लेख

पुस्तक मेले में जाइए, बच्चों के लिए हिंदी किताबें लाइए

अगर आपको हिन्दी से प्रेम है तो कुछ ऐसा कीजिए, जिससे बच्चों को हिन्दी भाषा का चस्का लग जाए। उन्हें हिन्दी बोलने ही नहीं, पढऩे और लिखने में रस आना शुरू हो जाए। उनके लिए हिन्दी सिर्फ गपियाने और गलियाने की ही नहीं, बल्कि अपने आपको और देश-दुनिया को समझने-समझाने की भाषा बन जाए। उन्हें हिन्दी बोलने में झेंप न आए। बिना वजह टूटी-फूटी अंग्रेजी न बोलें। यह तब होगा जब हिन्दी में बच्चों के लिए अच्छा साहित्य उपलब्ध हो। और वह तब होगा, जब हिंदी के बेहतरीन लेखक बच्चों के लिए लिखें। अंग्रेजी में बाल साहित्य की महिमा है। हैरी पॉटर लिखने वाली जे.के. राउलिंग या फिर ग्रफलो की रचयिता जूलिया डोनाल्डसन दुनिया भर में शोहरत पाती हैं। बंगला, मराठी और मलयालम में भी बाल लेखन की परंपरा रही है। लेकिन हिंदी के बाल साहित्य के लेखक को तो उसकी गली में भी कोई नहीं पूछता। साहित्यकारों की दुनिया में भी छोटे बच्चों के लिए लेखन को छोटा लेखन समझा जाता है। 

नतीजतन, हिंदी के बाल साहित्य में कई दशकों तक ठहराव रहा। आधुनिकता का मतलब समझा जाता है अंग्रेजी। इसलिए बच्चों को अंग्रेजी से अनूदित ऐसी कहानियां पढ़ाई जाती हैं, जिनके संदर्भ, कथानक और पात्रों का भारतीय बच्चों से कोई संबंध नहीं। अपने ‘स्व’ से अलगाव से शुरू होता है एक औसत हिंदुस्तानी का हीनता बोध, जो अक्सर फूहड़ और आक्रामक स्वरूप लेता है।लेकिन अच्छी खबर यह है कि हालात बदल रहे हैं। पिछले 10-15 बरस में भारत के बाल साहित्य का कायाकल्प हो गया है। शुरुआत अंग्रेजी से हुई, जहां सुनहरी बालों और नीली आंखों वाले गोरे बच्चों की बजाय हमारे सांवले बच्चों के सलोने या फिर खट्टे-मीठे जीवन पर कहानियां लिखी जाने लगीें। एक जमाने में भारत सरकार के नैशनल बुक ट्रस्ट और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट ने भी यह शुरुआत की थी लेकिन फिर वह सरकारी तंत्र में कहीं दब गईं। पिछले कुछ साल से कुछ संस्थानों के प्रयास से हिंदी में बदलाव की बयार बह रही है। 

दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में आप हिंदी के नए बाल साहित्य की झलक देख सकते हैं। यूं तो मेले के 6 नंबर हॉल में पेश बाल साहित्य में अंग्रेजी और अंग्रेजी से अनूदित साहित्य का बोलबाला है लेकिन अगर आप उस चमक-धमक में ‘इकतारा’ और ‘एकलव्य’ की सादी स्टाल को ढूंढ पाएं तो आपको हिंदी के बाल साहित्य की नई चमक दिखाई देगी। 

‘इकतारा’ के जुगनू प्रकाशन ने निस्संदेह हिंदी के बाल साहित्य के अंधकार में जुगनू की तरह रौशनी फैलाई है। इस एक स्टाल से आप बच्चों के लिए एक शानदार लाइब्रेरी बना सकते हैं-नन्हे बच्चों के लिए शब्दरहित चित्र पुस्तकें, नाना प्रकार और आकार की कहानी और कविता की पुस्तकें, पोस्टर, कैलेंडर, कविता कार्ड, किशोर अवस्था के लिए उपन्यास और बहुत कुछ। उनकी दोनों बाल पत्रिकाएं-बच्चों के लिए ‘प्लूटो’ और किशोरों के लिए ‘साइकिल’ पढ़कर आप खुद भी लुत्फ ले सकते हैं। इसी तरह एकलव्य की स्टाल पर आपको हिंदी के बाल साहित्य का ‘पिटारा’ मिलेगा। ग्रामीण बच्चों के लिए विज्ञान शिक्षण से शुरू हुई यह संस्था बच्चों के लिए कथा साहित्य भी प्रकाशित कर रही है, नए प्रयोग कर रही है, देश के हर कोने और समुदाय के बच्चों के अनुभव को समेट रही है। ज्ञानवर्धक सामग्री और मनोरंजन से भरपूर उनकी बाल विज्ञान पत्रिका ‘चकमक’ किसी भी स्कूल ले लिए अनिवार्य होनी चाहिए। 

