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सोमनाथ को ध्वस्त करने आए मजहबी आततायी, आज इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं: PM Modi

सोमनाथ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर रविवार को यहां कहा कि नफरत, अत्याचार और आतंक का असली क्रूर इतिहास हमसे छिपाया गया। पीएम मोदी ने कहा कि सोमनाथ मंदिर एक बार नहीं, बार-बार तोड़ा गया। अगर सोमनाथ पर आक्रमण केवल आर्थिक लूट के लिए हुए होते, तो हजार साल पूर्व, पहली बड़ी लूट के बाद रुक गए होते लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सोमनाथ के पवित्र विग्रह को तोड़ा गया। बार-बार मंदिर का स्वरूप बदलने की कोशिशें हुईं और हमें पढ़ाया गया कि सोमनाथ को लूट के लिए तोड़ा गया था। नफरत, अत्याचार और आतंक का असली क्रूर इतिहास, हमसे छिपाया गया।

उन्होंने कहा कि सोमनाथ में विराजमान महादेव, उनका एक नाम मृत्युंजय भी है। मृत्युंजय, जिसने मृत्यु को जीत लिया हो। जो स्वयं काल-स्वरूप है। यतो जायते पाल्यते येन विश्वं, तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम अर्थात ये सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न होती है, उन्हीं में लय हो जाती है। हम मानते हैं त्वमेको जगत् व्यापको विश्व रूप! यानी, शिव पूरे जगत में व्याप्त हैं। इसीलिए, हम कण-कण, कंकड़-कंकड़ में भी उस शंकर को देखते हैं। फिर, कोई उन शंकर के कितने स्वरूपों को नष्ट कर सकता था? हम तो वो लोग हैं जो जीव में भी शिव को देखते हैं! उनसे हमारी आस्था को कोई कैसे डिगा सकता था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि ये समय चक्र है, कि सोमनाथ को ध्वस्त करने की मंशा लेकर आए मजहबी आततायी, आज इतिहास के कुछ पन्नों में सिमटकर रह गए हैं। सोमनाथ मंदिर उसी विशाल समंदर के किनारे गगनचुंबी धर्म-ध्वजा को थामे खड़ा है। सोमनाथ का ये शिखर मानो उद्घोष कर रहा है चन्द्रशेखरम् आश्रये मम किं करिष्यति वै यमः अर्थात मैं चंद्रशेखर शिव पर आश्रित हूं, काल भी मेरा क्या कर लेगा। उन्होंने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व इतिहास के गौरव का पर्व तो है ही, ये एक कालातीत यात्रा को भविष्य के लिए जीवंत बनाने का माध्यम भी है। हमें इस अवसर को अपने अस्तित्व और पहचान को सशक्त करने के लिए उपयोग करना है। आप भी देखते हैं, अगर कहीं किसी देश के पास कुछ सौ साल पुरानी विरासत होती है, वो देश उसे अपनी पहचान बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है।

वहीं भारत के पास सोमनाथ जैसे हजारों साल पुराने पुण्य स्थान हैं। ये स्थान हमारी सामर्थ्य, प्रतिरोध और परंपरा के पर्याय रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद गुलामी की मानसिकता वाले लोगों ने उनसे पल्ला झाड़ने की कोशिश की। उस इतिहास को भुलाने के कुत्सित प्रयास हुये। हम जानते हैं, सोमनाथ की रक्षा के लिए देश ने कैसे-कैसे बलिदान दिये थे। रावल कान्हड़देव जैसे शासकों के प्रयास, वीर हमीरजी गोहिल का पराक्रम, वेगड़ा भील का शौर्य, ऐसे कितने ही नायकों का इतिहास सोमनाथ मंदिर से जुड़ा है लेकिन दुर्भाग्य से इन्हें कभी उतना महत्व नहीं दिया गया। बल्कि, आक्रमण के इतिहास को भी कुछ इतिहासकारों और राजनेताओं द्वारा ‘व्हाइट वॉश’ करने की कोशिश की गई। मजहबी उन्माद की मानसिकता को केवल साधारण लूट बताकर ढंकने के लिए किताबें लिखी गईं।

सोमनाथ मंदिर एक बार नहीं, बार-बार तोड़ा गया। अगर सोमनाथ पर आक्रमण केवल आर्थिक लूट के लिए हुए होते, तो हजार साल पूर्व, पहली बड़ी लूट के बाद रुक गए होते। ऐसा लेकिन नहीं हुआ। सोमनाथ के पवित्र विग्रह को तोड़ा गया। बार-बार मंदिर का स्वरूप बदलने की कोशिशें हुईं और हमें पढ़ाया गया कि सोमनाथ को लूट के लिए तोड़ा गया था। नफरत, अत्याचार और आतंक का असली क्रूर इतिहास, हमसे छिपाया गया।

अपने धर्म के प्रति ईमानदार कोई भी व्यक्ति ऐसी कट्टरपंथी सोच का समर्थन नहीं करेगा लेकिन, तुष्टीकरण के ठेकेदारों ने हमेशा इस कट्टरपंथी सोच के आगे घुटने टेके। जब भारत गुलामी की बेड़ियों से मुक्त हुआ, तब सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की शपथ ली, तो उन्हें भी रोकने की कोशिश की गई। वर्ष 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के यहां आने पर भी आपत्ति जताई गई।

गौरतलब है कि उस समय सौराष्ट्र के सर्वाधिक मशहूर हमारे जाम साहब महाराजा दिग्विजय सिंह आगे आए थे। भूमि अधिग्रहण से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक, उन्होंने राष्ट्रीय गौरव को सबसे ऊपर रखा था। उस दौर में सोमनाथ मंदिर के लिए जाम साहब ने एक लाख रुपए का दान दिया और उन्होंने ट्रस्ट के प्रथम अध्यक्ष के रूप में बड़ी ज़िम्मेदारी निभाई थी ।

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