महाकुंभ में घडिय़ाल

शीतकालीन सत्र के दौरान कई महाकुंभ और कई घडिय़ाल भी देखे गए। किसी का गुस्सा और किसी की आंखों का सुरमा निकल गया। सीमाओं के बाहर उत्साह को पहली बार देखा गया, लेकिन तपोवन क्या अब इंकलाब हो गया। कहना न होगा कि मौजूदा सियासत में आम आदमी का हाल बुरा हो गया। सदन का चरित्र सडक़ पर या अब सडक़ ही सदन तक आ गई। यह इसलिए कि सदन के बाहर तख्तियां पक्ष की थीं और विपक्ष की भी थीं, बस फर्क यह कि दोनों की निगाह एक दूसरे के खिलाफ खड़ी थी। नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का यह कौनसा मुकाबला राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी से होता रहा कि सदन की तहजीब बदल गई। राजनीति शास्त्र के किसी विद्यार्थी को क्या मिला या प्रदेश को ऐसा भी क्या गिला कि सदन के बाहर जोरावर स्टेडियम की गूंज आसमान बन गई। गुस्से की गीतांजलि में जोरावर स्टेडियम में नए गीत, नए नारे बताते हैं कि भाजपा करने पर उतर आए, तो कारवां बनाना जानती है। भाजपा ने कांग्रेस की तीन साल की हुकूमत को चिकोटी काटी है, अपनी शक्ति अपनी धरती बांटी है। वो सामने सत्ता का महल और इधर हमने भी दीये जलाए हैं। ईंधन बहुत है विपक्ष के पास, इसे साबित कर गई रैली। परिवार को एकछत्र भाजपा ने साझी छत के नीचे बैठाया, तो वे सारे चेहरे मिल गए जिन्हें अगले चुनाव की सूरत में छवि बनानी है। इसे आलोचना का महाकुंभ कहें, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर बिहार की जीत पार्टी को गुदगुदाने लगी है। मंडी से कंगना रणौत की हाजिरी भले ही संसद में लगी, लेकिन प्रदेश से बाकी सभी सांसद विपक्ष के विरोध में अपनी भागीदारी का अक्स दिखाते रहे। वहां व्यक्तित्व के पहाड़, अस्तित्व के समुद्र और राज्य की उम्मीदों के दरबार सजे मिले।
बावजूद इसके हम भाजपा के किसी एक पहलवान का नाम नहीं ले सकते। सुनवाई सुक्खू सरकार की थी, इसलिए नेता प्रतिपक्ष सत्ता में आई कांग्रेस के हर व्यवहार को पकड़ते रहे। सारे विवाद एक तरफ, लेकिन मुर्गा बनाम दाल दूसरी तरफ। रैली की उमंगों में भाजपा की बांग सुनी, तो समोसे की एक टांग उछल गई। ठसाठस स्टेडियम में डा. राजीव बिंदल के संगठन की ताकत जब लहराई, तो नारेबाजों की जुबान शिखर से टकराई। बहुत सारे मुद्दे एकत्रित थे, सियासत के सारे घड़े भरे थे, इसलिए पानी पी-पी कर भाजपा ने कोसने का मंसूबा जाहिर रखा। वहां नारी संसार भारी था, तो गारंटियों में पंद्रह सौ का हक पूछा गया। कोसने में भाजपा ने कितना इत्र जाया किया, इससे इतर बात यह कि कांग्रेस अब नए प्रदेशाध्यक्ष की कमान में भाजपा के सामने कितना जोश भर पाती है। मंडी की प्रस्तावित रैली में तीन साल की सत्ता का सारांश और मिशन रिपीट के अगले दो साल कितना चलना चाहते हैं संकल्प, यह बताने की बारी है। भाजपा ने प्रश्नों की अंजुलि विधानसभा के भीतर और बाहर एक साथ भरी है। एक मुकदमा लोकतंत्र की आवाज और दूसरा जनता की आवाज में ढेरों प्रश्न पूछ रहा है। जमावड़ा विपक्ष का सदन के बाहर तक पहुंच गया, अब देखना यह है कि कांग्रेस के सिपाही कितना समय तक कदमताल करते हैं। जाहिर तौर पर इस बार केवल विधानसभा का शीतकालीन सत्र नहीं था, तपोवन परिसर के बहुत नजदीक कहने का हर क्षण, एक अवसर था। यह हिमाचल की लोकतांत्रिक छवि में इजाफा है कि यहां विपक्ष, सत्ता के सामने प्रदेश की माटी का कर्ज उतार कर पूछता है कि कितना उधार चुकाओगे, बतौर सरकार कितना फर्ज निभाओगे।




