संपादकीय

पैसों का ही राज आ गया है… विकास शब्द पर बंदी लाओ!

मुंबई समेत २९ महानगरपालिकाओं के नतीजे आए समय हो गया। मुंबई में शिवसेना-मनसे की सत्ता नहीं आई, लेकिन भाजपा की सत्ता पर अंकुश रहे, इतने सौ से ज्यादा नगरसेवक विरोधी पार्टियों से चुनकर आए हैं। इनमें शिवसेना-मनसे का आंकड़ा ७१ है। अर्थात मुंबई के मराठी लोगों ने निश्चित ही ‘ठाकरे’ ब्रांड को बड़ी संख्या में मतदान किया है!
महानगरपालिका में भी सत्ताधारियों ने वोटों की और जीत की लूटमार की। उन्होंने मुंबई समेत सभी महानगरपालिकाओं में विपक्ष की जीत चुरा ली। इसके दो उदाहरण देता हूं।
कुलभूषण वीरभान पाटील जलगांव शिवसेना (उद्धव ठाकरे) जिलाप्रमुख हैं। जलगांव शहर महानगरपालिका चुनाव में पाटील ने प्रभाग क्रमांक दस से चुनाव लड़ा। जब वोटों की गिनती खत्म हुई तो पाटील और शिवसेना के दो उम्मीदवार जीत गए। ईवीएम मशीन की गणना के अनुसार वे चुनकर आ गए, लेकिन चुनाव निर्णय अधिकारी ने जीत का नतीजा जाहिर नहीं किया और काफी समय बिताने के बाद किसी दूसरे ही उम्मीदवार को विजयी घोषित कर दिया। जब ईवीएम बैलट यूनिट पर अंकित वोट दिखाए बिना ही नतीजे घोषित किए गए तब मतगणना केंद्र पर हंगामा मच गया। उम्मीदवार को पुनर्मतगणना का अधिकार होने के बावजूद पाटील द्वारा की गई पुनर्मतगणना की मांग को ठुकरा दिया गया। पाटील और उनके कार्यकर्ताओं ने बार-बार दोबारा मतगणना का आग्रह किया तो बड़ी संख्या में पुलिस बल बुलाया गया और उम्मीदवारों व उनके समर्थकों को मतदान केंद्र से खींचकर बाहर निकाला और बेरहमी से लाठीचार्ज किया। इस तरह से चुनाव निर्णय अधिकारियों ने जलगांव महानगरपालिका में घोटाला किया।
दूसरा उदाहरण पुणे के वसंत अर्थात तात्या मोरे का है। वे पुणे में एक बेहतरीन संगठक के तौर पर जाने जाते हैं। मोरे ने शिवसेना उम्मीदवार के तौर पर कोंढवा प्रभाग से उम्मीदवारी भरी थी। मोरे को जीत का पूरा भरोसा था। वोटों की गिनती चल रही थी और मोरे आगे चल रहे थे। मोरे ने २० हजार से ज्यादा वोटों की बाजी मारी और अचानक ‘ईवीएम’ मशीन बंद हो गई है, ऐसा चुनाव निर्णय अधिकारियों की ओर से कहा गया। ‘‘यह अचानक और आखिरी स्टेज में वैâसे हुआ?’’ यह मोरे का सवाल था। इसका जवाब चुनाव अधिकारियों के पास नहीं था। आखिरी एक-दो इवीएम की मतगणना बाकी रहने के दौरान ऐसा हुआ। नई मशीनें लाई गई हैं। उनमें पुरानी मशीन की ही चिप डालकर वोटों की गणना करेंगे, ऐसा बताया गया। जिस ‘ईवीएम’ में चिप डाली गई, उसी ने मोरे की हार में हाथ बंटाया। यह चुनाव निर्णय अधिकारियों की मनमानी के कारण हुआ। वसंत मोरे के मामले में असली गड़बड़ अभी बाकी है। प्रभाग क्रमांक ३८ में कुल मतदान करनेवालों की कुल संख्या ७९ हजार ८२६ बताई गई। चुनाव अधिकारी श्रीमती करमरकर ने आधिकारिक रूप से इसकी घोषणा की, लेकिन प्रत्यक्ष वोटों की गिनती के समय सिर्फ ७८ हजार ७१८ वोट ही गिने गए। यानी १,१०८ वोट कम हुए और वसंत मोरे लगभग इतने ही वोटों के अंतर से हार गए। इस तरह का चमत्कार मुंबई, ठाणे, कल्याण-डोंबिवली, पुणे समेत कई जगहों पर हुआ। इसे क्या लोकतंत्र कहा जाए? सदन में भाजपा के कामकाज पर सवाल उठानेवाले वसंत मोरे समेत कई विपक्षी उम्मीदवारों को इसी तरह से पराजित किया गया!
चूहों की भगदड़!
महानगरपालिका चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से नहीं हुआ। चुनावी यंत्रणा बेच दी गई। पुलिस पर दबाव था ही। चुनाव से पहले सत्ताधारियों ने ७० नगरसेवक निर्विरोध चुन लिए और नतीजे आने के बाद, जो चुने गए, उनमें से अधिकांश लोगों को पैसों के बल पर गले लगाया और जो गए, वे भी शहर के विकास के नाम पर सत्ताधारियों के साथी बन गए।
