राजनीति

राजनीति में महिलाओं की राह मुश्किल, क्या आरक्षण बनेगा पितृसत्ता को तोड़ने का निर्णायक हथियार?

राकेश सिन्हा

6–7 minutes


एक समय वह था और एक समय यह है। वर्षों पूर्व स्कूल की छुट्टी में जब मैं शहर से गांव गया तब एक कैलेंडर मेरे पास था। उसमें गाड़ी चलाती हुई एक महिला की तस्वीर थी। मेरे पड़ोस की एक नवविवाहिता, जो घूंघट में थी, उसे देखकर विस्मय कर रही थी। समय बीता। कुछ वर्ष पूर्व गांव में जब था, तो वही महिला स्थानीय निकाय की उम्मीदवार थी और अपने लिए घर-घर जाकर वोट मांग रही थी। उन्हें देखकर पुरानी बातें मेरे स्मृति-पटल पर उभर कर सामने आ गईं।

जनतंत्र में गजब की ताकत होती है। यह चीजों को विद्युत गति से उलट-पुलट कर देने की क्षमता रखता है। इसी क्षमता के कारण यह मुरझा तो सकता है, पर कभी मरता नहीं है। यह सिर्फ चुनाव की पद्धति या प्रशासन का तरीका मात्र नहीं है, बल्कि गैरबराबरी को समाप्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। यही कारण है कि स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने उन्हें ‘मैं भी हूं’ और ‘मैं भी कर सकती हूं’ का अहसास कराया। वोट तो पहले भी दे रही थीं, पर उनमें नेतृत्व करने का आत्मविश्वास अंकुरित नहीं हो पाया था। आरक्षण ने शिक्षित-अशिक्षित, गरीब-अमीर, सामंती सोच आदि की दीवारों को एक झटके में तोड़ दिया। आज हजारों की संख्या में महिला सरपंच हैं और अन्य स्थानीय निकायों में उनकी उपस्थिति है। महिला चेतना तब परिवार की राय के अधीन थी, अब नीतियों के निर्धारण, विकास के कार्यक्रमों और सार्वजनिक गतिविधियों में सशक्त हिस्सेदारी देखी जा रही है।

इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महिला आरक्षण का आग्रह चेतना को स्थानीयता के पिंजरे से बाहर निकालकर उसे राष्ट्रीय क्षितिज पर लाने का उपक्रम है। यों महिलाओं की भागीदारी पहले भी रही है। सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री रहीं। संविधान सभा की सभी पंद्रह महिलाएं पूर्णिमा बनर्जी से लेकर एन्नी मास्करेने तक की पृष्ठभूमि कुलीन थी। जमीनी प्रतिनिधित्व का विषय तब मस्तिष्क में भी नहीं था। इसलिए आम महिला की चेतना को इस संक्षिप्त और सांकेतिक भागीदारियों से जगाया नहीं जा सका।

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राजनीति में प्रवेश, पुरुषों के लिए सामान्य बात ही नहीं, उनका ‘पुरुषार्थ’ माना जाता है, तो महिलाओं के लिए यह जोखिम उठाने वाला हो जाता है। इसलिए भागीदारी प्राप्त करने में उन्हें अनेक बाधाओं को पार करना होता है। लोकसभा में महिला आरक्षण का प्रावधान राजनीति में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच और प्रभाव को सदा के लिए दफनाने वाला सुधारवादी से कहीं अधिक क्रांतिकारी कदम हो सकता है।

यह सिर्फ कुछ सौ महिलाओं का लोकसभा में प्रतिनिधित्व ही नहीं बढ़ाएगा, बल्कि जमीन पर हर तबके तथा हर वर्ग की महिलाओं को राजनीतिक विमर्श से जोड़ेगा। वे अब तक विमर्श की पात्र रही हैं, अब वे विमर्श में भागीदार बन रही हैं। महिला सम्मान और अस्तित्व, दोनों ही लंबे समय से विमर्श और सुधारवाद का हिस्सा रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि समाज सुधार के प्रश्न पर विरोध के दो ध्रुवों के बीच भी एकता अनैतिक नहीं मानी जाती है। 1829 में सती प्रथा के उन्मूलन में राष्ट्रवादी राजा राममोहन राय और साम्राज्यवादी गवर्नर जनरल बेंटिक्ट के बीच पूर्ण सहमति थी।

