दिल्ली

₹5 की थाली के लिए दिल्ली सरकार का नया फरमान

नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली की गलियों में सुबह से ही ₹5 की थाली के लिए लाइन लग जाती है. मजदूर हों या रिक्शा चालक हैं. चाहे फुटपाथ पर सोने वाले लोग हैं सभी की नजर एक सस्ती, भरपेट थाली पर टिकी होती है. लेकिन अब इस थाली तक पहुंचना पहले जैसा आसान नहीं रहेगा. अब सिर्फ भूख नहीं चलेगी. अब पहचान भी दिखानी होगी. आधार कार्ड, रेटिना स्कैन, डिजिटल रिकॉर्ड और तब जाकर मिलेगा ₹5 में खाना. दिल्ली सरकार का यह नया फैसला राजधानी में चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है.

हिंदुस्तान टाइम्स रिपोर्ट के अनुसार सरकार का कहना है यह कदम ‘न्याय’ के लिए है. ताकि कोई एक व्यक्ति कई बार खाना न ले सके. ताकि ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंदों तक योजना पहुंचे. लेकिन सवाल भी उठ रहे हैं. क्या भूख को बायोमेट्रिक में बांधा जा सकता है? क्या किसी गरीब को यह साबित करना होगा कि वह आज पहले नहीं खा चुका? अटल कैंटीन के बाहर लगी नई मशीनें अब सिर्फ खाना नहीं, पहचान भी मांग रही हैं.

क्या है दिल्ली सरकार का नया नियम?

दिल्ली सरकार ने राजधानी के सभी चालू अटल कैंटीनों में रेटिना स्कैनिंग कैमरे लगा दिए हैं. दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) इस पूरी व्यवस्था को लागू कर रहा है. इन स्कैनरों को आधार से जोड़ा गया है. जैसे ही कोई व्यक्ति ₹5 की थाली लेने पहुंचेगा, पहले उसकी आंखों की रेटिना स्कैन होगी. सिस्टम चेक करेगा कि उसने उसी समय-खंड में पहले खाना लिया है या नहीं.

सरकार को रेटिना स्कैन की जरूरत क्यों पड़ी?

सरकार का कहना है कि कई लोग एक ही दिन में अलग-अलग अटल कैंटीन से कई बार खाना खरीद लेते थे. इससे दूसरों को भोजन नहीं मिल पाता था. रेटिना स्कैन और आधार वेरिफिकेशन से यह तय होगा कि एक व्यक्ति एक समय-खंड में सिर्फ एक बार ही खाना ले सके. इससे योजना का लाभ ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा.

क्या अब एक दिन में सिर्फ एक ही बार खाना मिलेगा?

नहीं, यह नियम पूरे दिन के लिए नहीं है. यह ‘मील स्लॉट’ के हिसाब से लागू होगा. यानी अगर किसी ने दोपहर का खाना ले लिया है, तो वह दोबारा दोपहर का खाना नहीं ले पाएगा. लेकिन शाम या रात के खाने के समय वह फिर से ₹5 की थाली ले सकता है.

इस फैसले पर आपत्ति क्यों हो रही है?

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह व्यवस्था गरीबों के साथ अन्याय है. उनका तर्क है कि अटल कैंटीन में मिलने वाला खाना पहले ही सीमित मात्रा में होता है. अगर कोई ज्यादा भूखा है और दूसरी प्लेट चाहता है, तो उसे रोकना योजना की मूल भावना के खिलाफ है. साथ ही आधार और बायोमेट्रिक से जुड़ी निजता की चिंताएं भी उठ रही हैं.

सामाजिक संगठनों की नाराजगी

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस फैसले पर सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि भूख को नियमों और तकनीक में नहीं बांधा जा सकता. कुछ कैंटीन अभी पूरी तरह चालू भी नहीं हैं. ऐसे में यह रोक गरीबों के लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकती है.

  • फिलहाल दिल्ली में 86 अटल कैंटीन चालू हैं. सरकार इस साल 16 और कैंटीन शुरू करने की तैयारी में है. अधिकारियों का कहना है कि नई व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी. फर्जी लाभ रुकेंगे लेकिन कैंटीन के बाहर खड़े लोग अब सिर्फ थाली की कीमत नहीं गिन रहे. वे यह भी सोच रहे हैं कि उनकी आंखें, उनका आधार और उनका डेटा अब खाने की शर्त बन चुका है.
  • ₹5 की थाली अब सिर्फ भोजन नहीं रही. यह तकनीक, नीति और बहस का प्रतीक बन गई है. सवाल यह है कि क्या यह कदम वाकई जरूरतमंदों के लिए राहत बनेगा या उनकी भूख को और जटिल बना देगा.

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