राष्ट्रीय

बंदा बहादुर व साथियों पर सन्नाटा क्यों?

क्या हम बंदा बहादुर के साथ अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़े जाने वाले सैनिकों के नाम तलाश नहीं सकते। उनकी पीढिय़ां तो अभी भी विद्यमान हैं। आशा है इस दिशा में कुछ काम होगा…

तीन दिन पहले उन बंदा बहादुर जी की जयंती थी जिसने सैकड़ों साल बाद भारत में मुगलों का सामना करने की सन् 1000 से चली आ रही रणनीति बदल दी थी और इसमें उन्हें अभूतपूर्व सफलता मिली थी। देश के विभिन्न हिस्सों में उनकी जयंती अत्यन्त उत्साह पूर्वक मनाई गई। लेकिन देश के विश्वविद्यालयों के डिफेंस स्टडीज विभागों में कहीं बन्दा बहादुर को लेकर चर्चा या कोई सेमिनार हुआ हो, ऐसी सूचना कम से कम मेरे पास नहीं है। मैंने कुछ स्थानों पर फोन कर यह सूचना एकत्रित करने की कोशिश भी की। बंदा बहादुर जम्मू कश्मीर के पुंछ क्षेत्र के रहने वाले थे। जम्मू कश्मीर सुरक्षा के लिहाज से भी और सुरक्षात्मक रणनीति के हिसाब से भी बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। एक ओर चीन और दूसरी ओर पाकिस्तान। वहां के विश्वविद्यालयों या महाविद्यालयों ने बन्दा बहादुर का नोटिस लिया हो, ऐसी कोई सूचना नहीं है। अरबों, तुर्कों व मुगलों के आक्रमण काल से भारत ने आक्रमणकारियों का मुकाबला ही किया है, कभी दुश्मन के घर जाकर लड़ाई लड़ी हो, ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं। भारत सुरक्षात्मक रणनीति ही अपनाता रहा। लेकिन एक हजार सन् से चली आ रही इस सुरक्षात्मक सैनिक रणनीति को सन् 1700 के पहले दशक में बन्दा सिंह बहादुर ने पहली बार बदला। महाराष्ट्र में यह रणनीति शिवाजी मराठा ने अपनाई थी और पश्चिमोत्तर/सप्त सिन्धु में बन्दा बहादुर ने मुगलों के खिलाफ यह आक्रामक रणनीति अपनाई। सामान्य जनता की ओर से इसको जबरदस्त समर्थन मिला।

यहां तक कि इस क्षेत्र के देसी मुसलमान, जिनके पुरखे कभी मुगलों के अत्याचारों से डर कर इस्लाम पंथ या शिया पंथ में चले गए थे, वे भी मुगलों के खिलाफ बन्दा बहादुर के साथ मिल गए थे। इस नई युद्ध नीति का परिणाम भी मिला। बन्दा बहादुर ने वर्तमान पंजाब, हरियाणा और हिमाचल का बहुत बड़ा भाग मुगल सत्ता व आक्रमणकारियों से स्वतंत्र करवा लिया। नई राज्य व्यवस्था लागू की। पहली बार ‘जमीन जोतने वाले की’ का सिद्धान्त व्यावहारिक स्तर पर लागू किया गया। राज्य किसी भी व्यक्ति के मजहब में दखलन्दाजी नहीं करेगा, यह पंथ निरपेक्षता को जमीनी धरातल पर लागू किया। बन्दा बहादुर बदले की राजनीति नहीं कर रहा था, बल्कि वह तो विदेशी अन्यायी शासन व्यवस्था को हटा कर न्याय पर आधारित नया निजाम स्थापित करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन बन्दा बहादुर पूरे सप्त सिन्धु क्षेत्र की सांस्कृतिक राजधानी लाहौर को जीतने के कगार पर ही था कि अपने लोगों ने ही धोखा दे दिया। विनोद सिंह के नेतृत्व में सैकड़ों योद्धा गुरदास नंगल की गढ़ी में लड़ाई के बीच में ही अलग हो गए। मुगल शासकों से जागीरें हासिल कर लीं। आज भी इतिहास बन्दा बहादुर की सेना और खालसा के बीच विवाद के कारणों को लेकर माथापच्ची होती रहती है, लेकिन इस पर सभी सहमत हैं कि यदि विनोद सिंह और उसके सैकड़ों साथी रणभूमि के बिल्कुल बीच में से बन्दा बहादुर को छोड़ कर न जाते तो शायद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी उसी दिन से शुरू हो गई थी। बन्दा बहादुर ने लाहौर तक तो धावा बोल ही दिया था। वहां हलचल होने लगी थी। मुगल सत्ता का सिंहासन दिल्ली तक हिल गया था। मुगल बादशाह फर्रुखसियार को खुद मार्च करने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

