संपादकीय

हिंदू मानस की राजनीति

देश के शहर-शहर हिंदू सम्मेलन आयोजित किए गए। उनसे पहले हिंदुओं की प्रभात फेरियां गलियों से गुजरी। आजादी के लंबे 74 सालों के बाद सोमनाथ का संघर्ष, गर्व, गौरव और सनातन का स्वाभिमान भी याद आ गया। सोमनाथ मंदिर ही नहीं, आराध्य महादेव का प्रथम ज्योतिर्लिंग भी है। वहां किसी आयोजन पर किसी को भी आपत्ति नहीं है। बीते 11 साल से अधिक समय से मोदी देश के पीएम हैं। अभी याद क्यों आया कि सोमनाथ का भी कोई स्वाभिमान है। उसके विध्वंस और पुनर्निर्माण का इतिहास 1000 साल पुराना है। देश के प्रथम पीएम की सोच और धर्मनिरपेक्ष राजनीति क्या थी, आज वह बिल्कुल बेमानी और अप्रासंगिक है। फिर पीएम मोदी ने सोमनाथ की आड़ में हिंदुओं की एकजुटता और तुष्टिकरण का मुद्दा उछाल कर हिंदुओं को एक होने का आह्वान क्यों किया। पीएम चुनावों में भी यह मुद्दा उठाते रहे हैं। बीजेपी को फायदा भी मिलता है। क्या मान लिया जाए कि पीएम ने सोमनाथ के बहाने देश का मानस बदलने की राजनीति की है। उनका लक्ष्य है कि 2047 को विकसित हिंदू राष्ट्र घोषित किया जा सके। संविधान और दस्तावेज में बदलाव बाद में भी किया जा सकता है। प्रधानमंत्री ही नहीं, सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी हिंदू एकजुटता का आह्वान किया है। उन्होंने यह भी विश्वास जताया है कि यदि हिंदू एक हो गए, तो आगामी 20-30 सालों में भारत को विश्व गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा उछाला और हिंदू एकजुटता की बात कही। गली-गली, शहर-शहर जो सम्मेलन किए गए हैं, उनमें भी ‘हिंदू एक’ की हुंकार गूंजती रही। हम स्पष्ट कर दें कि हमारा हिंदुत्व से कोई विरोध नहीं है। बेशक भारत में करीब 80 फीसदी हिंदू आबादी है, लेकिन यह ‘हिंदू राष्ट्र’ नहीं है। भारत में मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी, जैन, बौद्ध सरीखे अन्य समुदाय भी हैं।

बेशक इनमें से कुछ समुदाय मानसिक तौर पर खुद को हिंदू मानते और घोषित करते हैं, लेकिन वे हिंदू नहीं हैं। विविधता ही भारत की खूबसूरती है। संघ परिवार को संविधान की नहीं, मानस की चिंता है। यदि सत्ता और संसद में भाजपा की शक्ति बरकरार रही, तो संविधान में कभी भी संशोधन किया जा सकता है, लेकिन हमें यह आसान नहीं लगता। देश के एक और विभाजन का खतरा या संभावनाएं भी मौजूद नहीं हैं, लेकिन देश में आज भी गंभीर समस्याएं हैं जो चिंतित करती हैं। बेशक हम विश्व में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में भारत 216 देशों की सूची में 140 वें स्थान पर है। हमारी प्रति व्यक्ति आय 2.65 लाख रुपए ही है। जिस जापान को हमने पछाड़ा है, उसकी यह आय करीब 30 लाख रुपए है। देश पर 225 लाख रुपए का कर्ज है। बेरोजगारी की दर करीब 7 फीसदी है। जिस इंटर्नशिप योजना की घोषणा बजट में गाजे बाजे के साथ की गई थी, उसका भद्दा सच यह है कि सिर्फ 95 युवाओं को ही ऑफर लेटर दिए गए हैं। 6618 युवाओं ने बीच में ही इंटर्नशिप छोड़ दी। यदि सामाजिक स्तर पर देखें, तो देश में 70 फीसदी से ज्यादा लोग विषाक्त पानी पीने को विवश हैं। ऐसी कई समस्याएं हैं, जो हिंदू-मुसलमान करने से हल नहीं होंगी। बेशक राष्ट्र और धर्म अपनी-अपनी जगह मह्त्वपूर्ण हैं, लेकिन एक राजनीतिक और वैचारिक अभियान के लिए कमोबेश देश की एकता, अखंडता, धर्मनिरपेक्षता की बलि नहीं दी जा सकती। देश में कई खामियां हैं, जिन्हें अर्थव्यवस्था की आड़ में छुपाया नहीं जा सकता। यकीनन अर्थव्यवस्था का विस्तार हमारी अभूतपूर्व सफलता और उपलब्धि है, लेकिन आज भी हम शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट का उतना हिस्सा खर्च नहीं कर पाते, जितना अपेक्षित है। लिहाजा स्कूल और अस्पतालों में जर्जर हालात हैं।

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