‘मुस्कान’ का अपना स्टाल नहीं है लेकिन अंतिम पायदान पर बैठे कूड़ा बीन रहे बच्चों की आपबीती आपको उनकी किताबों में दिखेगी। प्रथम बुक्स में भी आपको भारतीय संदर्भ में बसी हिंदी की सुंदर और सुसज्जित किताबें मिलेंगी। हालांकि उनमें से ज्यादातर अनूदित हैं लेकिन अनुवाद अच्छा होने के कारण खटकता नहीं। अगर आप नैशनल बुक ट्रस्ट और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट में उनकी पुरानी किताबें खोजेंगे तो आपको कुछ काम की किताबें मिल सकती हैं। हिंदी के बड़े व्यावसायिक प्रकाशकों को अभी तक बाल साहित्य में दिलचस्पी नहीं जगी है।
अच्छी खबर यह भी है इधर ङ्क्षहदी के नामचीन लेखकों ने भी बच्चों के लिए लिखा है। गीतकार और शायर गुलजार तो पिछले कई दशकों से बच्चों के लिए लिख रहे हैं। जुगनू प्रकाशन उनकी 14 नई कहानियों का एक सैट लेकर आया है जिसमें एलेन शॉ के चित्रों ने जान डाल दी है। हर किताब का अपना अलग अंदाज है और अलग पाठक वर्ग है। बहुत कम लोग जानते हैं कि हिंदी के मूर्धन्य लेखक विनोद कुमार शुक्ल, जिनका हाल ही में निधन हुआ, उन्होंने अपने अंतिम वर्षों में बच्चों के लिए कविताएं, कहानियां और उपन्यास लिखे। इन दिनों हिंदी के स्थापित लेखक और साहित्यकार अरुण प्रकाश, प्रियंवद, राजेश जोशी, असगर वजाहत, प्रयाग शुक्ल, कृष्ण कुमार, उदयन वाजपेयी और लाल्टू भी बच्चों के लिए लिख रहे हैं। 

साथ ही बच्चों के लिए लिखने वाले कुछ लेखक भी अब धीरे-धीरे दुनिया की नजर में आने लगे हैं। इनमें मेरे प्रिय लेखक हैं सुशील शुक्ल, जिनकी सीधी-सरल कविताएं गुदगुदाने के साथ दिमाग की खिड़की भी खोल देती हैं। बाल लेखन के सितारों में शशि सबलोक, प्रभात, चन्दन यादव और वरुण ग्रोवर के नाम जोड़े जा सकते हैं। बच्चों की किताबों की जान है चित्रांकन। अब तापोशी घोषाल, प्रशांत सोनी, राजीव आईपे सरीखे कलाकारों की एक जमात उभर रही है, जो बच्चों की किताबों को आकर्षक बना रही है। आप भी इस पुस्तक मेले में जाइए और बच्चों को बर्थडे गिफ्ट में हिंदी किताबें देना शुरू कीजिए। एक सरकारी हिंदी दिवस पर उसकी पूजा करने से हिंदी का उत्थान होने वाला नहीं है। अगर आप मन से अपनी भाषा की समृद्धि चाहते हैं तो हिंदी के राष्ट्रभाषा होने के झूठे दावे से बाज आइए। राजभाषा की हैसियत से बाकी भारतीय भाषाओं पर धौंसपट्टी मत कीजिए। हिंदी-उर्दू के झूठे झगड़े को बंद कीजिए। बच्चों को मातृभाषा के उपदेश न दीजिए। बस हिंदी का इस्तेमाल करना शुरू कर दीजिए।-योगेन्द्र यादव

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button