संपादकीय

यह रोजगार ‘जीरे’ समान

हमें 2013-14 का परिदृश्य याद आ रहा है। तब नरेन्द्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार थे। वह दौर भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी का था। कमोबेश महंगाई और बेरोजगारी आज भी प्रबल हैं। बहरहाल 2014 में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मोदी ने देश को आश्वासन दिया था कि यदि उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो सालाना 2 करोड़ नौकरियां और रोजगार दिए जाएंगे। देश ने भाजपा को जनादेश दिया और मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। तब से वह इस संवैधानिक पद पर हैं, लेकिन सवा 12 साल के कालखंड में सरकार ने कुल 15 लाख से अधिक नियुक्ति-पत्र बांटे हैं। वैसे सरकार का दावा है कि कुल मिला कर करीब 17 करोड़ रोजगार सृजित किए गए हैं। आश्वासन के मुताबिक, कुल 24 करोड़ नौकरियां और रोजगार दिए जाने चाहिए थे। इसका कोई स्पष्टीकरण प्रधानमंत्री मोदी ने आज तक नहीं दिया। वैसे केंद्र सरकार में फिलहाल 8 लाख से अधिक पद खाली हैं। उन्हें क्यों नहीं भरा जाता? यह सवाल हम करते रहे हैं। प्रधानमंत्री ने निजी या सार्वजनिक उपक्रमों में भी कितना रोजगार मुहैया कराया, इसका भी कोई डाटा नहीं दिया गया है। नीति आयोग की एक रपट में यह खुलासा जरूर किया गया है कि मात्र 8.27 फीसदी स्नातकों को ही उनकी योग्यता के मुताबिक काम मिल पाया है। अर्थात शेष 91 फीसदी से ज्यादा युवा और कामगार निजी क्षेत्र में अनचाही, अनुपयुक्त, औनी-पौनी नौकरी कर रहे हैं या ठेके पर काम कर रहे हैं अथवा खेती के काम का दावा कर रहे हैं। खेती में औसतन 10,000 रुपए से कुछ अधिक की माहवार आमदनी है, यह सरकार का ही आंकड़ा है।

दरअसल भारत में रोजगार की यही औसत हकीकत है। सबसे बड़े राज्य उप्र का ही उदाहरण लें। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2022 में चुनाव जीतने से पहले वायदा किया था कि 5 साल में 70 लाख रोजगार (नौकरी समेत) दिए जाएंगे। वह 2017 से लगातार सत्ता में हैं। अब चुनाव के मुहाने पर उन्होंने ही खुलासा किया है कि साढ़े 9 साल में हमने करीब 9.50 लाख नौकरियां (क्या रोजगार भी?) दी हैं और आगामी 6 माह में 1 लाख नौकरियां और देंगे। इन रोजगारों का कुल जोड़ किया जाए, तो यह 70 लाख की तुलना में ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ समान है। उप्र सरकार ने अभी जो रोजगार मेला आयोजित किया था, उसमें सिर्फ 818 नियुक्ति-पत्र ही बांटे गए। सरकार के पास मुश्किल से 4 महीने बचे हैं। उसके बाद चुनाव घोषित हो जाएंगे और आदर्श आचार संहिता लागू हो जाएगी। नौकरियां कैसे देंगे? चूंकि उप्र विधानसभा चुनाव मार्च-अपै्रल, 2027 में होना है और भाजपा के लिए यह चुनाव जीतना ‘नाक और सम्मान का सवाल’ है, लिहाजा प्रधानमंत्री, मंत्रीगण, प्रवक्ता और मुख्यमंत्री ‘जेन-जी’ के प्रति प्यार, प्रतिबद्धताएं उंडेल रहे हैं। जेन-जी और अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा उम्र के युवाओं के रोजगार का यथार्थ यह है कि बजट में जिस ‘पीएम इंटर्नशिप योजना’ की ढोल पीटते हुए घोषणा की गई थी, उसके तहत 16,614 युवाओं को ही इंटर्नशिप नसीब हुई है, जबकि योजना के मुताबिक, करीब 3.68 लाख युवाओं को यह अवसर मिलना चाहिए था। कारण, फासले, विसंगतियां प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री ही जानते होंगे। प्रधानमंत्री मोदी की झंडेदार योजनाओं में ‘कौशल विकास’ भी शामिल रही है। 2015-26 के दौरान कुल 4.73 करोड़ के करीब युवाओं के पंजीकरण, प्रशिक्षण और उन्हें प्रमाण-पत्र दिए जाने की स्थिति सामने आई है, लेकिन उनमें से सिर्फ 21.84 लाख को ही नौकरी, रोजगार प्राप्त हो सके हैं।

सरकार के लिए यह आंकड़ा भी गुलगुलाने वाला होगा! सवाल किया जा सकता है कि क्या शेष 4 करोड़ से अधिक युवा ‘कौशलहीन’ थे? उनके रोजगार का क्या हुआ? क्या यह योजना भी नाकाम रही है? ‘अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी निजी है, लेकिन उसकी प्रतिष्ठा और स्तर मायनेदार हैं। उसका अध्ययन और सर्वेक्षण है कि 2004-23 के बीच देश में करीब 50 लाख युवा ‘स्नातक’ बने। यानी डिग्रीधारी बने, लेकिन उनमें से करीब 28 लाख को ही रोजगार मिला। वह रोजगार कैसा था, योग्यता के मुताबिक था अथवा नहीं, फिलहाल इसे छोड़ दीजिए। भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय के ही आंकड़े हैं कि देश में 29.4 फीसदी डिग्री या डिप्लोमा धारक युवा बेरोजगार हैं। यह यथार्थ इतिहास-जैसा असीमित है। हमने कुछ बिंदु छुए हैं। फिर आग्रह करेंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ध्यान दें, सोचें, अमल करें। रोजगार की समस्या हल होने से कई और समस्याएं भी हल हो जाती हैं।

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