सफलता की दौड़ में, कहीं हम अपनी आत्मा न खो दें

जैसे -जैसे भारत त्यौहारों के मौसम में रोशनी से जगमगाता है, बाजार खचाखच भर जाते हैं, इस महंगाई में खरीदारी के थैले जितने भरे जा सकते हैं, उतने भरे होते हैं, घर सज जाते हैं और सामाजिक कार्यक्रमों की फेहरिस्त भर जाती है। दीवाली और उससे जुड़े उत्सव हमारे जीवन में उत्साह, रंग और खुशियां लेकर आते हैं। परिवार मिलते हैं, दोस्त इकट्ठे होते हैं, उपहारों का आदान-प्रदान होता है और लोग साल भर की भागदौड़ के बीच कुछ दिनों के आनंद की प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन रोशनी, खरीदारी और उत्सवों के नीचे एक ऐसा सवाल छिपा है, जो गंभीर ङ्क्षचतन की मांग करता है-क्या हम अपनी संस्कृति और मूल्यों को अपनी युवा पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं, या हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जो नवीनतम अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों के बारे में तो सब जानती है लेकिन उन परंपराओं, कहानियों और सिद्धांतों के बारे में बहुत कम, जिन्होंने भारत को गढ़ा है?
यह आधुनिकता के खिलाफ कोई तर्क नहीं है। यह न तो पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ कोई शिकायत है और न ही युवाओं से दुनिया से मुंह मोड़ लेने का कोई आह्वान है। हमारे युवाओं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी ही होगी। उन्हें नए कौशल सीखने होंगे, तकनीक को अपनाना होगा, अवसरों को तलाशना होगा और महान उपलब्धियां हासिल करने की आकांक्षा रखनी होगी। भारत अपनी युवा पीढ़ी को अतीत में बंधे रहने के लिए कहकर प्रगति नहीं कर सकता। लेकिन जड़ों के बिना प्रगति समाज को अपनी पहचान के प्रति भ्रमित और अपने मूल्यों के प्रति अनिश्चित छोड़ सकती है। आज की दुनिया असाधारण गति से आगे बढ़ रही है। सोशल मीडिया रुझान तय करता है, विज्ञापन इच्छाएं पैदा करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय जीवनशैली को लगातार सफलता के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता है। युवाओं पर एक खास तरह से दिखने, कुछ खास चीजें रखने, फैशनेबल जगहों की यात्रा करने और सार्वजनिक स्वीकृति के लिए अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करने का दबाव है। यहां तक कि त्यौहार, जो कभी परिवारों को साधारण खुशियों में साथ लाते थे, अब उत्सव के पैमाने, उपहारों की कीमत और ऑनलाइन सांझा की जाने वाली तस्वीरों से आंके जाने लगे हैं।
खुशी एक प्रतिस्पर्धा कब बन गई? किसी त्यौहार का महत्व खर्च से कब आंका जाने लगा? और हम दूसरों को यह दिखाने में इतने व्यस्त कब हो गए कि हम कितना अच्छा जीवन जीते हैं, कि हम यह भूलने लगे कि वास्तव में अच्छा जीवन कैसे जिया जाता है? समस्या तब शुरू होती है जब बाहरी दिखावा आंतरिक अर्थ से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। पीढिय़ों से, भारतीय त्यौहार ऐसे सबक देते रहे हैं जो अनुष्ठानों से कहीं आगे जाते हैं। दीवाली हमें याद दिलाती है कि प्रकाश अंधकार पर विजय प्राप्त कर सकता है, अच्छाई मायने रखती है और कठिन समय में भी उम्मीद बची रहनी चाहिए। हमारे त्यौहार उदारता, क्षमा, कृतज्ञता, पारिवारिक एकजुटता और अभावग्रस्त लोगों की मदद करने का महत्व सिखाते हैं। ये मूल्य पुराने नहीं हैं। प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और भौतिक सफलता से प्रेरित दुनिया में इनकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक हो सकती है। एक युवा प्रभावशाली वेतन कमा सकता है, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर सकता है और दुनिया भर की यात्रा कर सकता है। लेकिन उस सफलता का क्या मूल्य यदि परिवार के लिए समय न हो, बुजुर्गों की कोई ङ्क्षचता न हो और संघर्ष करने वालों के प्रति कोई करुणा न हो। यदि हम अपने आस-पास के लोगों और समुदायों के प्रति उदासीन हो जाएं तो विश्व स्तर पर सफल होने का क्या अर्थ है।
