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समावेशी राजनीति की प्रतिस्पर्धा, किस करवट बैठेगा ‘हाथ’

डॉ. एके वर्मा। बसपा प्रमुख मायावती ने 9 अक्टूबर को कांशीराम के 19वें निर्वाण दिवस पर लखनऊ में महारैली की। उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद से बसपा लगातार हाशिए पर पहुंचती गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी को अपना चुनाव क्षेत्र बनाकर ‘सबका-साथ, सबका-विकास’ मंत्र से दलितों को साथ ले लिया। परिणामस्वरूप प्रदेश की सभी 17 सुरक्षित लोकसभा सीटों पर भाजपा विजयी हुई। इससे भाजपा की दलितों में पैठ गहरी हुई।

सरकार एवं संगठन में दलितों को सम्मानजनक स्थान मिला, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने दलितों में भ्रम फैलाया कि मोदी ‘चार सौ पार’ करके बाबासाहेब आंबेडकर का संविधान बदल देंगे, आरक्षण खत्म कर देंगे, जिससे दलित भाजपा से छिटक कर सपा के साथ हो लिए। ऐसे में मायावती नहीं चाहेंगी कि दलित सपा के साथ जुड़ा रहे। इसीलिए वे दलितों को एकजुट करके बसपा में लौटाना चाहती हैं। क्या ऐसा हो सकेगा? क्या भाजपा और सपा भी दलितों के विकल्प हैं?

सवाल यह भी है कि मायावती के पास दलित लौटें क्यों? 2012 में अखिलेश से हारने के बाद मायावती ने दलितों को मझधार में छोड़ राष्ट्रीय राजनीति को साधने के लिए दिल्ली का रुख कर लिया। 2007 में मायावती सरकार बनने पर दलितों से ज्यादा ब्राह्मणों और मुसलमानों को मंत्रिपरिषद और पार्टी में महत्वपूर्ण पद मिले। दलित ठगे रह गए। ‘अपनी सरकार’ बनने से दलित अस्मिता तो अक्षुण्ण रही, पर उसकी राजनीतिक आकांक्षाएं पूरी न हो सकीं। दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने तिवादी-अस्मितावादी बहिर्वेशी-राजनीति को दरकिनार कर ‘सबका-साथ, सबका-विकास’ की समावेशी राजनीति शुरू की तो दलितों का बड़ा वर्ग खिसक कर भाजपा की ओर चला गया। मायावती ने 2007 में जिस सोशल इंजीनियरिंग से सत्ता प्राप्त की, उसे वे आगे न ले जा सकीं। उनकी सोशल इंजीनियरिंग दलित-ब्राह्मण गठजोड़ न थी, वरन उन्होंने सभी जातियों में बसपा का जनाधार बढ़ाया था। इतने सफल प्रयोग को मायावती संभाल न सकीं?

कभी-कभी मायावती की राजनीतिक परिपक्वता पर संदेह होता है। उन्होंने सामंतवादी मनोवृत्ति से पार्टी चलाई। 2012 चुनावों के पहले उन्होंने बाबूसिंह कुशवाहा और 2017 चुनावों के पहले स्वामी प्रसाद मौर्य को पार्टी से निकाल दिया। यदि निकालना ही था तो चुनावों में उनका प्रयोग करके निकालना था। 2019 लोकसभा चुनावों में अपने धुर-विरोधी अखिलेश यादव से गठबंधन किया। परिणामस्वरूप विधानसभा चुनाव 2022 में बसपा केवल एक सीट जीत सकी और लोकसभा चुनाव 2024 में उसका खाता नहीं खुला।

मायावती पर आरोप लगे कि भाजपा का परोक्ष समर्थन करने हेतु वे पिछले चुनाव सक्रियता से चुनाव नहीं लड़ीं और अपने उत्तराधिकारी आकाश आनंद को 2024 चुनाव प्रचार के दौरान ही अपदस्थ कर वापस बुला लिया कि वे अभी ‘अपरिपक्व’ हैं। इससे संदेह हुआ कि आकाश को हटाने के पीछे कहीं वे भाजपा को लाभ तो नहीं पहुंचाना चाहती थीं, क्योंकि आकाश भाजपा के प्रति अति आक्रामक हो रहे थे और दलित अस्मिता की राजनीति कर रहे थे।

