की चाबियां सौंप दीं। उन्होंने चीन को पछाड़ दिया है और सबसे बड़ा जमीन हड़पने वाला देश बन गए हैं।

जबकि इसकी तुलना जब पाकिस्तान के पड़ोसी देशों से करते हैं तो पता चलता है कि भारत हर साल 70 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित करता है, वहीं वियतनाम में 23 अरब डॉलर और बांग्लादेश में 3.4 अरब डॉलर आता है। पाकिस्तान मात्र 683 मिलियन डॉलर पर अटका हुआ है। 22 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में चीन और अमेरिका के बीच जमीन हड़पने की रेस शुरू हो चुकी है, लेकिन विदेशी कंपनियों के जाने से आने वाले वक्त में पाकिस्तान में स्थिति और ज्यादा खराब होगी।

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