फिर भी, संस्कृति केवल भाषणों के माध्यम से जीवित नहीं रह सकती। इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी माता-पिता और दादा-दादी की है। बच्चों को यह पता होना चाहिए कि उनके परिवार त्यौहार क्यों मनाते हैं, उनके रीति-रिवाज क्या दर्शाते हैं और उनकी परंपराएं कैसे विकसित हुई हैं। घर संस्कृति की पहली पाठशाला है। यदि परिवार के सदस्य हमेशा अपने फोन में व्यस्त रहते हैं, यदि बातचीत का स्थान स्क्रीन ले लेती है और यदि त्यौहार खरीदारी के अवसर मात्र बनकर रह जाते हैं, तो हम बच्चों को उन परंपराओं में रुचि खोने के लिए दोष नहीं दे सकते जिनका उन्होंने कभी सार्थक अनुभव ही नहीं किया। स्कूलों को भी युवाओं की उनकी विरासत को समझने में मदद करनी चाहिए। हमें ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो अपनी पहचान को लेकर झिझक महसूस किए बिना दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। साथ ही, संस्कृति को सहेजने का अर्थ हर परंपरा को बिना सोचे-समझे स्वीकार करना नहीं है। भारत को उन प्रथाओं को खारिज करना जारी रखना चाहिए, जो भेदभाव, असमानता या अनादर को बढ़ावा देती हैं। हमारी विरासत तब सबसे मजबूत होती है, जब इसके सबसे उत्कृष्ट मूल्य-मानव गरिमा, निष्पक्षता, दयालुता और पारस्परिक सम्मान-हमारा मार्गदर्शन करते हैं। संस्कृति को स्वतंत्र विचार को प्रोत्साहित करना चाहिए, उसका दमन नहीं।
इस त्यौहारी मौसम में, हमें उन लोगों को भी याद रखना चाहिए जो महंगे उत्सवों का खर्च नहीं उठा सकते। किसी संघर्षरत परिवार के प्रति थोड़ी सी उदारता, किसी बुजुर्ग पड़ोसी के प्रति एक विचारशील भाव या किसी स्थानीय कारीगर को समर्थन देना, किसी त्यौहार को एक और महंगी खरीदारी की तुलना में कहीं अधिक गहरा अर्थ दे सकता है। उत्सव की सच्ची भावना केवल इसमें नहीं है कि हम क्या पाते हैं, बल्कि इसमें है कि हम क्या सांझा करते हैं। भारत बदल रहा है और इसके युवाओं को भी इसके साथ बदलना होगा। उन्हें सवाल पूछने, नवाचार करने, यात्रा करने, सपने देखने और सफल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। लेकिन उन्हें यह भी समझना चाहिए कि किसी व्यक्ति की पहचान उन ब्रांडों से नहीं बनती जो वे पहनते हैं, उन देशों से नहीं बनती जहां वे जाते हैं या उन लोगों की संख्या से नहीं बनती जो उन्हें ऑनलाइन फॉलो करते हैं, यह उनके चरित्र, उनके रिश्तों और उन मूल्यों से आकार लेती है, जिनका वे तब पालन करते हैं, जब उन्हें कोई नहीं देख रहा होता।
जैसे ही इस त्यौहारी मौसम में दीप जलाए जाएं, आइए हम खुद से पूछें कि हम अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं। क्या हम उन्हें केवल भौतिक आकांक्षाएं दे रहे हैं, या हम उन्हें अपनेपन का अहसास भी दे रहे हैं? क्या हम उन्हें केवल आजीविका कमाने के लिए तैयार कर रहे हैं, या उन्हें गरिमा और उद्देश्य के साथ जीना सिखाने में मदद कर रहे हैं?हमारे युवाओं को दुनिया जीतने दीजिए लेकिन इस प्रक्रिया में उन्हें खुद को न खोने दें। वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का विवेक लेकर आगे बढ़ें। क्योंकि सबसे बड़ी उपलब्धि केवल बदलती दुनिया में सफल होना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को खोए बिना सफल होना है जो हमें इंसान बनाते हैं।-देवी एम. चेरियन




