रेवड़ी खटाखट, वोट फटाफट…

सर्वोच्च अदालत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली न्यायिक पीठ ने ‘मुफ्तखोरी’, अर्थात् ‘रेवडिय़ों’, पर सख्त टिप्पणी की है। चिंता भी जताई है कि इससे देश का आर्थिक विकास रुकेगा। सवाल भी उठाए गए हैं कि ऐन चुनावों से पहले राजनीतिक दल और सरकारें मुफ्त रेवडिय़ों की घोषणाएं क्यों करती हैं? कई राज्य सरकारें भारी कर्ज और घाटे में हैं, इसके बावजूद मुफ्त योजनाएं क्यों बांट रही हैं? यदि सरकारें मुफ्त पैसे, मुफ्त बिजली, मुफ्त खाने जैसी सुविधाएं बांटती रहेंगी, तो आखिर उनका खर्च कौन उठाएगा? प्रधान न्यायाधीश ने कहा है कि आखिर रेवडिय़ां बांटने का बोझ टैक्स देने वाले लोगों पर ही पड़ेगा। यदि ‘रेवडिय़ां’ मिलती रहेंगी, तो काम कौन करेगा? आखिर हम यह कैसी संस्कृति बना रहे हैं? सरकारों को ‘मुफ्तखोरी’ के बजाय रोजगार-सृजन पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यदि कोई शिक्षा और बुनियादी जिंदगी का खर्च वहन नहीं कर सकता, तो ऐसे लोगों को सुविधा देना सरकार का दायित्व है, लेकिन ‘मुफ्त रेवडिय़ां’ उनकी जेब में जा रही हैं, जो लोग मजे कर रहे हैं। क्या सरकारों को इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए? बहरहाल सर्वोच्च अदालत ने मौखिक टिप्पणी कर दी और राजनीतिक दलों के प्रवक्ता कह रहे हैं कि वे शीर्ष अदालत की बात मानने को बाध्य नहीं हैं। ये ‘रेवडिय़ां’ नहीं हैं, बल्कि कल्याणकारी योजनाएं हैं। हम कल्याणकारी लोकतंत्र हैं और जनता की मदद करना हमारा फर्ज है। लिहाजा क्षमा के साथ सर्वोच्च अदालत से भी हमारा सवाल है कि वह मौखिक टिप्पणियां क्यों करती है? सिर्फ चिंता व्यक्त करने से क्या होगा? सर्वोच्च अदालत को संविधान ने विशेषाधिकार भी दिए हैं और उनका इस्तेमाल कर अदालत ने फैसले भी सुनाए हैं, तो मुफ्तखोरी पर आदेश क्यों नहीं दिए जा सकते? अदालत सरकारों को स्पष्ट निर्देश दे कि चुनाव से पहले योजनाओं की घोषणा कब करें? ‘रेवडिय़ों’ को भी परिभाषित करें।
यथार्थ यह है कि देश के राज्यों पर कुल 104 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है। देश पर भी 200.50 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। कुछ विशेषज्ञ इसे 225 लाख करोड़ के करीब मानते हैं। इसके बावजूद रेवडिय़ां बांटी जा रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी कई मौकों पर कह चुके हैं कि आम आदमी फ्रीबीज नहीं मांगता। रेवडिय़ां देश के विकास के लिए खतरनाक हैं। ये अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकती हैं। इन कथनों के बावजूद प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले एनडीए ने बिहार में महिलाओं को 10,000 रुपए प्रति की रेवडिय़ां बांटी और खूब वोट हासिल किए। बिहार पर 3.61 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ही यह रणनीति बनाई गई कि रेवडिय़ां बांटो खटाखट, तो वोट मिलेंगे फटाफट। विडंबना और सवाल है कि इस मुफ्तखोरी को न तो चुनाव आयोग ने रोका और न ही अब सर्वोच्च अदालत ने इस पर टिप्पणी की। देश की बदसूरत और डरावनी तस्वीर यह है कि 15-49 वर्ष आयु-वर्ग की करीब 57 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है। यदि इसी अवस्था में मां की कोख में भ्रूण आकार ग्रहण करता है, तो उस बच्चे का मस्तिष्क विकसित नहीं होगा। पांच साल की उम्र तक के करीब 35 फीसदी बच्चे बेहद कुपोषित हैं।
देश का स्वास्थ्य पर बजट आज भी जीडीपी का 2 फीसदी है, जबकि कमोबेश 5.2 फीसदी होना चाहिए। एक भ्रष्ट और निकम्मेपन की तस्वीर भी देखिए कि जल-जीवन मिशन पर 67,000 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया था, लेकिन मार्च, 2026 तक 17,000 करोड़ रुपए ही खर्च होगा। प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में 120 करोड़ रुपए का घोटाला बेनकाब हुआ है। कुछ और राज्यों में भी ऐसी विसंगतियां सामने आई हैं। ऐसे देश में ‘रेवडिय़ां’ तो आजीविका समान हैं। जिस तमिलनाडु से याचिका शीर्ष अदालत में दी गई थी, उस राज्य पर 10.42 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। बंगाल पर 7.90 लाख करोड़ और केरल पर 5.04 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। इन राज्यों में इसी साल अप्रैल के बाद चुनाव होने हैं। सवाल यह भी किया जाना चाहिए कि जिन 81 करोड़ से अधिक लोगों को सरकारें ‘मुफ्त राशन’ बांट रही हैं, क्या वे रेवडिय़ां नहीं हैं? क्या वे लोग गरीबी रेखा के तले हैं?




