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रोबोटिक विवाद : गलगोटिया विश्वविद्यालय की चूक या सरकार की…

नई दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमता सम्मेलन में प्रस्तुत एक रोबोटिक मॉडल ने भारत की तकनीकी विश्वसनीयता, संस्थागत जवाबदेही और सरकारी सत्यापन प्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मंच पर प्रदॢशत रोबोट को भारत की स्वदेशी तकनीकी क्षमता का प्रतीक बताते हुए इसे देश के नवाचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया। केंद्रीय आई.टी. मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी इस तकनीक की सराहना करते हुए इसे भारत की बढ़ती तकनीकी शक्ति का उदाहरण बताया। उस समय यह संदेश दिया गया कि भारत अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता और नवप्रवर्तक भी बन चुका है।

लेकिन जैसे-जैसे इस मॉडल के तकनीकी पहलुओं का विश्लेषण सामने आया, कई विशेषज्ञों ने यह संकेत दिया कि रोबोट पूरी तरह स्वायत्त नहीं था और संभवत: बाहरी नियंत्रण या पूर्व निर्धारित प्रोग्रामिंग पर आधारित था। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक हो गया कि क्या इस तकनीक को राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने से पहले पर्याप्त तकनीकी सत्यापन किया गया था या नहीं? 

भारत में किसी भी नई तकनीक, मशीन या मॉडल को कानूनी रूप से पेटैंट देने का अधिकार केवल इंडियन पेटैंट ऑफिस के पास होता है, जो डिपार्टमैंट ऑफ प्रमोशन आफ इंडस्ट्री एंड इंटर्नल ट्रेड के अधीन कार्य करता है। जब तक किसी मॉडल को पेटैंट नहीं मिलता, तब तक उसे पूर्ण रूप से प्रमाणित स्वदेशी नवाचार नहीं माना जाता। यदि इस रोबोटिक मॉडल को पेटैंट नहीं मिला था या उसका आवेदन लंबित था, तो इसे राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना तकनीकी प्रक्रिया की दृष्टि से समयपूर्व माना जा सकता है।

विश्वविद्यालय स्तर पर भी जब कोई छात्र या शोधकत्र्ता नया मॉडल विकसित करता है, तो सबसे पहले विश्वविद्यालय का रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट या इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी सैल उसकी जांच करता है। यदि मॉडल सभी मानकों पर खरा उतरता है, तभी उसे पेटैंट प्रदान किया जाता है। इस स्थिति में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि संबंधित मॉडल को पेटैंट या सरकारी तकनीकी मान्यता प्राप्त थी या नहीं। यदि किसी तकनीक को राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो सामान्यत: मिनिस्ट्री ऑफ इलैक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टैक्नोलॉजी  तथा साइंस एंड टैक्नोलॉजी विभाग जैसे संस्थान उसकी तकनीकी प्रामाणिकता की जांच करते हैं। यदि यह जांच पूरी तरह नहीं हुई और केवल संस्थान के दावे के आधार पर उसे राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत कर दिया गया, तो यह संस्थागत समन्वय की कमी को दर्शाता है। 

इस प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय मंच केवल तकनीकी प्रदर्शन के लिए नहीं होते, बल्कि वे देश की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे मंचों पर प्रस्तुत हर तकनीक केवल एक मॉडल नहीं होती, बल्कि वह देश की वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक बन जाती है। यदि उसमें किसी प्रकार की विसंगति सामने आती है, तो उसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर देश की छवि पर पड़ता है। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर विश्व की अग्रणी तकनीकी कंपनियों और अनुसंधान संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमता, रोबोटिक्स और मशीन लॄनग के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन तकनीकी नेतृत्व केवल नवाचार से नहीं, बल्कि उसकी प्रामाणिकता और पारदर्शिता से भी स्थापित होता है।

यदि यह केवल विश्वविद्यालय स्तर की प्रस्तुति थी, तो इसे उसी स्तर तक सीमित रखना चाहिए था। और यदि इसे राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो उसकी पूर्ण तकनीकी जांच सुनिश्चित करना संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी थी। भारत के पास प्रतिभा, संसाधन और क्षमता की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हर उपलब्धि को प्रामाणिकता और ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया जाए। यही दृष्टिकोण भारत को न केवल तकनीकी रूप से मजबूत बनाएगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक विश्वसनीय और सम्मानित तकनीकी राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगा।-सतीश मेहरा

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