लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा फेक न्यूज

जब हम किसी सनसनीखेज वीडियो को सत्यापित किए बिना साझा करते हैं, तो हम उसके प्रभाव के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। और जब हम किसी अफवाह को रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ाते हैं, तो हम अनजाने में सामाजिक विश्वास को कमजोर करते हैं…
लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह विश्वास पर टिका हुआ एक सामाजिक अनुबंध है। इसमें नागरिकों का संस्थाओं पर विश्वास, संस्थाओं का नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व और समाज के भीतर संवाद की ऐसी संस्कृति का निर्माण शामिल है, जिसमें असहमति के बावजूद एक-दूसरे को सुनने की क्षमता और दूसरों के मतों को तवज्जो देने की भावना बनी रहती है। लेकिन आज इस विश्वास की नींव को एक अदृश्य चुनौती लगातार कमजोर कर रही है जैसे गलत, भ्रामक और अपुष्ट सूचना का तेजी से फैलता जाल। अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने निर्णय प्रक्रिया को समृद्ध बनाने, विश्वास बढ़ाने तथा अधिक शांतिपूर्ण, समावेशी और लचीले समाजों के निर्माण के लिए समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनके संदेश में लोकतंत्र को केवल एक संस्थागत व्यवस्था नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी और विश्वास से मजबूत होने वाली व्यवस्था के रूप में रेखांकित किया गया है। लेकिन आज सवाल यह है कि जब समाज के अलग-अलग वर्गों तक अलग-अलग सच पहुंच रहा हो, तब उन्हें एक साथ कैसे लाया जाए? आज सूचना हमारे हाथ में है, लेकिन सत्य की पहचान पहले से अधिक कठिन होती जा रही है। एक मोबाइल फोन कुछ ही सेकंड में हमें देश-दुनिया की खबरों से जोड़ देता है। व्हॉट्सऐप, फेसबुक, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया मंचों ने सूचना के लोकतंत्रीकरण को गति दी है। मगर इसी के साथ मिसइन्फॉर्मेशन यानी भ्रामक जानकारी, डिसइन्फॉर्मेशन यानी जानबूझकर फैलाई गई गलत सूचना और डीपफेक जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं। समस्या केवल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति गलत सूचना फैला रहा है।
असली संकट तब पैदा होता है, जब गलत सूचना सही लगने लगे और सही सूचना पर ही संदेह होने लगे। यही लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है। हर वर्ष 15 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल लोकतांत्रिक अधिकारों की याद नहीं दिलाता, बल्कि हमें हमारी लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों की भी याद दिलाता है। लोकतंत्र की रक्षा संसद में होने वाली बहसों से जितनी होती है, उतनी ही हमारे मोबाइल फोन पर आने वाले एक संदेश के साथ हमारे व्यवहार से भी होती है। एक खबर को सत्यापित करने में लगे दो मिनट लोकतंत्र को मजबूत करने में योगदान दे सकते हैं। यूनेस्को ने 2026 में प्रेस स्वतंत्रता और सूचना के वातावरण पर चिंता जताते हुए बताया कि सूचनाओं में हेरफेर सार्वजनिक विश्वास को कमजोर कर रहा है। संस्था ने मीडिया और सूचना साक्षरता को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया है। लेकिन सोचिए, एक समाज में यदि नागरिकों को यह भरोसा ही न रहे कि उन्हें मिलने वाली खबर सच है, तो वे अपने निर्णय किस आधार पर लेंगे? ंचुनाव में किस आधार पर राय बनाएंगे? किसी सार्वजनिक नीति का समर्थन या विरोध किस आधार पर करेंगे? किसी सामाजिक घटना पर प्रतिक्रिया देने से पहले किस पर विश्वास करेंगे? लोकतंत्र में नागरिक का मत तभी सार्थक है, जब उसका निर्णय विश्वसनीय सूचना पर आधारित हो। इसलिए गलत सूचना केवल सूचना के माध्यम की समस्या नहीं है, बल्कि अब यह लोकतंत्र की समस्या बन चुकी है। एक झूठी खबर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है। एक भ्रामक स्वास्थ्य संदेश किसी व्यक्ति को इलाज से दूर कर सकता है। किसी समुदाय के बारे में गलत सूचना सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है। चुनाव के समय फैलाया गया दुष्प्रचार मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकता है। और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनाए गए नकली वीडियो किसी व्यक्ति के शब्द और चेहरा तो दिखा सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि उसमें दिखाई गई बात कभी कही या हुई भी हो। सबसे दुखद बात यह है कि हम अक्सर वही सूचना स्वीकार करने लगते हैं, जो हमारे पहले से बने विचारों की पुष्टि करती है। यहीं से ‘इको चैंबर’ बनते हैं। हम उन्हीं लोगों को सुनते हैं, जो हमसे सहमत हैं। उन्हीं पोस्ट को पसंद करते हैं, जो हमारी सोच को सही ठहराती हैं। धीरे-धीरे असहमति रखने वाला व्यक्ति हमें विरोधी नहीं, बल्कि दुश्मन दिखाई देने लगता है। लोकतंत्र का स्वभाव इसके ठीक विपरीत है। लोकतंत्र हमें यह अधिकार देता है कि हम असहमत हो सकें। लेकिन असहमति को दुश्मनी बनने से रोकने के लिए आवश्यक है कि समाज में संवाद की एक साझा जमीन तैयार की जाए। यही साझा जमीन विश्वसनीय तथ्यों से बनती है। इसलिए आज मीडिया की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। पत्रकारिता का मूल्य सबसे पहले उसकी विश्वसनीयता में है। खबर सबसे पहले देने की होड़ में यदि सत्य पीछे छूट जाए, तो पत्रकारिता अपनी मूल भूमिका खो देती है।
सनसनी पाठक को आकर्षित कर सकती है, लेकिन विश्वास केवल सत्य से बनता है। मीडिया संस्थानों को तथ्य जांच, स्रोतों की पुष्टि, पारदर्शिता और नैतिक पत्रकारिता को प्राथमिकता देनी होगी। सोशल मीडिया मंचों को भी अपनी जिम्मेदारी से बचना नहीं चाहिए। लेकिन सारी जिम्मेदारी मीडिया या तकनीकी कंपनियों पर डालकर नागरिक अपनी भूमिका से मुक्त नहीं हो सकते। क्योंकि एक नागरिक भी सूचना-व्यवस्था का हिस्सा है। जब हम बिना पढ़े कोई संदेश आगे भेजते हैं, तो हम केवल एक संदेश नहीं भेज रहे होते, बल्कि उसके साथ जुड़ी संभावित गलत सूचना को भी आगे बढ़ा रहे होते हैं। जब हम किसी सनसनीखेज वीडियो को सत्यापित किए बिना साझा करते हैं, तो हम उसके प्रभाव के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। और जब हम किसी अफवाह को रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ाते हैं, तो हम अनजाने में सामाजिक विश्वास को कमजोर करते हैं। इसलिए आज के नागरिक को केवल शिक्षित होना पर्याप्त नहीं है। उसके साथ-साथ मीडिया साक्षर होना भी जरूरी है। हमें बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक यह समझाना होगा कि किसी सूचना को देखने के बाद पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘इसे कितने लोगों ने शेयर किया?’, बल्कि यह होना चाहिए कि इसका स्रोत क्या है? क्या यह खबर किसी विश्वसनीय संस्था ने प्रकाशित की है?
डा. निधि शर्मा




