छत्तीसगढ़

शहीद वीर नारायण सिंह का बलिदान दिवस आज, अंग्रेजी हुकूमत ने 1857 को रायपुर के बीच चौक में दी थी फांसी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के महान क्रांतिकारी और प्रदेश के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह (Shaheed Veer Narayan Singh) की आज पुण्यतिथि है। 10 दिसंबर 1857 को अंग्रेजों ने रायपुर के बीच चौक (वर्तमान जय स्तंभ चौक) पर उन्हें फांसी दे दी थी। इस दिन को प्रदेशभर में उनके साहस, बगावत और बलिदान को याद करने के लिए मनाया जाता है।

अकाल में अनाज लूटकर ग्रामीणों में बांटा

इतिहासकार बताते हैं कि 1856 में लगातार 3 साल तक लोगों को अकाल का सामना करना पड़ा। इससे इंसान और जानवर दोनों दाने-दाने के लिए तड़प रहे थे। तब नारायण सिंह ने अनाज भंडार से अनाज लूटकर ग्रामीणों में बांटवाया था। सोनाखान इलाके में एक माखन नाम का व्यापारी था, जिसके पास अनाज का बड़ा भंडार था। इस अकाल के समय माखन ने किसानों को उधार में अनाज देने की मांग को ठुकरा दिया। तब ग्रामीणों ने नारायण सिंह से गुहार लगाई। इसके बाद जमींदार नारायण सिंह के नेतृत्व में ग्रामीणों ने व्यापारी माखन के अनाज भंडार के ताले तोड़ दिए और अनाज ग्रामीणों में बांट दिया।

अंग्रेजों ने किया गिरफ्तार, लेकिन किसान छुड़ाकर ले गए

व्यापारी माखन ने इस घटना की शिकायत रायपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट से कर दी। इसके बाद 24 अक्टूबर 1856 को नारायण सिंह को सम्बलपुर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। लेकिन यह गिरफ्तारी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी। संबलपुर के राजा सुरेन्द्रसाय और किसानों की मदद से नारायण सिंह को अंग्रेजों की कैद से बाहर निकाल लिया गया। इससे अंग्रेज प्रशासन भड़क उठा और उन्हें पकड़ने के लिए बड़ी सेना भेजी गई।

अंग्रेजों से लड़ने के लिए बनाई खुद की सेना

नारायण सिंह ने सोनाखान में अंग्रेजी सेना से लड़ने के लिए 900 लोगों की अपनी टुकड़ी तैयार की। कई दिनों तक दोनों पक्षों के बीच संघर्ष चला। लेकिन दुर्भाग्यवश देवरी के जमींदार जो रिश्ते में नारायण सिंह के चाचा थे उन्होंने अंग्रेजों की सहायता की। इसके बाद अंग्रेज अधिकारी स्मिथ ने सोनाखान को चारों तरफ से घेर लिया और नारायण सिंह को पकड़ लिया।

रायपुर के जय स्तंभ चौक पर दी गई फांसी

इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जय स्तंभ चौक में सार्वजनिक रूप से वीर नारायण सिंह को फांसी दे दी। लेकिन उनकी शहादत अंग्रेजों के लिए बड़ा झटका साबित हुई। छत्तीसगढ़ में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी और तेज हो गई। ग्रामीणों और क्रांतिकारियों ने जगह-जगह अंग्रेजी सत्ता का विरोध शुरू कर दिया।

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