कल्याण-डोंबिवली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राजू पाटील शिंदे गुट के खिलाफ लड़े और नतीजे आते ही सीधे उसी शिंदे गुट में शामिल हो गए। हाल की राजनीति में कोई किसी का नहीं रहा। राजू पाटील अब ‘विकास’ के मुद्दे पर शिंदे गुट के साथ चले गए हैं। विकास के नाम पर लोकतंत्र को और क्या-क्या सहना पड़ेगा? भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण की मनमानी और गंदी राजनीति से तंग आकर राजू पाटील मनसे को शिंदे के पाले में ले गए। रवींद्र चव्हाण निचले स्तर की राजनीति करते हैं। उन्हें सबक सिखाने के लिए मनसे ने कल्याण-डोंबिवली में शिंदे गुट को समर्थन दिया। इसमें ‘विकास’ का मुद्दा कहां आता है? ऐसी गंदी राजनीति में ‘विकास’ शब्द बदनाम हो गया है। अजीत पवार से लेकर अशोक चव्हाण तक भाजपा की वॉशिंग मशीन में जाने वाले सभी लोग ‘विकास’ के नाम पर पार्टी छोड़कर चले गए। ‘विकास’ शब्द पर पाबंदी लगाई जाए, ऐसा यह सारा मामला है। मौजूदा राजनीति में मानसिक अस्थिरता और मनोरोगियों की संख्या बढ़ गई है। कुछ दे रहे हो तभी पार्टी में रहेंगे, नहीं तो चले जाएंगे, ऐसा पार्टी नेतृत्व से कहनेवाले चूहों की भगदड़ शुरू हो गई है।
अंबरनाथ नगरपालिका में कांग्रेस के बारह नगरसेवकों ने भाजपा से असंग किया तो पार्टी ने उन सभी को निलंबित कर दिया। शहर का विकास किसी की वजह से नहीं रुकता और किसी के पार्टी बदलने से विकास की रफ्तार नहीं बढ़ती, यह मेंढक की तरह कूदनेवालों को याद रखना चाहिए। मशाल पर चुनकर आए हुए दो लकड़ी के कुंदे भी उसी प्रवाह में बह गए। उन्होंने मतदाताओं को हल्के में ले लिया। हम कुछ भी करें, वैâसा भी बर्ताव करें, मतदाता हमें फिर से चुनेंगे, इसी भ्रम में सब हैं। उन्हें मुंबई के नतीजों पर गौर करना चाहिए। शिंदे के साथ गए शिवसेना के ज्यादातर नगरसेवक हार गए। कल कल्याण-डोंबिवली में भी ऐसा हो सकता है।
मुंबई का महापौर
मुंबई का महापौर पद हमें ही मिले इसके लिए एकनाथ शिंदे और उनके लोग दिल्ली में चक्कर लगाने लगे। खुद को शिवसेना कहने वाले लोग ‘महापौर’ पद के लिए दिल्ली में बारंबार हाजिरी लगा रहे हैं, इसमें बालासाहेब ठाकरे का अपमान है। शिंदे ने महाराष्ट्र के चुनाव और राजनीति को विकृत स्तर पर ला दिया है। उनकी तरफ से लड़ने वाले उम्मीदवारों को पांच-पांच करोड़ दिए गए और उसके बाद हुई जोड़-तोड़ में भी हर एक को उतनी ही रकम दी गई। बिन विरोध के खेल में और ‘ताज’ में रखे गए नगरसेवकों पर करोड़ों रुपए खर्च हुए वो अलग। कल तक जो राजनीति समाज के लिए होती थी, अब सिर्फ पैसों के लिए हो रही है। शिंदे और भाजपा के पास इफरात और बेहिसाब पैसा है। जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे अब चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, ऐसी स्थिति सत्ताधारियों ने कर रखी है। एक पार्टी से चुनकर आए हुए लोग बाजार में ‘माल’ बनकर बिकने के लिए सुसज्ज हो जाते हैं और उन्हें खरीदने वाले बोली लगाते हैं, वो भी जनता के ही पैसों पर। भ्रष्ट पैसे से ‘राज्यव्यवस्था’ खरीदी जा रही है। दादा धर्माधिकारी कहते थे कि पैसे का राज वेश्या का राज है, लेकिन ‘‘इनकी अपेक्षा तो वेश्या भली’’ ऐसा शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे का कहना था। उन्हीं बालासाहेब का जन्मशताब्दी वर्ष है इसलिए मुंबई का महापौर पद हमें दे दो, ऐसी याचना लेकर शिंदे भाजपा से बहस कर रहे हैं। मुंबई पर पैसे का राज नहीं होना चाहिए!

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