वैश्विक संघर्ष में महात्मा गांधी की प्रासंगिकता

स्कॉटहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च संस्था के मुताबिक रूस व यूक्रेन युद्ध के समय अमेरिका की हथियार बनाने वाली कंपिनयों ने 317 बिलियन का और यूरोप की कंपनियों ने 133 बिलियन व्यापार का लाभ कमाया है। आज चर्चा का विषय यह है कि हिंसा न तो शांति स्थापित कर सकती है और न ही शांति की ओर अग्रसर कर सकती है। अभी हाल के समय में हुए आंदोलन उन देशों को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक तौर पर काफी हानि पहुंचा चुके हैं। फिर सवाल उठता है कि इन देशों के लोगों ने हिंसा से क्या हासिल किया…
आज विश्वभर में साउथ मध्य एशिया से लेकर यूरोप तक कई देश आंतरिक एवं बाहरी संघर्षों से जूझ रहे हैं। आलम यह है कि सभी देश वैचारिक मतभेदों को सिर्फ हिंसात्मक तरीके से ही खत्म करने पर जोर दे रहे हैं, चाहे वो पिछले तीन सालों से लड़ा जा रहा यूक्रेन व रूस युद्ध हो या 20वीं शताब्दी से इजराइल एवं फिलिस्तीन के बीच लड़ा जा रहा छुटपुट युद्ध हो, हालांकि अक्टूबर 2023 से हमास के इजराल पर हमले के बाद ये मानवीय त्रासदी में बदल चुका है।
वैश्विक स्तर पर लड़े जा रहे इन युद्धों की प्रकृति भौगोलिक है लेकिन दक्षिणी एशिया के देश बांग्लादेश और नेपाल में तो वैचारिक मतभेद हिंसक रूप ले चुके हैं। अभी हाल में ही नेपाल में युवाओं के नेतृत्व में हुआ जेन जी हिंसक आंदोलन का प्रदर्शन विश्वभर में सबने देखा जिसका अनुसरण दुनिया के अन्य देश जैसे लैटिन अमेरिका के देश पेरू में भी हुआ और लेह-लद्दाख में भी कुछ-कुछ देखने को मिला। इन हिंसक आंदोलनों के बाद एक सवाल जरूर मन में आता है कि क्या हिंसा ही समस्याओं का समाधान है? इन महत्वपूर्ण और ज्वलंत मुद्दों का गूढ़ विश्लेषण महात्मा गांधी की अहिंसात्मक विचारधारा से किया जा सकता है। यह सोच सर्वप्रथम विदेशी धरती दक्षिण अफ्रीका में बापू जी द्वारा 1906 में ट्रांसवाल एशियाटिक अध्यादेश के विरोध में पहले सत्याग्रह अभियान से शुरू हुई थी। इस अध्यादेश ने भारतीयों के अधिकारों को कम कर दिया था।
गांधी जी ने सामूहिक बैठकें कर भेदभावपूर्ण कानूनों के खिलाफ सविनय अवज्ञा को प्रोत्साहित किया। इसके बाद 9 जनवरी 1915 को भारत वापस आने के बाद अहिंसात्मक आंदोलनों के माध्यम से देश को आप्ताह करने की नींव रखी। उन्होंने देश के मजदूर, किसानों, युवाओं और हर वर्ग को अपने आंदोलनों से जोड़ा ताकि एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की जा सके। इसमें 1917 का चंपारण सत्याग्रह, 1918 का खेड़ा सत्याग्रह, 1920 का असहयोग आंदोलन, 1930 में चलाए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन प्रमुख थे। ये सभी आंदोलन सत्य व अहिंसा पर आधारित थे क्योंकि वे जानते थे कि वैचारिक एकजुटता बड़े से बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकती है। वर्तमान में हो रहे हिंसात्मक आंदोलनों के बीच में आर्थिक तौर पर हो रहे प्रतिबंध का जिक्र करना भी जरूरी हो जाता है क्योंकि वैश्विक स्तर पर जिस तरह अमेरिका अपनी बात मनवाने के लिए