फॉर्म छह का ‘अवैध’ इस्तेमाल

अभी तो चुनाव आयोग को सर्वोच्च अदालत के सवालों के जवाब देने हैं, लेकिन उसके भीतर ही नए, गंभीर विरोधाभास उभर आए हैं। ताजातरीन मामला महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) एस. चोकलिंगम का है। उन्होंने चुनाव आयोग को सुझाव भेजा है कि फॉर्म 6 से ‘नए मतदाता के लिए’ शब्द हटा दिए जाएं, क्योंकि उसका गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। मतदाताओं के दोबारा पंजीकरण के लिए भी फॉर्म 6 भरवाया जा रहा है, जबकि घोषित, कानूनी रूप से फॉर्म 6 उन्हीं से भरवाया जाना चाहिए, जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं और पहली बार मतदाता बन रहे हों। जिन पुराने मतदाताओं के नाम ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) की प्रक्रिया के दौरान छूट गए अथवा काट दिए गए, उनसे भी फॉर्म 6 भरवा कर ‘गलत घोषणा’ कराई जा रही है कि वे पहली बार मतदाता बन रहे हैं। वे इससे पहले कभी भी मतदाता नहीं रहे। यही गंभीर, कानूनी विरोधाभास है। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 के मुताबिक, फॉर्म 6 में ‘गलत घोषणा’ करना दंडनीय अपराध है। ऐसे मतदाता को 1 साल की जेल हो सकती है। जुर्माने का भी प्रावधान है। जेल और जुर्माने की सजाएं एक साथ भी दी जा सकती हैं। विरोधाभास के साथ सवाल भी है कि चुनाव आयोग फॉर्म 6 की व्यवस्था बदल नहीं रहा और एक राज्य के सीईओ सरीखे शीर्ष अधिकारी ने मौजूदा शब्दावली और व्यवस्था को ‘गलत, अवैध’ करार देते हुए उसे बदलने का प्रस्ताव भेजा है। सवाल है कि क्या चुनाव आयोग फॉर्म 6 में कोई भी बदलाव कर सकता है? क्या पुराने मतदाताओं से भी, दोबारा पंजीकरण के लिए, फॉर्म 6 जबरन भरवाया जा रहा है? फॉर्म 8 के जरिए ये पंजीकरण क्यों नहीं किए जा रहे? दरअसल चुनाव आयोग फॉर्म 6 में कोई भी बदलाव नहीं कर सकता।
उसके लिए केंद्रीय कानून मंत्रालय 1960 के कानून के तहत संशोधन या बदलाव करके उसकी अधिसूचना जारी कर सकता है। यदि मामला ज्यादा पेचीदा और संवैधानिक दर्जे का है, तो संसद के पटल पर प्रस्ताव पेश और पारित कराया जा सकता है। अब फॉर्म 6 की शब्दावली बदलने और संलग्न हलफनामे को हटाने का नया बवाल उभर आया है, तो चुनाव आयोग को मंथन करना पड़ेगा। चूंकि सर्वोच्च अदालत ने भी आयोग से हलफनामे के जरिए स्पष्टीकरण मांग रखा है कि फॉर्म 6 के साथ घोषणा-पत्र नत्थी करने का आदेश कब और किसने दिया? क्या यह फैसला तीनों आयुक्तों ने सर्वसम्मति से लिया अथवा सीईसी का ही फैसला था? इनके जवाब प्रमाण सहित देने पड़ेंगे, लिहाजा पुरानी शब्दावली हटाने का जोखिम भी आयोग नहीं ले सकता। अंतत: गंभीर और संवैधानिक सवाल है कि ‘विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण’ (एसएसआर) के जरिए देश के 17 राज्यों एवं संघशासित क्षेत्रों में जिन मतदाताओं के नाम नए सिरे से जोड़े जा रहे हैं, क्या उन्हें फॉर्म 6 के जरिए ही पंजीकृत किया जा रहा है? यह प्रक्रिया पूर्णत: ‘अवैध’ है। चुनाव आयोग की लंबी खामोशी से समस्या का समाधान नहीं मिलेगा, लिहाजा सीईसी और दोनों चुनाव आयुक्तों को एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर धुंध को साफ करना चाहिए। आयोग देश से बड़ा और महत्वपूर्ण नहीं है। उसे अपनी छवि और प्रतिष्ठा की रक्षा करनी चाहिए। अभी तक एसआईआर में करीब 13.37 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जा चुके हैं। उनमें करीब 2.80 करोड़ ‘दिवंगत’ हो चुके हैं। यह छंटनी अपरिहार्य है। शेष 10.57 करोड़ नाम मतदाता सूचियों में फिर जोड़े जा सकते हैं, यह हमारा भरोसा है, क्योंकि एक भी नागरिक को ‘मताधिकार’ के संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इनमें करीब 6.30 करोड़ मतदाता ‘शिफ्ट’ माने जा रहे हैं। वे देश में कहीं और स्थानांतरित हो गए होंगे, क्या नई जगह उनका वोट बना है? महाराष्ट्र के सीईओ का यह सुझाव भी है कि ऐसे मामलों में मतदाता के पुराने ‘एपिक’ नंबर का इस्तेमाल करने की भी अनुमति दी जाए। यह ‘एपिक’ मतदाता पहचान पत्र पर अंकित होता है। दरअसल एसआईआर प्रक्रिया ही एक ‘मजाक’ साबित हुई है। उस पर रोक लगा देनी चाहिए, क्योंकि एसएसआर ही पर्याप्त है। सवालिया यह भी है कि सर्वोच्च अदालत ने अभी तक इस संवैधानिक समस्या पर कोई फैसला लेकर आयोग को आदेश क्यों नहीं दिया? क्या 27-28 अक्तूबर वाली तारीख पर ऐसी कोई पहल की जा सकती है? जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे गए हैं, उन मतदाताओं को वोट का अधिकार देना होगा और उनके नाम दोबारा से जोडऩे होंगे।




