राजनीति

राहुल की फीलिंग से निकली दिल्ली रैली

इन दिमागी नक्सलों ने राहुल गांधी के कन्धों पर सवार होने की योजना बना ली। राहुल गांधी को भी उम्र के इस पड़ाव पर ‘जेन जी’ की फीलिंग के लिए अपने कन्धों पर इनकी जरूरत थी। अल्ट्रा कम्युनिस्ट रैली में उनके कन्धों पर सवार हो लिए। पार्टी वालों ने बहुत समझाया। मु_ी बंद रहने दीजिए। ईश्वर ने भी संकेत दिया। एक दिन पहले वर्षा कर दी। इसी के बहाने रैली स्थगित कर दीजिए। लेकिन राहुल गांधी को आने वाली फीलिंग तो उस दिन अपनी हदें तोड़ रही थी। वे मल्लिकार्जुन खडग़े के घर एक प्रहसन करवा कर अपने प्रधानमंत्री होने की फीलिंग ले रहे थे…

राहुल गांधी ने अंतत: दिल्ली में एक रैली निकालने का निर्णय ले लिया था। वे कई दिनों से अपनी पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में घूम रहे थे। बीच में दो तीन किसी अति आवश्यक काम के लिए वियतनाम चले गए थे अन्यथा देश के विभिन्न हिस्सों में घूमने फिरने में ही बिताया। एक बार तो बहुत से लोगों का काफिला लेकर धूमधाम से सर्वोच्च न्यायालय में कुछ जरूरी कागजात जमा करवाने के लिए भी गए थे। इस भ्रमण में उनकी बहन प्रियंका गांधी भी प्राय: साथ रहती हैं। वैसे भी उनको घूमते फिरते देख कर दूसरे बहुत लोग भी जुडऩे लगते हैं और उनके साथ घूमने लगते हैं। उनके घूमने फिरने और विविध प्रकार के काम करते समय के चित्रों की एक प्रदर्शनी उनके भानजे ने कहीं लगाई भी थी। कभी कभार उनके माता जी भी उनके काफिलों को आशीर्वाद दे देती हैं। वैसे देखा गया है कि राहुल जी को घूमते समय एक विशेष प्रकार की ‘फीलिंग’ आने लगती है। यह बात वे खुद बताते भी हैं। यह सचमुच बहुत ऊंचे पाएं की बात होती है। लेकिन इस बार उनको उनकी इस फीलिंग ने ही बुरा फंसा दिया। घूमते घूमते उनको फीलिंग आ गई कि अब दिल्ली में एक बहुत बड़ी रैली कर लेनी चाहिए। उन्होंने इस महत्वपूर्ण काम के लिए एक नवंबर 2026 का दिन चुन लिया। लोगों ने बहुत समझाया भी कि इस दिन दिल्ली में ही बहुत भयंकर नरसंहार हुआ था। उसमें अनेकों बेगुनाहों की जान चली गई थी।

कहा जाता है वह सब कांग्रेस का ही किया कराया था। यह शोक का दिन है। इस दिन दिल्ली में ही रैली करके जले पर नमक छिडक़ने का काम होगा। लोगों में नाराजगी आएगी। अभी घूमते फिरते रहने के कारण कहीं कहीं लोगों को लगने लगा है कि आप अपने बलबूते लीडर बन सकते हैं। पप्पू के खोल से बाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू होने लगी थी। यहां तक कि भाजपा का समर्थन करने वाले कुछ पत्रकारों ने भी कहीं कहीं कहना शुरू कर दिया था कि राहुल में कुछ तो है, एक प्रकार की व्याकुलता, एक प्रकार का उत्साह, जिसके चलते वे परिश्रम करें तो लीडर बन सकते हैं। लेकिन वे एक नवंबर पर अड़ गए। दिल्ली के लोगों ने बहुत कहा कि हम आपका साथ दे देंगे, चलिए आप की रैली में भी आ जाएंगे, लेकिन ये त्योहारों के दिन हैं, दिवाली आने वाली है, आप इस रैली नाम के इवेंट को कुछ दिनों के लिए टाल दीजिए। लेकिन राहुल जी की एक खूबी है। जब एक बार फीलिंग आ जाती है तो वे फिर पीछे नहीं हटते। आपके ध्यान में होगा कि एक युग वह भी था कि ‘निर्मल बाबा’ जिन पर ‘किरपा’ आनी बंद हो जाती थी, उन पर किरपा आने का रास्ता खोल देते थे। इसके लिए वे छोटे छोटे उपाय ही बताया करते थे। मसलन फलां दुकानदार की दुकान से जलेबी लेकर खाओ, रेलवे स्टेशन पर कुली के कपड़े पहन कर घूमो, तालाब में छलांग लगा कर मछली पकड़ो इत्यादि।

