संपादकीय

500 फीसदी टैरिफ लगा, तो…

अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप ने एक साथ कई मोर्चे खोल लिए हैं। वह क्यूबा, कोलंबिया, ग्रीनलैंड सरीखे छोटे देशों को बंधक बना कर अमरीका के उपनिवेश बनाने पर आमादा हैं, लिहाजा वेनेजुएला की तरह हमले की धमकियां दे रहे हैं। ईरान के चारों ओर भी अमरीकी विमान, युद्धपोत आदि मंडरा रहे हैं, घातक डेल्टा फोर्स को भी तैनात करने की खबरें हैं। हालांकि अमरीका जानता है कि ईरान कमजोर देश नहीं है। ईरान एक सैन्य ताकत है। वह परमाणु सम्पन्न मिसाइलों से अमरीका के वाशिंगटन और न्यूयॉर्क जैसे शहरों पर विनाशक हमले करने में सक्षम है। अमरीकी सीनेट ने बहुमत से राष्ट्रपति टं्रप के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है, जिसके साफ मायने हैं कि अमरीकी संसद की अनुमति के बिना टं्रप किसी भी देश पर हमला नहीं कर सकते अथवा युद्ध में जाने का सेनाओं को आदेश नहीं दे सकते। फिर भी राष्ट्रपति टं्रप दुनिया को अलग-अलग मोर्चों पर धमकाने, हडक़ाने में जुटे हैं। ये अद्र्ध-तानाशाही के संकेत हैं। उन्होंने रूस पर प्रतिबंधों से जुड़े एक बिल को मंजूरी दी है, जो इसी सप्ताह संसद के पटल पर पेश किया जा सकता है। यदि यह बिल पारित हो गया, तो आर्थिक अराजकता का माहौल बनना तय है। बिल में स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं कि जो भी देश रूस से तेल, गैस और अन्य उत्पादों की खरीद करेगा, अमरीका उस पर 500 फीसदी का टैरिफ थोप सकता है। यानी उन देशों का जो भी माल अमरीकी बाजार में आएगा, उस पर 500 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगेगा। राष्ट्रपति टं्रप की कुटिल निगाहें भारत, चीन, ब्राजील पर हैं। भारत ने बीते चार साल में रूस से 1.73 लाख करोड़ रुपए का कच्चा तेल खरीदा है। भारत अब भी अपनी जरूरतों का 30-32 फीसदी तेल रूस से ही खरीदता है।

चीन तो 48 फीसदी तक तेल रूस से खरीदता है। रूस से सबसे अधिक पाइपलाइन गैस की खरीद यूरोपीय संघ के देश करते हैं। अमरीका भी सबसे अधिक यूरेनियम रूस से ही खरीदता है। उन पर प्रतिबंध क्यों नहीं हैं? यूरोपीय देशों पर 500 फीसदी तक के टैरिफ की धमकियां क्यों नहीं दी जातीं? जापान, दक्षिण कोरिया, तुर्किए पर भारत से बहुत कम टैरिफ क्यों है? भारत-अमरीका में जो व्यापार-समझौता होना था, वह इसलिए खटाई में पड़ गया, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति टं्रप को फोन नहीं किया। नतीजतन अमरीका ने इंडोनेशिया, वियतनाम, फिलीपींस के साथ व्यापार-करार कर लिए। अमरीका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक का यह बयान हास्यास्पद लगता है, क्योंकि 2025 में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति टं्रप की 8 बार फोन पर बातचीत हुई है। भारत के विदेश मंत्रालय ने इसकी पुष्टि भी की है। बहरहाल मुद्दा 500 फीसदी टैरिफ का है। भारत पर फिलहाल 50 फीसदी टैरिफ चस्पा है, जिसके कारण हमारा निर्यात बहुत प्रभावित हुआ है। हमारी आर्थिक विकास दर, अंतत:, 7 फीसदी से अधिक रहेगी, इसी पर संतुष्ट होना नुकसानदेह है। यदि 500 फीसदी टैरिफ थोप दिया गया, तो अमरीकी बाजार में भारत की औसतन कमीज 5400 रुपए से अधिक की पड़ेगी, जो अभी 1352 रुपए की है। भारत से कपड़े और रेडीमेड वस्त्र का बड़ा हिस्सा अमरीका जाता है।

यदि भारतीय कपड़े इतने महंगे पड़ेंगे, तो खरीददार दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं। इस अकेले उदाहरण से ही समझा जा सकता है कि भारतीय उत्पादन पर कितना असर पड़ेगा और कितनी नौकरियां खत्म होंगी! भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहते हैं, क्योंकि हम सबसे अधिक, गुणवत्तापूर्ण दवाओं का उत्पादन करते हैं। अमरीका हमारी दवाओं का सबसे बड़ा बाजार है। राष्ट्रपति टं्रप ने फार्मा पर भी टैरिफ थोपने की धमकी दी है। इसी तरह टैरिफ बढऩे से भारतीय ऑटो, ऑटो पाट्र्स, आईटी और टेक सेक्टर के निर्यात पर भी असर पड़ेगा और अमरीकी बाजार में हमारी मांग काफी कम हो जाएगी। ऐसी स्थितियों को भांपते हुए भारत को चीन की तरफ देखना पड़ रहा है। यदि चीन के साथ कारोबार को नए सिरे से बढ़ाया जाता है, तो हमें उनकी एप्स और कंपनियों पर से पाबंदियां हटानी पड़ेंगी। चीन भारत में बांध बनाना चाहेगा, आईटी और आधारभूत ढांचे के क्षेत्रों में भी दखल बढ़ाएगा। फिर भारत आत्मनिर्भर कैसे और कब बन पाएगा?

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