सियाचिन के ‘बाना टॉप’ की खूनी दास्तान: जब एक हिंदुस्तानी शेर ने पाकिस्तानियों को बर्फ में गाड़ दिया!

Siachen’s Bana Post History: सियाचिन के ‘बाना टॉप’ को जीतने वाले बाना सिंह की कहानी वीरता की मिसाल है. उन्होंने 1987 में पाकिस्तान की ‘कायद पोस्ट’ को फतह किया था. 21 हजार फीट की ऊंचाई पर उन्होंने पाकिस्तानी कमांडोज को धूल चटाई थी. राइफल जाम होने के बाद भी उन्होंने ग्रेनेड और संगीनों से जंग जीती. भारत सरकार ने उनके सम्मान में इस चोटी का नाम ‘बाना टॉप’ रख दिया
सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर मौत का तांडव मचा था. पाकिस्तान के कमांडो भारत के लिए नासूर बन चुके थे. तब एक शेर उठा जिसका नाम था बाना सिंह. 21,153 फीट की ऊंचाई पर बाना सिंह ने वो करिश्मा किया जिसकी दुश्मन ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. वहां ऑक्सीजन कम थी. हड्डियां गला देने वाली ठंड थी. लेकिन बाना सिंह का कलेजा फौलाद का बना था. उन्होंने पाकिस्तान के कायद पोस्ट को मलबे में तब्दील कर दिया. इस जीत के बाद उस पोस्ट का नाम बदलकर बाना टॉप कर दिया गया. यह कहानी एक ऐसे परमवीर की है जिसने पाकिस्तानी सेना के गुरूर को बर्फ में दफन कर दिया. आज भी बाना सिंह का नाम सुनकर सरहद पार खौफ की लहर दौड़ जाती है. बाना सिंह ने साबित किया कि भारतीय सेना के सामने कोई भी बाधा टिक नहीं सकती है.
क्या पाकिस्तान का कायद पोस्ट?
जून 1987 का समय था. सियाचिन ग्लेशियर पर हालात बहुत तनावपूर्ण थे. पाकिस्तान ने साल्टोरो रिज की सबसे ऊंची चोटी पर कब्जा कर लिया था. उन्होंने इसका नाम ‘कायद पोस्ट’ रखा था. यह पोस्ट 21,153 फीट की ऊंचाई पर थी. यहां से पाकिस्तानी कमांडो भारतीय सैनिकों की हर हरकत पर नजर रखते थे. भारत के लिए यह पोस्ट जीतना बहुत जरूरी था. इससे पहले ऑपरेशन राजीव के तहत कई कोशिशें हुई थीं. लेकिन ऊंचाई का फायदा उठाकर दुश्मन हमें नुकसान पहुंचा रहा था. सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे और उनके साथी पहले ही शहीद हो चुके थे. भारतीय सेना के लिए यह इज्जत का सवाल बन गया था. तब बाना सिंह को इस मिशन की कमान सौंपी गई.
90 डिग्री की बर्फीली दीवार पर मौत का खेल
बाना सिंह का जन्म 6 जनवरी 1949 को जम्मू में हुआ था. वह 1969 में सेना में भर्ती हुए थे. 26 जून 1987 को उन्हें अंतिम हमले की जिम्मेदारी मिली. बाना सिंह ने वो रास्ता चुना जो नामुमकिन था. उन्होंने 90 डिग्री की सीधी बर्फीली दीवार पर चढ़ने का फैसला किया. चारों तरफ भयंकर बर्फीला तूफान चल रहा था. कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. यही तूफान बाना सिंह के लिए सुरक्षा कवच बन गया. उनके साथ चार और जांबाज सैनिक थे. इनमें चुनी लाल और लक्ष्मण दास भी शामिल थे. ये सभी धीरे-धीरे बर्फ पर रेंग रहे थे. दुश्मन को भनक भी नहीं थी कि मौत उनके सिर पर आ खड़ी हुई है.
राइफल जाम होने के बावजूद दुश्मन का खात्मा
जब बाना सिंह चोटी पर पहुंचे तो एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई. अत्यधिक ठंड के कारण उनकी राइफलें ‘जाम’ हो गई थीं. उनके सामने अत्याधुनिक हथियारों से लैस पाकिस्तानी एसएसजी कमांडो थे. बाना सिंह घबराए नहीं. उन्होंने बंकर की ओर रेंगना शुरू किया. उन्होंने बंकर के झरोखे से ग्रेनेड अंदर फेंक दिया. धमाका जबरदस्त हुआ. इसके बाद बाना सिंह और उनके साथियों ने संगीनों से हमला कर दिया. वहां खूनी ‘हैंड-टू-हैंड’ फाइट शुरू हो गई. भारतीय शेरों का गुस्सा देखकर पाकिस्तानी सैनिक भागने लगे. कुछ तो डर के मारे चोटी से नीचे ही कूद गए. शाम चार बजे तक चोटी पर तिरंगा लहराने लगा.
रिटायरमेंट के बाद मुश्किलों का सामना
बाना सिंह को 26 जनवरी 1988 को ‘परमवीर चक्र’ दिया गया. यह सेना का सबसे बड़ा सम्मान है. लेकिन रिटायरमेंट के बाद उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा. उन्हें जम्मू-कश्मीर सरकार से मिलने वाली पेंशन बहुत कम थी. पंजाब सरकार ने उन्हें लाखों रुपए और जमीन का ऑफर दिया था लेकिन बाना सिंह ने इसे ठुकरा दिया. उन्होंने कहा कि वह अपनी मिट्टी कभी नहीं छोड़ेंगे. वह एक सच्चे देशभक्त हैं. आज भी वह सादगी भरा जीवन जीते हैं. बाना सिंह जैसे हीरो हमारे देश की असली शान हैं. उनके सम्मान में अंडमान के एक द्वीप का नाम ‘बाना आइलैंड’ रखा गया है. यह फैसला प्रधानमंत्री मोदी ने साल 2023 में लिया था.




