सरकारी कुरसी पर बुद्ध

झुन्नू लाल इन दिनों भारी परेशानी में थे। तीन दशक से सरकारी नौकरी कर रहे झुन्नू को अब कोई नया निर्णय लेना कठिन हो चला था। पचास पार होने के बाद उनमें कुछ नया करने का साहस भी शेष न था। न नौकरी कर पाने का हौसला बचा था और न छोड़ पाने का। राजधानी में तैनाती थी, पर उनके पैतृक शहर के दफ्तर में भी पद रिक्त था। इच्छा यही थी कि अंतिम दो साल घर के पास निकल जाएं। घर में चार सदस्य थे- एक बूढ़ी मां, जो दूसरों पर निर्भर थीं, एक बीमार पत्नी, जो उन्हीं की तरह सरकारी नौकर थी, एक बेटा, जो किसी शहर में नौकर था, और चौथे स्वयं। विभाग वही था, जिसकी समझ सरकार और अफसरों को उतनी ही थी, जितनी कंगना रणौत को गंभीर राजनीति की। मोबाइल युग के बाद वैसे भी हर आदमी खुद को हर विधा में विशेषज्ञ समझने लगा है। सरकार अक्सर विभागों का मुखिया ऐसे दोयम दर्जे के नौकरशाह को बना देती है, जिसे जब तक काम की समझ आती है, तब तक उसका तबादला हो जाता है। प्रदेश और सरकार मानो एक ही टट्टू पर सवार होकर दिन-दोगुनी रात-चौगुनी प्रगति कर रहे थे। देश और केंद्र सरकार पहले ही तीन टांगों वाले टट्टू पर लुढक़ते-गिरते भाग रही थीं- कभी अमेरिका तो कभी चीन की ओर। विभाग के सचिव, जो प्रदेश सेवा से होते हुए आईएएस बने थे, परिस्थिति से इतने लस्त-पस्त थे कि बिहारी की सतसैया भी उनके हालात का वर्णन करने में असमर्थ होती। आठ विभाग उनके जिम्मे थे। कहने को प्रधान सचिव, पर स्थिति उस प्रधान जैसी थी, जो चुनाव हारने के डर से बदहवास होकर पंचायत के हर टीके में फटा पायजामा डाले घूमता रहता है। कभी सिर पकडक़र एक फाइल देखते, कभी मुंह बिचकाकर दूसरी, कभी होंठ दबाकर तीसरी। मिलने वालों की भीड़ अलग। दोपहर तक उनके अपने ही बारह बज जाते। जब कोई कर्मचारी अपनी समस्या लेकर उनके पास पहुंचता तो उसे सुनना तो दूर, पहले ही झिडक़ देते।
कभी फाइल टेबल से फेंक देते, कभी इतनी बुरी तरह पेश आते कि बेचारा बिना कुछ कहे लौट जाता। सचिव और झुन्नू लाल पुराने परिचित थे। विश्वविद्यालय में सहपाठी थे और भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियानों में कंधे से कंधा मिलाकर नारे लगाए थे। इसी पुराने रिश्ते पर झुन्नू जी को उम्मीद थी कि वह उनकी बात समझेंगे और पैतृक शहर में तैनाती दिला देंगे। निदेशक को पहले ही आवेदन दे चुके थे। निदेशक ने ‘गंभीर’ मुद्रा में सुनकर आवेदन सचिव को भेज दिया। ख़ुद आदेश कर सकते थे, पर जि़म्मेदारी से बचने के लिए फाइल आगे सरका दी। आखिरकार झुन्नू सचिव के कक्ष में पहुंचे। उस समय एक अधिकारी उन्हें किसी फाइल पर ब्रीफ कर रहा था। सचिव अपना चेहरा हथेलियों पर टिकाए ऐसे बैठे थे, मानो गिरती इमारत को बल्लियों से थाम रखा हो। थकान चेहरे से टपक रही थी। झुन्नू लाल को उन पर दया आई, आखिर पुराने साथी जो थे। फाइल निपटने के बाद सचिव ने उन्हें अजनबी की तरह देखा। झुन्नू लाल ने अदब से गुड आफ़्टरनून कहा और आवेदन का जिक़्र किया। इतना सुनते ही सचिव मानो भूकंप में फटते गटर की तरह उफन पड़े। झुन्नू लाल सन्न रह गए। पर कुछ ही क्षण में उन्होंने अपने औपनिवेशिक अहंकार पर काबू पा लिया। अब वे ‘बुद्ध’ बन चुके थे। उनकी पिघले शीशे सी वाणी झुन्नू जी के कानों में उतर रही थी- ‘समस्याएं किसे नहीं होतीं? महात्मा बुद्ध ने अढ़ाई हज़ार साल पहले कहा था कि हर किसी के जीवन में दु:ख है। तुम्हें भी इसे सहज लेना चाहिए। छाती पर तख्ती लटकाकर मत घूमो।’ वह बोलते ही जा रहे थे। झुन्नू लाल चुपचाप उन्हें देखते रहे। उनकी आंखें कह रही थीं- तुम्हारी कुरसी पर बैठा अहंकार बुद्ध का स्वांग भर रहा है। यहां न करुणा है, न शांति, न धैर्य, न सामान्य समझ, है तो सिर्फ कुर्सी का मद। सचिव ने उनकी आंखें पढ़ लीं और सकपकाकर झेंप मिटाने को बोले- ‘आस्क योर डायरेक्टर टू मीट मी।’ झुन्नू लाल कुछ बोले बिना बाहर निकल आए। अब वे बुद्ध की तरह निर्वाण में, सरकारी सेवा से मुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।




