स्वामी विवेकानंद का युवाओं के लिए संदेश

स्वामी विवेकानंद का युवाओं को स्पष्ट संदेश था कि, उन्हें निडर, आत्मविश्वासी और साहसी बनने, हर काम पूरी एकाग्रता लगाकर करने, समाज के कमजोर वर्गों की सेवा करने और अपने अंदर की दिव्य शक्ति को पहचान कर देश के उत्थान के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करने के लिए आगे आना चाहिए, ताकि वे श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर सकें…
भारत अपने युवाओं की ऊर्जा, सपनों और शक्ति का उत्सव राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में प्रत्येक वर्ष मनाता है। इस दिन को स्वामी विवेकानंद की जयंती की स्मृति में मनाया जाता है, जो हमें याद दिलाता है कि भारत का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में सुरक्षित है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब राष्ट्र ने करवट बदली, युवाओं ने ही परिवर्तन की मशाल थामी है। विवेकानंद केवल एक संत या दार्शनिक नहीं थे, वे युवाओं के भीतर सोई हुई शक्ति को जगाने वाले युगद्रष्टा थे। उन्होंने भारत को आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया था। स्वामी विवेकानंद ने पूरे भारतवर्ष का भ्रमण कर देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थितियों को गहराई से समझा। 1893 में शिकागो धर्म संसद में उनका ओजस्वी उद्बोधन भारत की आध्यात्मिक शक्ति का वैश्विक उद्घोष था। वे वेद, उपनिषद, पुराण, दर्शन और साहित्य के गहन ज्ञाता थे, किंतु उनकी दृष्टि केवल अध्यात्म तक सीमित नहीं थी। वे चरित्र निर्माण, कर्मयोग और राष्ट्र सेवा को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते थे। उनका स्पष्ट मत था कि यदि भारत को जागृत करना है तो उसकी युवा शक्ति पर भरोसा करना होगा। विवेकानंद चाहते थे कि युवा अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलें, आत्मकेंद्रित जीवन से ऊपर उठें और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं।
उनकी यह आकांक्षा आज राष्ट्रीय युवा दिवस की भावना में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य बीते सौ वर्षों में अभूतपूर्व रूप से बदल चुका है। विज्ञान और तकनीक के तीव्र विकास ने जीवनशैली, कार्यसंस्कृति और सोच के ढांचे को बदल दिया है। शिक्षा का विस्तार हुआ है, अवसरों के नए द्वार खुले हैं, परंतु इसके साथ-साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं। आज का युवा एक ओर वैश्विक सपनों से जुड़ा है तो दूसरी ओर बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धा और असुरक्षा से जूझ रहा है। बीते दो-तीन दशकों में आर्थिक बदलावों, ब्रांड संस्कृति और उपभोक्तावाद ने युवा मन को गहराई से प्रभावित किया है। मध्यमवर्गीय युवा आज ऊंची आकांक्षाओं और सीमित संसाधनों के द्वंद्व में फंसा है। बड़े शहरों की चकाचौंध, मॉल संस्कृति और आकर्षक पैकेज उसे लुभाते हैं, वहीं पारिवारिक अपेक्षाओं का बोझ भी उसे दबाता है। शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद भी जब रोजगार नहीं मिलता, तो निराशा, कुंठा और हताशा जन्म लेती है। समय पर मंजिल न मिलने से युवा मानसिक तनाव का शिकार हो रहा है। प्रश्न यह है कि इस पीड़ा को समझने और उसका समाधान खोजने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? आज आवश्यकता है कि हम अपने युवाओं को आध्यात्मिक, सामाजिक, शारीरिक और बौद्धिक रूप से मजबूत बनाएं। शिक्षा व्यवस्था की असमानताएं भी युवाओं की चिंता का बड़ा कारण हैं। एक ही राष्ट्र में अनेक शिक्षा प्रणालियां, शिक्षकों की कमी, गुणवत्ता का अभाव और डिग्री के बावजूद बेरोजगारी, ये सभी स्थितियां युवाओं को भीतर से तोड़ती हैं। निजी और सरकारी क्षेत्र में योग्यता के अनुरूप वेतन न मिलना युवा शक्ति का शोषण है। भारत एक युवा देश है और यहां लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है और यही सबसे बड़ी चुनौती भी। वर्ष 2014 में राष्ट्रीय युवा नीति के अंतर्गत युवाओं को सशक्त बनाने और उनकी क्षमताओं के अनुरूप अवसर देने की परिकल्पना की गई थी। किंतु वास्तविकता यह है कि आज भी करोड़ों युवा बेरोजगार हैं।
शिक्षा के अनुपात में रोजगार सृजन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में यदि समय रहते सार्थक हस्तक्षेप न हुआ, तो भटके हुए युवा अपराध और नशे की ओर भी जा सकते हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों से यह तथ्य सामने आया है कि आज का युवा अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित और अपनेपन की कमी महसूस करता है। वह व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है। उसे लगता है कि राजनीति, नौकरशाही, उद्योग और अपराध के गठजोड़ से राष्ट्रीय हित प्रभावित हो रहे हैं। यह असंतोष चेतावनी भी है और अवसर भी, चेतावनी इसलिए कि अनसुना किया गया युवा विद्रोही बन सकता है और अवसर इसलिए कि यदि उसकी ऊर्जा को सही दिशा दी जाए तो वह राष्ट्र को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है। स्वामी विवेकानंद ने एक शताब्दी पूर्व ही चेताया था कि भौतिक प्रगति की अंधी दौड़ में पारिवारिक और सामाजिक मूल्य क्षीण हो रहे हैं। ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’, उनका यह आह्वान आज भी उतना ही सामयिक है। उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत, यह मंत्र आज के युवाओं को आत्मविश्वास और धैर्य देता है। आज की युवा पीढ़ी जाति, धर्म, क्षेत्रवाद और वंशवाद से ऊपर उठकर पारदर्शी शासन, रोजगार, भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था और विकासोन्मुखी नीतियों की पक्षधर है और वह बदलाव चाहती है। आवश्यकता है कि नीति निर्माता और सरकारें युवा मन को समझें, उसकी भागीदारी सुनिश्चित करें और उन्हें नेतृत्व के अवसर दें।
दूरदर्शी, ईमानदार और ऊर्जावान युवाओं को राजनीति और निर्णय प्रक्रिया में स्थान मिलेगा, तभी सशक्त भारत का निर्माण संभव होगा। राष्ट्रीय युवा दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। स्वामी विवेकानंद की जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र का भविष्य युवाओं के चरित्र, चिंतन और कर्म पर निर्भर करता है। जब युवा सशक्त, स्वाभिमानी और राष्ट्र के प्रति समर्पित होगा, तभी भारत एक समर्थ, सबल और समृद्ध राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर स्थापित होगा। स्वामी विवेकानंद का युवाओं को स्पष्ट संदेश था कि, उन्हें निडर, आत्मविश्वासी और साहसी बनने, हर काम पूरी एकाग्रता लगाकर करने, समाज के कमजोर वर्गों की सेवा करने और अपने अंदर की दिव्य शक्ति को पहचान कर देश के उत्थान के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करने के लिए आगे आना चाहिए, ताकि वे ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का निर्माण कर सकें और मानवता की सेवा कर सकें।
अनुज आचार्य




