ब्रिक्स और शाकाहार बनाम मांसाहार

अगर दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की मुश्किलों से बचाना है तो शाकाहार को तेजी से बढ़ावा देना होगा। इससे हमें ग्लोबल वार्मिंग से कुछ राहत मिल सकती है। शायद यही कारण रहे हों कि ब्रिक्स सम्मेलन में केवल शाकाहार परोसा गया…
12 और 13 सितंबर 2026 को हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद, संयुक्त घोषणापत्र से जुड़े असली मुद्दों- यानी उठाए गए, सुलझाए गए या नजरअंदाज किए गए मुद्दों- पर बात करने के बजाय, विपक्ष ने एक ऐसे मुद्दे पर चर्चा करना चुना जो असल में कोई मुद्दा ही नहीं है : ब्रिक्स में सिर्फ शाकाहारी खाना क्यों परोसा गया। शायद विपक्ष ब्रिक्स के एजेंडे पर चर्चा नहीं करना चाहता, क्योंकि इसमें सरकार को फायदा मिल सकता है। सरकार अलग-अलग राय रखने वाले पक्षों को कई अहम मुद्दों पर एक साथ लाने में कामयाब रही है, जैसे कि मुक्त और निष्पक्ष व्यापार, घरेलू मुद्राओं में व्यापार, और ग्लोबल वैल्यू चेन व जरूरी खनिजों को हथियार की तरह इस्तेमाल पर रोक। साथ ही, संयुक्त घोषणा पत्र में नागरिक और परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला करने वालों और व्यापारिक रास्तों को रोकने वालों की निंदा भी की गई है। इंडियन नेशनल कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी का तर्क है कि सरकार एक खास विचारधारा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है जो शाकाहार को पसंद करती है, और इसलिए वे उन लोगों को नजरअंदाज कर रहे हैं जो मांसाहारी हैं। शायद वे नरेंद्र मोदी के इस कदम के लिए आरएसएस की ओर इशारा कर रहे हैं। हालांकि, इंडी अलायंस के सहयोगी भी इस मुद्दे पर उनके साथ नहीं हैं, लेकिन किसी तरह कांग्रेस को लगता है कि उन्हें मांसाहारियों का समर्थन मिलेगा, जो उनके अनुसार आबादी का 80 प्रतिशत हिस्सा हैं। हालांकि यह कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन यह विवाद हमें शाकाहार बनाम मांसाहार के मुद्दे पर चर्चा करने का मौका देता है। स्पष्ट करना होगा कि यह लेख मांसाहार का विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य के लिए शाकाहार के महत्व को उजागर करने के लिए लिखा गया है।




