व्यापार

17 बार फेल होकर भी नहीं मानी हार, IIT के इस होनहार ने बना दी 40000 करोड़ रुपये की कंपनी

नई दिल्ली: पत्थर पर पानी की कोई धारा लगातार पड़ती रहे, तो वह पत्थर भी वहां से कट जाता है। ठीक इसी प्रकार अगर कोई इंसान लगातार मेहनत करे, तो उसे सफलता जरूर मिलती है। ऐसा ही कुछ उदाहरण पेश किया अंकुश सचदेवा ने। वह आईआईटी-कानपुर के छात्र रहे लेकिन उनकी कहानी किसी आम आईआईटी की कहानी नहीं है। कंप्यूटर साइंस की डिग्री लेकर भी अंकुश किसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी में नहीं गए। इसके बजाय वह 17 लगातार असफलताओं के चक्र में फंस गए। सालों तक उन्होंने जिस भी आइडिया पर दिल से काम किया सब फेल हो गए। इनमें ई-कॉमर्स से लेकर यूटिलिटी सर्विस तक शामिल रहे। वह असफलताओं से हार नहीं रहे थे। बल्कि एक ऐसी बड़ी समस्या के करीब पहुंच रहे थे जिसे टेक दुनिया ने नजरअंदाज कर दिया था।

साल 2015 में उन्होंने अपने आईआईटी कानपुर के दोस्तों फरीद अहसान और भानु सिंह के साथ मिलकर काम शुरू किया। उन्होंने देखा कि छोटे शहरों और गांवों में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन वहां उनकी स्थानीय भाषा में कोई ऐप नहीं था। मेनस्ट्रीम प्लेटफॉर्म्स उन्हें आकर्षक नहीं लगते थे। यहां तक कि उनका कंटेंट भी लोगों से जुड़ नहीं पाता था। यही उनका ‘युरेका मोमेंट’ था।

शेयरचैट ने किया धमाल

उन्होंने शेयरचैट (ShareChat) ऐप बनाया। इसकी शुरुआत हिंदी से हुई और फिर यह 15 भारतीय भाषाओं जैसे मलयालम, गुजराती, बंगाली, पंजाबी और कई अन्य भाषाओं में फैल गया। यह सिर्फ एक इंग्लिश ऐप का अनुवाद नहीं था, बल्कि यह एक नया ऐप था जिसमें मजाक, स्थानीय खबरें और गैर-मेट्रो भारत की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी चीजें शामिल थीं।

हजारों करोड़ पहुंची वैल्यूएशन

इसका नतीजा शानदार रहा। शेयरचैट सिर्फ बढ़ा नहीं, बल्कि आग की तरह फैल गया। इसने पंजाब के एक किसान को असम के एक कवि से जोड़ा। इसने मध्य प्रदेश की एक गृहिणी को एक वायरल रेसिपी चैनल दिया। यह लाखों लोगों के लिए डिजिटल नुक्कड़ बन गया, जो अब तक ग्लोबल इंटरनेट के लिए अदृश्य थे। साल 2021 तक इसके 160 मिलियन से ज्यादा एक्टिव यूजर्स थे। इस भारी संख्या के बाद साल 2022 तक इसकी वैल्यूएशन बढ़कर 40,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।


आज बड़ा नाम

आज स्टार्टअप की दुनिया में अंकुश सचदेवा का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। लेकिन उनकी कहानी का सबसे प्रेरणादायक हिस्सा 40,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा नहीं है। यह वो 17 बार की असफलताएं हैं जो इस मुकाम तक पहुंचने से पहले आईं। यह वो खामोश हिम्मत है जिसने हर ‘ना’ को ‘अभी नहीं’ समझा। यह वो सीख है कि रातों-रात सफलता पाने की चाहत रखने वाली दुनिया में, असली असर अक्सर एक-एक ईंट जोड़कर, एक-एक असफलता से सीखकर ही बनता है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि असफलताएं अंत नहीं होतीं, बल्कि नई शुरुआत का रास्ता दिखाती हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button