हादसे रोकने में नाकाम ट्रिपल इंजन सरकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली अनधिकृत अतिक्रमण और अवैध निर्माण से प्रभावित हो रही है। अदालत ने यह भी कहा था कि कई नागरिक एजेंसियां अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन नहीं कर रही हैं। 14 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में अनधिकृत निर्माण से जुड़े पुराने आदेशों और कार्रवाई की व्यवस्था की समीक्षा की। अदालत के समक्ष सीलिंग और अन्य वैधानिक कार्रवाई का मुद्दा भी आया। साफ था कि अवैध निर्माण को लेकर कार्रवाई का तंत्र मौजूद है, लेकिन चुनौती उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। मई 2026 में हाई कोर्ट ने एमसीडी इंजीनियरों पर सवाल उठाए थे। सत्य निकेतन हादसे से कुछ महीने पहले 23 मई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने जोन-ओ में अनधिकृत निर्माण पर बेहद गंभीर टिप्पणी की थी…
दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक पुरानी 5 मंजिला पीजी इमारत ढहने से 7 छात्रों की मौत हो गई है। दिल्ली में 200 से ज्यादा ऐसे हॉस्टल और पीजी खतरनाक स्थिति में पाए गए हैं जिन पर अब प्रशासन द्वारा कार्रवाई की जा रही है। दिल्ली में यह हादसा उस वक्त हुआ है जब ब्रिक्स सम्मेलन की तैयारियां चल रही हैं और एक खास इलाके में बने विश्व स्तरीय भारत मंडपम को इसकी मेजबानी के लिए सजाया-संवारा जा रहा है। बीते कुछ साल में कई अंतरराष्ट्रीय आयोजन कर चुकी इसी दिल्ली में दर्जनों लोग पहले तो पानी में डूबकर, फिर बिल्डिंग में लगी आग में जलकर और अब बिल्डिंग गिर जाने के चलते कुचलकर मर गए हैं। हर बार जांच, कार्रवाई और सुधार जैसे शब्द उछले, लेकिन ये सारे शब्द अगले हादसे के शोर में दब जाने का इंतजार भर करते रह गए। जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर की एक कोचिंग के बेसमेंट में पानी भरने से 3 बच्चों की मौत के बाद भाजपा ने इसके लिए उस वक्त आम आदमी पार्टी शासित दिल्ली महानगर निगम और दिल्ली सरकार को दोषी ठहराया था। दो साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, सत्ता बदल गई है, लेकिन लोग फिर से अप्राकृतिक मौत मरे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में ट्रिपल इंजन की सरकार है। केंद्र में भाजपा गठबंधन, दिल्ली में भाजपा सरकार और दिल्ली महानगर निगम में भी भाजपा का बोर्ड है। इसके बावजूद हादसे दर हादसे हो रहे हैं। भाजपा ने लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनावों और दिल्ली नगर निगम के चुनावों में दावा किया था कि ट्रिपल इंजन की सरकार होने से विकास भी तिगुनी गति से होगा।
विकास तो दूर रहा, दिल्ली हादसों से ही सुरक्षित नहीं है। दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में 3 जून 2026 को एक होटल-कम-रेस्तरां के निचले फ्लोर पर आग में कुल 22 लोगों की जान गई। अगस्त 2023 में ओखला में बिल्डिंग गिरने से 2 लोगों की मौत हो गई थी। सितंबर 2024 में करोल बाग में बिल्डिंग गिरने से 4 लोगों की मौत हुई, जनवरी 2025 में बिल्डिंग गिरने से 5 की मौत हुई, अप्रैल 2025 में मुस्तफाबाद में 3 बच्चों की मौत हुई, मई 2025 में पहाडग़ंज में दीवार गिरने से 3 की मौत हुई, अगस्त 2025 में घर की दीवार गिरने से जैतपुर इलाके के 6 लोग मर गए। इसी साल जुलाई 2026 में रोहिणी सेक्टर 16 में एक बिल्डिंग गिरने से 6 लोगों की और मई 2026 में साकेत में बिल्डिंग गिरने से 6 लोगों की मौत हो गई थी। इसी साल जून के महीने में फायर सेफ्टी विभाग ने बताया था कि उन्हें पिछले 5 महीने में ही बिल्डिंग गिरने से जुड़े 76 घटनाओं के बारे में फोन आए थे। 2025 में 544 और 2024 में कुल 464 हादसे हुए। इन हादसों में सिर्फ 2024 और 2025 में ही 46 लोगों की मौत हो गई। