प्रतिभा की खोज पदक जीतने के बाद क्यों?

गीता और बबीता फोगाट सहित कई खिलाडिय़ों ने ऐसे माहौल में प्रशिक्षण लिया, जहां लड़कियों का अखाड़े में उतरना ही सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देना था। शुरुआती दौर में महिला पहलवानों के लिए उपयुक्त सुविधाओं का अभाव भी था। निशानेबाजी में प्रतिभा तलाशने की कल्पना कीजिए। एक गरीब ग्रामीण परिवार की बेटी के पास न महंगी राइफल खरीदने के पैसे हैं, न नियमित अभ्यास के लिए आधुनिक रेंज तक पहुंचने के साधन। यदि वह उधार के उपकरणों से अभ्यास करती है, तो उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत प्रतिभा की कहानी नहीं, बल्कि हमारी संस्थागत उदासीनता का आईना भी है…
भारतीय खेल नीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अक्सर खिलाड़ी की पहचान उसके पदक जीतने के बाद करते हैं। पदक समारोह में सम्मान, नकद पुरस्कार, सरकारी नौकरी और सुर्खियां मिलती हैं। लेकिन उससे पहले वर्षों तक खिलाड़ी और उसका परिवार आर्थिक अनिश्चितता, महंगे उपकरण, यात्रा खर्च, पोषण की कमी और प्रशिक्षण सुविधाओं के अभाव से लड़ते रहते हैं। हरियाणा की महिला कुश्ती इसका उदाहरण है। गीता और बबीता फोगाट सहित कई खिलाडिय़ों ने ऐसे माहौल में प्रशिक्षण लिया, जहां लड़कियों का अखाड़े में उतरना ही सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देना था। शुरुआती दौर में महिला पहलवानों के लिए उपयुक्त सुविधाओं का अभाव भी था। निशानेबाजी में प्रतिभा तलाशने की कल्पना कीजिए। एक गरीब ग्रामीण परिवार की बेटी के पास न महंगी राइफल खरीदने के पैसे हैं, न नियमित अभ्यास के लिए आधुनिक रेंज तक पहुंचने के साधन। यदि वह उधार के उपकरणों से अभ्यास करती है, तो उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत प्रतिभा की कहानी नहीं, बल्कि हमारी संस्थागत उदासीनता का आईना भी है। यही प्रश्न उन बेटियों के लिए भी है जो गांव के अखाड़ों, अस्थायी प्रशिक्षण स्थलों और सीमित संसाधनों में अभ्यास करती हैं। यदि माता-पिता को बेटी के खेल के सपने के लिए जमीन या पशुधन बेचने की नौबत आए, तो क्या इसे परिवार का त्याग कहकर छोड़ देना चाहिए? या यह पूछना चाहिए कि सार्वजनिक खेल व्यवस्था आखिर किसके लिए है? राष्ट्रीय स्तर पर जुलाई 2025 में घोषित खेलो भारत नीति 2025 में भी जमीनी खेल ढांचे, शुरुआती प्रतिभा पहचान और समावेशी खेल अवसरों पर जोर दिया गया है। अब चुनौती इन उद्देश्यों को जमीनी स्तर पर लागू करने की है।
खेल नीति में बदलाव के पांच जरूरी कदम
पहला, गांव से प्रतिभा की खोज। स्कूलों, पंचायतों और स्थानीय खेल क्लबों के माध्यम से नियमित प्रतिभा पहचान अभियान चलाए जाएं। केवल जिला मुख्यालयों या पहले से स्थापित अकादमियों तक सीमित चयन व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। दूसरा, पदक से पहले निवेश। उभरते खिलाडिय़ों को छात्रवृत्ति, पौष्टिक भोजन, जूते, खेल उपकरण, यात्रा भत्ता और प्रशिक्षित कोच उपलब्ध कराए जाएं। आर्थिक सहायता का आधार केवल पिछली उपलब्धियां नहीं, बल्कि प्रतिभा, प्रशिक्षण की जरूरत और परिवार की आर्थिक स्थिति भी होनी चाहिए। तीसरा, बेटियों के लिए सुरक्षित सुविधाएं। महिला प्रशिक्षक, सुरक्षित छात्रावास, स्वच्छ शौचालय, उचित परिवहन और शिकायत निवारण व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। माता-पिता का भरोसा जीते बिना ग्रामीण बेटियों की खेल भागीदारी बढ़ाना कठिन होगा। चौथा, हिमाचल के लिए क्षेत्र-विशिष्ट मॉडल। दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण केंद्र विकसित हों। हर जगह महंगा स्टेडियम बनाने के बजाय उपयोगी मैदान, प्रशिक्षित कोच, खेल सामग्री और नियमित प्रतियोगिताओं को प्राथमिकता दी जाए। पांचवां, जवाबदेही और पारदर्शिता। खेल बजट का कितना हिस्सा ग्रामीण प्रतिभा, महिला खिलाडिय़ों, प्रशिक्षकों और जमीनी सुविधाओं पर खर्च हुआ, इसका सार्वजनिक विवरण उपलब्ध कराया जाए। खिलाडिय़ों को समय पर सहायता देने और शिकायतों का समाधान करने की व्यवस्था भी हो।
असली जीत तब होगी, जब कोई प्रतिभा पीछे न छूटे
भारत की बेटियों ने बार-बार सिद्ध किया है कि प्रतिभा किसी महानगर, महंगे स्टेडियम या संपन्न परिवार की बपौती नहीं है। कभी मिट्टी के अखाड़े से निकलकर, कभी सीमित संसाधनों में मुक्केबाजी सीखकर, तो कभी कठिन परिस्थितियों के बावजूद निशाना साधकर उन्होंने दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई है। हिमाचल सहित पूरे देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने की जरूरत है। खेलों के प्रति अनुकूल वातावरण की जरूरत है। एशियाई खेलों की ही बात करें तो भारत को अभी चीन के मुकाबले में अव्वल बनने के लिए काफी कुछ करना शेष है।
डा. राकेश कपूर