इन छोटे छोटे सर्वसुलभ उपायों से उन्होंने बहुत लोगों पर किरपा आने का बंद रास्ता खुलवाया था। राहुल गांधी जी पर तो फीलिंग आनी कभी बन्द ही नहीं हुई थी। लेकिन लगता है पिछले पांच छह महीनों से कुछ ज्यादा ही फीलिंग आने लगी है। इसी से घबरा कर, मुझे लगता है मल्लिकार्जुन खडग़े ने तो जरूर समझाया होगा कि अभी कुछ देर के लिए फीलिंग को रोक लीजिए, रैली बाद में कर लेंगे, अभी मु_ी बन्द ही रहने दीजिए। लेकिन इसमें राहुल जी का दोष नहीं है। फीलिंग उनको टिकने नहीं देती। यदि ऐसा न होता तो राहुल जी कह ही नहीं सकते थे कि रैली में दस लाख लोग आएंगे। लेकिन फीलिंग आती है तो वे बोलते हैं। उन्होंने अपने लोगों से कहा, दिल्ली को सजा दो। पूरे देश भर में मुनादी करवा दो कि राहुल गान्धी रैली कर रहे हैं। सज धज कर दिल्ली पहुंचो। वन्दनवार सजाओ। दिल्ली को राहुल गान्धी की रैली के चित्रों से पाट दो। कोई दीवार खाली नहीं रहनी चाहिए। हर गली नुक्कड़ पर घोषणा करो कि राहुल जी को देखने सुनने के लिए दिल्ली में दस लाख लोग जमा हो रहे हैं। दिल्ली के लोग प्रार्थना कर रहे थे कि आप फिलहाल ‘किरपा’ कीजिए, रैली बाद में कर लेना। जिन पर ‘किरपा’ आनी बन्द हो गई थी, उनको लगा, यही सुनहरी मौका है। इसका लाभ उठाना चाहिए। राहुल जी पर लगता है ‘किरपा’ आ रही है। उनके कन्धे पर सवार हो लेना चाहिए, हो सकता है हम पर भी किरपा आनी शुरू हो जाए। पिछले कुछ महीनों से ममता बनर्जी पर भी किरपा आनी बन्द हो चुकी है। उनका आशियाना उजड़ गया है। जब उनको पता चला कि राहुल जी पर बदस्तूर फीलिंग आ रही है तो उन्होंने भी उनके कन्धे पर सवार होने का मन बना लिया। और रास्ता ही क्या था? पहले उनके सिर पर सवार होती थीं, अब जब किरपा आनी बन्द हो गई तो उनके पीछे चलने को भी तैयार थीं। दिमागी नक्सलों के लिए तो यही सुनहरी अबीर था। जंगलों में रहने वाले बन्दूक वाले नक्सल तो खत्म हो चुके। अब दिमागी नक्सल बस्तर के जंगलों में तो जा नहीं सकते। अपने बलबूते कुछ कर नहीं सकते। वे पहले भी कुछ नहीं कर सकते थे। वे दूसरों के बच्चों को पढ़ा सिखा कर जंगल में भेजते थे। वहां वे बन्दूक पकड़ कर जंगल में रहने वाले निरीह प्राणियों को मारते थे। दिमागी नक्सल तो शहर में रहने वाले हैं। अब देश के सबसे बड़े शहर में ‘दस लाख’ की रैली हो रही थी। वे अपने जौहर इस रैली में दिखा सकते थे। उनको सदा अपने जौहर दिखाने के लिए दूसरे का शरीर चाहिए होता है। वे सदा दूसरे के शरीर में घुस कर ही बोलते रहे हैं। लेकिन इस बार उनका खतरा दिखाई दे रहा था। जिस पार्टी में फीलिंग आ रही हो, उसके अंदर जाना खतरे से खाली नहीं होता। उनका एक साथी कन्हैया कुमार अन्दर जाकर गुम हो चुका है।

इसलिए इन दिमागी नक्सलों ने राहुल गांधी के कन्धों पर सवार होने की योजना बना ली। राहुल गान्धी को भी उमर के इस पड़ाव पर ‘जेन जी’ की फीलिंग के लिए अपने कन्धों पर इनकी जरूरत थी। अल्ट्रा कम्युनिस्ट रैली में उनके कन्धों पर सवार हो लिए। पार्टी वालों ने बहुत समझाया। मु_ी बन्द रहने दीजिए। ईश्वर ने भी संकेत दिया। एक दिन पहले वर्षा कर दी। इसी के बहाने रैली स्थगित कर दीजिए। लेकिन राहुल गान्धी को आने वाली फीलिंग तो उस दिन अपनी हदें तोड़ रही थी। वे मल्लिकार्जुन खडग़े के घर एक प्रहसन करवा कर अपने प्रधानमंत्री होने की फीलिंग ले रहे थे। इसलिए रैली हुई। दस लाख तो नहीं, पचास से तीस हजार के बीच ही लोग आए या लाए जा सके। वे भी टिक कर नहीं बैठ रहे थे। तब मल्लिकार्जुन खडग़े को कहना पड़ा कि यदि चुपचाप बैठे रहोगे तो मैं अपना भाषण पांच मिनट का दूंगा लेकिन यदि आप हल्ला करते रहे तब मैं एक घंटा भाषण दूंगा। तब लोग घबरा कर चुप हो गए। अब पता चला है युवा कांग्रेस के लोगों को कारण बताओ नोटिस दिए जा रहे हैं कि आप रैली में क्यों नहीं आए। लेकिन राहुल गान्धी की फीलिंग ने सब गुड़ गोबर कर दिया। बन्द मु_ी खोल दी। लेकिन राहुल जी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वे अब भी अपनी फीलिंग में मस्त हैं।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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