लेकिन यह भारत माता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां घर को आग घर के ही कुछ लोग लगा देते हैं। गुरदास नंगल की गढ़ी में जब उसके सैकड़ों साथी इतिहास के उस मोड़ पर उसे छोड़ कर चले गए तो बन्दा बहादुर के पास भी विकल्प बचता था। वह भी वहां से पलायन कर सकता था। लेकिन उसने दशम गुरु गोविन्द सिंह जी को वचन दिया था कि वह अत्याचारी मुगल सत्ता को उखाड़ फेंकेगा। ऐसा उसने किया भी। उसने जो नई स्वदेशी राज्य व्यवस्था स्थापित की, उसे गुरु को ही समर्पित किया। स्वाधीन राज्य के जो सिक्के चलाए, उन पर दशम गुरु के सूत्र ही अंकित किए ताकि भावी पीढिय़ां उससे प्रेरणा ले सकें। वह सत्ता के मोह में फंस कर उसके मद से ग्रस्त नहीं हुआ। यौवन काल में उसने जो वैराग्य धारण किया था, वैराग्य की वह भावना अब सत्ता प्राप्ति के बाद भी बनी रही। सत्ता से वैराग्य बनाए रखने का काम कोई साधक या तपस्वी ही कर सकता है। शायद यही कारण था कि मुगल सत्ता को उखाड़ फेंकने और स्वदेशी सत्ता स्थापित करने का यज्ञ उसने वर्तमान हरियाणा के खरखौदा में एक वैरागी आश्रम से ही प्रारम्भ किया था। वह आश्रम आज भी विद्यमान है। अब फिर गुरदास नंगल की उसी गढ़ी को लौटें जिसको मुगलों की विशाल सेना ने घेर रखा है। जहां सप्त सिन्धु का इतिहास लिखा जा रहा है।

विनोद सिंह छोड़ कर जा चुका है। बन्दा बहादुर के कुछ साथी उसके साथ अब तक भी खड़े हैं। गढ़ी के अन्दर खाद्य सामग्री समाप्त हो गई है। घोड़े भूख से मर रहे हैं। पानी की कमी है। ये सैनिक भारतीय इतिहास के सात सौ नक्षत्र हैं जो सदा चमकते रहेंगे। बन्दा बहादुर जानता है कि कर्म करने का अधिकार उसके पास है। परिणाम या फल उसका विषय नहीं है। उसका धर्म उसका कर्म ही है। अब अंतिम युद्ध होने वाला था। गढ़ी के दरवाजे खोल दिए गए और मुगल सेना पर धावा बोल दिया गया। जैसे घने काले बादलों में बिजली क्षण भर के लिए चमकती है और फिर अन्धेरा हो जाता है, उसी प्रकार बन्दा बहादुर और उसके सैनिकों ने उसी क्षण में सैकड़ों मुगलों को यमपुरी पहुंचा दिया। लेकिन इस लड़ाई का परिणाम बन्दा बहादुर को भी पता था। मुगल सेना ने बन्दा बहादुर समेत उसके सात सौ साथियों को बन्दी बना लिया। वीर गति को प्राप्त हुए सैनिकों के सिरों को काट पर उन्हें नेजों पर टांग लिया। बन्दा बहादुर के साथ उसकी पत्नी और पांच साल के बेटे को भी बन्दी बनाया गया। दिल्ली में लाकर उनको अमानुषिक तरीके से उनकी हत्या की गई। ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर बन्दा बहादुर और उसके पुत्र को शरीर के एक एक अंग को खींच कर मारा गया। बन्दा बहादुर की पत्नी ने मुगलों की शर्तों को मानने की बजाय अपने प्राण दे दिए। यह जौहर का नया स्वरूप था। लेकिन इस आहुति का इतिहास अभी अधूरा है। बन्दा बहादुर और उनके सात सौ साथी अपना काम पूरा कर गए। उन्होंने भारत के इतिहास में अपने हिस्से का अध्याय अपने खून से लिख दिया, लेकिन उस अध्याय का दूसरा हिस्सा तो हमें लिखना था।

वह हिस्सा है, वे सात सौ सैनिक कौन थे? उनका नाम, कुल परम्परा क्या थी? कहां के रहने वाले थे? लेकिन हमने अपने हिस्से का वह अध्याय आज तक नहीं लिखा। पहला अध्याय 1700 के पहले दशक में लिखा गया था। लेकिन आज सन् 2026 हो गया है। लगभग तीन सौ साल बीत गए हैं। बन्दा बहादुर और उनके सैनिकों ने जो स्वतंत्रता यज्ञ की बलिवेदी तैयार की थी उस पर उन्होंने अपना ही बलिदान देकर पहला अध्याय लिखा था। वही अध्याय लिखना तो सर्वाधिक कठिन था, क्योंकि वह अध्याय स्याही से नहीं बल्कि अपने रक्त से लिखा जाना था। वह अध्याय पूर्ण हुआ। दूसरा अध्याय तो स्याही से ही लिखा जाना है। ब्रिटिश सरकार ने भी प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध में मारे जाने वाले भारतीय सैनिकों के नाम और विवरण संभाल कर रखे हुए हैं लेकिन क्या हम बन्दा बहादुर द्वारा अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़े जाने वाले सैनिकों के नाम तलाश नहीं सकते। उनकी पीढिय़ां तो अभी भी विद्यमान हैं। इतने विश्वविद्यालय, इतने इतिहास विभाग, इतने सेमिनार, इतने फैलोशिप, लेकिन बन्दा बहादुर और उनके सात सौ साथियों की खोजबीन पर तीन सौ साल से मौन क्यों व्याप्त है? बन्दा बहादुर तो जम्मू कश्मीर के थे। लेकिन जम्मू कश्मीर के विश्वविद्यालयों में भी उनको और उनके सात सौ साथियों को लेकर सन्नाटा ही व्याप्त है। आशा है कि इस दिशा में कुछ काम होगा।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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