विकासशील देशों विशेषकर भारत व ब्राजील आदि पर टैरिफ लगा रहा है वो भी चिंतनीय है। इस संदर्भ में गांधी जी का असहयोग आंदोलन का जिक्र करना जरूरी हो जाता है जो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पहला बड़ा पैमाने का जन आंदोलन था जिसमें लोगों ने अंग्रेजों की बनाई गई वस्तुओं, स्कूलों और अदालतों का बहिष्कार किया था। आज भी विरोध इस संदर्भ में किया जा सकता है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी गांधी जी की विचारधारा के अनुसार मेड इन इंडिया को प्रोत्साहित करने पर जोर दे रहे हैं। आज वैश्विक स्तर पर आर्थिक लड़ाई स्वदेशी अभियान के माध्यम से ही लड़ी जा सकती है। लेकिन इस अभियान पर आत्मविश्वास जगाने का काम सरकारों को भी जमीनी स्तर पर व्यावहारिक तरीके से करना होगा। बेशक आपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के स्वदेशी हथियारों की धमक पूरे विश्व ने देखी हो लेकिन फिर भी दोनों देशों के हिंसात्मक अभियान को अहिंसात्मक वैचारिक अभियान के माध्यम से ही सुलझाया जा सकता है। बेशक समय ज्यादा लगे। इस समय विश्व भर में चल रहे हिंसात्मक आंदोलनों एवं लड़ाई को सिर्फ विचार-विमर्श एवं स्वयं आत्मनिर्भरता से ही निपटा जा सकता है, क्योंकि हथियारों के माध्यम से लड़ाइयां उन मुल्कों को तो कतई भी फायदा नहीं पहुंचा सकती, जहां युद्ध हो रहे हैं।
ये लाभ सिर्फ हथियार बनाने एवं बेचने वाले देशों के लिए फायदेमंद हो सकता है। स्कॉटहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च संस्था के मुताबिक रूस व यूक्रेन युद्ध के समय अमेरिका की हथियार बनाने वाली कंपिनयों ने 317 बिलियन का और यूरोप की कंपनियों ने 133 बिलियन व्यापार का लाभ कमाया है। आज चर्चा का विषय यह है कि हिंसा न तो शांति स्थापित कर सकती है और न ही शांति की ओर अग्रसर कर सकती है। अभी हाल के समय में हुए आंदोलन उन देशों को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक तौर पर काफी हानि पहुंचा चुके हैं। फिर सवाल उठता है कि इन देशों के लोगों ने हिंसा से क्या हासिल किया? शायद दूरगामी कुछ भी नहीं। इसलिए जरूरी है कि समाज का हर वर्ग हिंसात्मक मॉडल को छोड़ अहिंसात्मक मार्ग के माध्यम से अपना भविष्य स्वयं तय करे। राष्ट्र दो अक्तूबर को गांधी जी को उनकी जयंती पर नमन करेगा। यह अवसर हमें गांधी जी की शिक्षाओं को व्यवहार में लाने का संदेश देता है। पूरे विश्व में शांति चाहिए तो हमें गांधी जी के मार्ग पर चलना होगा। हिंसा के जरिये हम कोई भी समस्या हल नहीं कर सकते हैं। हिंसा छोडक़र पूरे विश्व को गांधीवादी मार्ग पर चलना होगा, तभी हरेक समस्या का समाधान संभव है। इसी के साथ दो अक्तूबर को ही हम लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती भी मनाते हैं। राष्ट्र उन्हें भी नमन करेगा। अन्न के मामले में आत्मनिर्भर कैसे हुआ जा सकता है, यह हम शास्त्री जी से सीख सकते हैं। 1965 में भारत-पाक लड़ाई के समय शास्त्री जी ने भारत का नेतृत्व बखूबी किया और देश को शत्रु पर विजय दिलाई। इसी कारण पूरा देश उनका अनुसरण करता है।