मायावती ने 2007 में सोशल इंजीनियरिंग का जो माडल अपनाया, उससे वे ‘बहुजन-हिताय, बहुजन-सुखाय’ से ‘सर्वजन-हिताय, सर्वजन-सुखाय’ की समावेशी राजनीति तक पहुंचीं थीं और ‘दलित-अस्मिता’ की राजनीति पर नहीं लौट सकती थीं। मायावती माडल से भी सशक्त ‘सबका-साथ, सबका-विकास’ आधारित ‘समावेशी माडल’ मोदी ने बना लिया था। मायावती को उसकी काट नहीं सूझी। 2024 में राहुल-अखिलेश ने संविधान और आरक्षण पर भ्रम फैलाकर ‘पीडीए’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) आधारित आंशिक समावेशी माडल बनाया, जिसका परिणाम उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनावों में दिखा।

भावी राजनीति में समावेशी माडलों की स्पर्धा देखने को मिलेगी। कौन पार्टी समाज के कितने घटकों को आकर्षित कर पाती है, यही उसकी चुनावी सफलता-असफलता को तय करेगा। हालांकि मोदी ने इसमें नया आयाम जोड़ दिया है। वे जातीय अस्मिता को वर्ग-अस्मिता तक ले गए हैं। ऐसा नहीं कि भाजपा टिकट वितरण या पद आवंटन में जातियों की अनदेखी करेगी, लेकिन उसने सभी जातियों-धर्मों को वर्गों में समेट दिया है जैसे-महिला, युवा, किसान, मजदूर, लाभार्थी और गरीब आदि। फलस्वरूप, भाजपा ने हिंदुत्व और सनातन की छतरी के नीचे सभी धर्मों और जातियों को स्थान दिया है। यह पार्टी के दूरगामी सोच और भावी रणनीति को रेखांकित करता है, जो उसके बढ़ते जनाधार का कारण है।

मायावती की सक्रियता-निष्क्रियता, दोनों ही भाजपा के पक्ष में जाती है। उनकी निष्क्रियता से आरोप लगते कि वे भाजपा को परोक्ष समर्थन दे रही हैं, लेकिन उनकी सक्रियता भी भाजपा के लिए लाभकारी होगी। त्रिकोणीय संघर्ष में बसपा ने 2007 में 30 प्रतिशत पर और सपा ने 2012 में 29 प्रतिशत पर सरकारें बनाईं। लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा ने प्रदेश में खराब प्रदर्शन किया, फिर भी उसका जनाधार 41.67 प्रतिशत बना रहा। ऐसे में यदि मायावती डटकर चुनाव लड़ीं, तो वे चुनाव जीते या नहीं, लेकिन उन जाटव-दलितों को अपनी ओर खींच सकती हैं, जो सपा की ओर चले गए थे।

वैसे मायावती के अधिकतर समर्थक जाटव रहे हैं, जबकि वाल्मीकि, पासी, धोबी, कोरी, डोम जैसी गैर-जाटव जातियां प्रायः भाजपा समर्थक रही हैं। फिर 2007 में मायावती को ब्राह्मणों का साथ मिला, जो अब संभव नहीं। जिस प्रकार मोदी-योगी सरकार में दलितों को अनेक लाभ मिले, बाबा साहेब का सम्मान हुआ और उनको राजनीति की मुख्यधारा में लाया गया, उतना उन्हें मायावती की सरकार में भी नसीब नहीं था। अतः दलितों के पास कोई कारण नहीं कि वे मायावती की ओर लौटें। देखना रुचिकर होगा कि क्या मायावती नई पारी दलित-अस्मिता पर शुरू करती हैं या सोशल-इंजीनियरिंग से परिपूर्ण एक नए समावेशी-राजनीतिक-माडल का उद्घोष करती हैं।

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