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विश्व शांति-दूत भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाया जाए

शलाम,  ओम् शांति, शांति शांति ओम् नमो बुद्धाय’। यह खूबसूरत, सकारात्मक और ऐतिहासिक शब्द विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांटो ने विश्व के 195 देशों के संगठन संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने प्रथम भाषण के अंत में भारतीय सांस्कृतिक संस्कारों के अभिवादन के अनुसार दोनों हाथ जोड़कर कहे। महासभा में उपस्थित राष्ट्र अध्यक्ष, विदेश मंत्री और प्रतिनिधि गद-गद ही नहीं हुए बल्कि समूचा हाल तालियों की गडग़ड़ाहट से गुंजायमान हो गया। एक मुस्लिम देश के मुस्लिम राष्ट्रपति द्वारा ऐतिहासिक शब्द संयुक्त महासभा के लंबे इतिहास में पहली बार बोले गए थे। हकीकत में यह संदेश भारत की प्राचीन उदारवादी, मानववादी और गौरवमयी संस्कृति के पवित्र ग्रंथों में उपलब्ध है, जो समूचे विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानी ‘सारा विश्व एक ही परिवार है’ के उच्चकोटि के आदर्श से परिचित कराता है। 

भारतीय संस्कृति ही विश्व शांति, सुरक्षा और विकास की पथ प्रदर्शक है। इसीलिए राष्ट्रपति ने इन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करके विश्व को आश्चर्यचकित ही नहीं किया बल्कि एक नए विश्व आर्डर के लिए उन्हें जागृत भी किया और विशेष करके मुस्लिम देशों के एक पक्षीय रवैये के खिलाफ  आवाज बुलंद की  ताकि वे कट्टरवाद , नफरतवाद, आतंकवाद और संकीर्ण मजहबी जुनून की घिसी-पिटी और गली-सड़ी विचारधारा को त्याग कर एक नए विश्व के निर्माण में अपना सहयोग प्रदान करें। महासभा के 80वें अधिवेशन में जब राष्ट्रपति ट्रम्प अपना भाषण देने के लिए आए तो उनके विरुद्ध अपने ही देश में खूब नारेबाजी हो रही थी। जिससे स्पष्ट है कि लोग उनकी नई नीतियों से सहमत नहीं हैं। ट्रम्प ने अपने संबोधन में कहा कि भारत और चीन रूस से तेल खरीद कर उसकी आॢथक तौर पर मदद कर रहे हैं जिससे रूस और यूक्रेन की लड़ाई बंद होने में देर लग रही है।

अमरीका द्वारा बंदिशें लगाने पर भारत ने पहले वेनेजुएला और फिर ईरान से तेल लेना बंद कर दिया और रूस से तेल लेकर अपनी घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने लगा। इस पर अमरीका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ  आयत कर दी, जबकि हकीकत यह है कि अमरीका और यूरोपियन देश भी रूस से कैमिकल, खाद, गैस और अन्य चीजें  खरीद कर अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर रहे हैं। भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह ऊर्जा, सुरक्षा और घरेलू आवश्यकताएं पूरी करने के मसले पर किसी किस्म का कोई समझौता नहीं करेगा। 
हकीकत में ट्रम्प एक बड़बोला सियासतदान ही नहीं बल्कि अस्थिर प्रज्ञा वाला व्यक्ति है जो फर्जी दावे तो खूब करता है पर अव्वल नंबर का पलटी बाज भी है। वह कब मानसिक संतुलन खो बैठे इस बारे  कोई विश्व प्रसिद्ध ज्योतिषी भी कुछ कहने से गुरेज करता है। वास्तव में अपने विरोधाभासी विचारों से उसने अपनी शख्सियत ही दागदार नहीं बनाई बल्कि शक्तिशाली देश अमरीका के प्रभुत्व और प्रभाव को भी कम किया है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान ने महासभा में अपने भाषण में पांचवीं बार कश्मीर का राग अलाप कर पाकिस्तान को खुश करने की कोशिश की है और भारत को सुरक्षा परिषद् में सदस्य न बनाने की वकालत की है। जबकि तुर्की का अपना दामन पलीत ही नहीं बल्कि अत्यधिक दागदार है।

तुर्की ने 1974 में साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया और वहां 30 हजार अपने सैनिक कब्जा जमाए रखने के लिए रख दिए। 2014  में सीरिया के उत्तरी हिस्से में कब्जा कर लिया और वहां अपने सैनिक तैनात कर दिए। ईराक में भी 24 किलोमीटर अंदर तक तुर्की कब्जा किए बैठा है। वहां 41 सैनिक शिविर भी इन्हीं के हैं।  इसी तरह लीबिया में भी इसने कुछ अपने सैनिक व कुछ भाड़े के टट्टू लगा रखे हैं, जबकि हकीकत यह है कि कश्मीर भारत का प्राचीन संस्कृति का प्रमुख केन्द्र और ज्ञान का भंडार रहा है और 1948 में पाकिस्तान ने इसके  गिलगित, बाल्तिस्तान और कश्मीर के कई अन्य हिस्सों पर कब्जा जमा रखा है। तुर्की भारत को तो ज्ञान दे रहा है परंतु अपने गिरेबान में भी उसे झांक कर देखना चाहिए। यह वही तुर्की है जिसने आप्रेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की हथियार, ड्रोन और अन्य तरह की सहायता की थी।

जबकि कुछ वर्ष पहले तुर्की में आए जबरदस्त भूकंप में जब हजारों लोग मारे गए, भारत ही ऐसा देश रहा जिसने पीड़ितों की सहायता के लिए दवाइयां, डाक्टर, सैनिक और खाद्य सामग्री भेजकर उनकी सहायता करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। हकीकत में तुर्की हुक्मरान नाशुक्रगुजार ही नहीं बल्कि आतंकवाद निर्यात करने वालों के समर्थक भी हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष बुतरस ने कहा कि यू.एन.ओ. को अस्तित्व में आए 80 वर्ष हो चुके हैं। समय की जरूरत के अनुसार इसके पुराने नियमों में तबदीली लाई जाए ताकि नए देशों को नए विश्व के निर्माण में मौके फरहाम हो सकें। हकीकत में प्रगतिशील विश्व शांति के दूत भारत को सुरक्षा परिषद् का सदस्य बनाया जाए क्योंकि 162 देशों में चीन ने भी अप्रत्यक्ष रूप से भारत का समर्थन किया है।-प्रो. दरबारी लालपूर्व डिप्टी स्पीकर, पंजाब विधानसभा

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