भारत के सुधारकों ने 1921 की जनगणना में अभिव्यक्त तल्ख सच को समाज की अपनी आलोचना से कहीं अधिक समाज के लिए चुनौती और अवसर के रूप में देखा। उसमें रहस्योद्घाटन हुआ था कि शून्य से एक वर्ष की 597, एक से दो वर्ष के बीच के 494 नवजात शिशुओं को विधवा घोषित कर दिया गया था। यह संख्या बढ़ती गई। इस जनगणना की रपट ने स्वामी श्रद्धानंद सहित अनेक राजनीतिकों को गहन समाज सुधार के लिए प्रेरित किया था।

उस सच से इस सच तक पहुंचने में समाज ने अनेक प्रयासों और सुधारों का साक्षात्कार किया है। महिला आरक्षण पर उत्तर-दक्षिण विभाजन का मुद्दा बेमानी है। भौगोलिक संरचना से भारतीय राज्य, समाज और लोकतंत्र अप्रभावित है। राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई है, जो मनुष्य शरीर की तरह है। यह यांत्रिक नहीं है। जिस तरह से शरीर का प्रत्येक अंग जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण होता है, उसी तरह मेघालय से मध्य प्रदेश और अरुणाचल से आंध्र प्रदेश राष्ट्र, समाज और राजनीति का प्रतिस्पर्द्धी या विरोधाभासी इकाइयां नहीं हैं। ऐसा होना भारत में संभव नहीं है। हमारी राष्ट्रीय चेतना सांस्कृतिक कारणों से अविभाज्य है। क्षेत्रीय अस्मिता को लोकतंत्र पर आरोपित करने का प्रयास लोकशाही के मूल अर्थ को खो देने जैसा है। संसद मूलत: कानून और कार्यपालिका के लिए जिम्मेदार एक संप्रभु संरचना है। एक सांसद जितना अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि है, उससे अधिक उसकी राष्ट्रीय पहचान होती है।

लोकतंत्र का मूल भाव योग्यता की खोज और नेतृत्व की पात्रता का सृजन करना होता है। इसके इतर होने पर जाति धर्म, क्षेत्र, संप्रदाय, भाषा की संकीर्ण भूमिका बढ़ने लगती है। पर यह जनतंत्र उसे धारण करने वालों में अपूर्णता का संकेत है। जिस समाज में राजनीति और जनता के बीच में गैर चुनावी, पर राजनीतिक रूप से सक्रिय पात्रों, संगठनों और सुधारकों को अल्पता होती है, वहां प्रतिस्पर्धी राजनीति बेलगाम हो जाती है। एक समय विनोबा भावे, जयप्रकाश, सिद्धराज ढड्ढा, वीएम तारकुंडे जैसे लोग थे। वे चुनाव नहीं लड़ते थे, पर चुनावी राजनीति पर अंकुश की तरह होते थे।

महिला आरक्षण उसी योग्यता के सृजन का सशक्त माध्यम है। प्रश्न क्यों जरूरी है, उसे एक प्रचलित परंपरा से समझा जा सकता है। मेघालय की खासी जनजाति में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की प्रधानता है, पर जब राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न आता है, तब उनकी अपनी परंपरागत राजनीतिक संस्था ‘दरबार’ में यह पूरी तरह प्रतिबंधित है। भले ही यह लोकसभा में अंकगणित के चक्रव्यूह में फंस गया, पर इससे उपजने वाला विमर्श हमें मैत्रेयी-गार्गी तक पहुंचाने की क्षमता रखता है।

यह भी पढ़ें: नारी शक्ति नारा मजबूत, लेकिन जीवन में बदलाव पर अब भी संशय | आंकड़े उठाते हैं असहज तथ्य

नारी शक्ति की पिछले सप्ताह खूब चर्चा हुई लोकसभा के अंदर और बाहर भी। चर्चा की शुरुआत प्रधानमंत्री ने खुद की दिल्ली में महिलाओं को संबोधित करते हुए विशेष सत्र से पहले। अपनी पीठ थपथपाते हुए याद दिलाया कि देश की बेटियों की हर जरूरत पर ध्यान दिया है उनकी नीतियों ने। याद दिलाया कि ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का नारा उन्होंने दिया था और इस नारे को यथार्थ बनाने के लिए उनकी सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जैसे लखपती दीदी और ड्रोन दीदियों को गांवों में बनाना, स्कूलों में मुफ्त सेनेटरी पैड बांटना, बैंकों से कर्ज दिलवाना उन महिलाओं को जिन्होंने कभी बैंक का दरवाजा तक नहीं देखा था और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत जो मकान बने हैं उनको परिवार की महिलाओं के नाम करवाना।-राकेश सिन्हा


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