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2022 में इमारत गिरने की 349 घटनाएं हुईं। इनमें 43 लोगों की मौत और 315 लोग घायल हुए। वर्ष 2023 में 371 घटनाओं में 23 लोगों की जान गई और 171 लोग घायल हुए। दिल्ली में कुल कितनी अवैध इमारतें मौजूद हैं, इसका कोई सटीक या आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। दिल्ली के एक बड़े हिस्से में अनधिकृत कॉलोनियां और झुग्गी-झोंपडिय़ां फैली हुई हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर बिना वैध नक्शे या नियमों के उल्लंघन के, निर्माण किए गए हैं। हालांकि, नगर निगम और सरकार के हालिया आंकड़े इसकी गंभीरता को दर्शाते हैं। केवल वर्ष 2025 में ही, दिल्ली निगम ने 4766 अनधिकृत इमारतों को बुक (चिन्हित) किया था। इसके अलावा समय-समय पर सैकड़ों निर्माणों को सील और ध्वस्त किया जाता रहा है।
सितंबर 2026 में दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक 5 मंजिला अवैध इमारत गिरने से 6 लोगों की मौत के बाद सरकार ने 4 और 5 मंजिल से ऊंची सभी अवैध इमारतों को तुरंत सील करने का सख्त आदेश दिया है। मानसून से पहले एमसीडी द्वारा कराए गए सर्वे में करीब 32.55 लाख इमारतों की जांच की जानी थी, जिसमें से 29.94 लाख से अधिक इमारतों की जांच पूरी होने पर शुरुआती तौर पर केवल 27 इमारतों को असुरक्षित घोषित किया गया था, लेकिन इस सर्वे पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं क्योंकि अवैध रूप से बनी बहुमंजिला इमारतें इसमें पूरी तरह उजागर नहीं हो पातीं। दिल्ली में अवैध निर्माण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की निगरानी कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2006 में अदालत की निगरानी समिति बनाई गई थी। इसके बाद कई आदेशों में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई को लेकर निर्देश दिए गए। वर्ष 2017 में निगरानी समिति की शक्तियां बहाल करने और विशेष कार्यबल गठित करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी। इसके बावजूद दिल्ली में अवैध निर्माण की समस्या बनी रही। सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई 2001 के आदेश का हवाला देते हुए 2020 के फैसले में दर्ज किया था कि दिल्ली में अनधिकृत निर्माण बढऩा गंभीर और खतरनाक प्रवृत्ति है। अदालत ने कहा था कि नियमों का पालन नहीं करने वालों में कानून का भय नहीं रह गया है और इसका प्रमुख कारण कानून का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होना है। दो दशक बाद भी यह टिप्पणी प्रासंगिक नजर आती है।
24 मई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली अनधिकृत अतिक्रमण और अवैध निर्माण से प्रभावित हो रही है। अदालत ने यह भी कहा था कि कई नागरिक एजेंसियां अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन नहीं कर रही हैं। 14 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में अनधिकृत निर्माण से जुड़े पुराने आदेशों और कार्रवाई की व्यवस्था की समीक्षा की। अदालत के समक्ष सीलिंग और अन्य वैधानिक कार्रवाई का मुद्दा भी आया। साफ था कि अवैध निर्माण को लेकर कार्रवाई का तंत्र मौजूद है, लेकिन चुनौती उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। मई 2026 में हाई कोर्ट ने एमसीडी इंजीनियरों पर सवाल उठाए थे। सत्य निकेतन हादसे से कुछ महीने पहले 23 मई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने जोन-ओ में अनधिकृत निर्माण पर बेहद गंभीर टिप्पणी की थी। सत्य निकेतन हादसे के बाद पुलिस कार्रवाई और मजिस्ट्रेट जांच के साथ एमसीडी ने भी अवैध इमारतों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हर हादसे के बाद सीलिंग और जांच शुरू करना ही पर्याप्त है। जब सुप्रीम कोर्ट वर्षों पहले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात कह चुका है और दिल्ली हाई कोर्ट हाल तक एमसीडी इंजीनियरों की निगरानी में अनधिकृत निर्माण होने पर सवाल उठा रहा है, तो फिर निर्माण शुरू होने के समय ही उसे रोकने का तंत्र प्रभावी क्यों नहीं हो पाया। सत्य निकेतन हादसा इसी जवाबदेही की अगली परीक्षा है।-योगेंद्र योगी




