राजनीति

फिर कसौटी पर राज्यसभा चुनाव…

फिर वही करवटें और आसमां पे लिखी जाएगी कहानी। एक सफर राज्यसभा की ओर और चंद कदमों के फासले पर राजनीतिक इच्छाशक्ति। हिमाचल पुन: कांग्रेसी सत्ता की कसौटी पर राज्यसभा की सदस्यता में एक नया चेहरा आजमाना चाहेगा। एक नया पड़ाव, नई महत्त्वाकांक्षा और फानूस के नीचे अपने अंधेरों से युद्ध। परिस्थितियां पहले भी गणित के हिसाब से कांग्रेस को अवसर दे चुकी थीं, लेकिन सियासत के खोट ने सत्ता पक्ष की जेब काट डाली थी। तब के छूटे आसमान को इस बार तसल्ली से कांग्रेस छूना चाहेगी। सोलह मार्च तक होने हैं चुनाव, जब वर्तमान सांसद इंदु गोस्वामी की जगह कांग्रेस का कोई पहलवान सामने आएगा। इस बार पहरे में ही दरिया बहेंगे, तू चल तो सही साहिल पे रहेंगे। राज्यसभा की सदस्यता की अहमियत में हिमाचल का सियासी कद अपनी वकालत नहीं कर पाता। इसलिए चेहरे ढूंढती पार्टियां प्रदेश के बाहर से अकसर उम्मीदवार आयात कर लेती हैं। पिछली बार कांग्रेस अभिषेक मनु सिंघवी को हिमाचल के कोटे से राज्यसभा पहुंचाना चाहती थी, लेकिन पार्टी के भीतर ऐसा खेला हुआ कि सारी तिजोरी लुट गई। इस बार किसका नंबर आएगा, यह कहानी फिर से एक नई कहावत बनेगी। क्या केंद्रीय पूल से कांग्रेसी नेताओं की एडजस्टमेंट हिमाचल से होगी या पार्टी हिमाचल से किसी को चिन्हित करेगी। राज्यसभा एक खुला आसमान रहा है, जबकि राष्ट्रीय बहस के पैमानों में सांसदों का बेहतरीन कौशल यहीं देखा जाता है। हिमाचल के बौद्धिक जगत, शिक्षाविद, वकील और अर्थ-शास्त्रियों से खोजा जाए, तो मुद्दों की वकालत में कोई तहरीर निकल आए। हिमाचल के पक्ष को मजबूत करने के लिए राज्यसभा का चुनाव, ऐसी हस्तियां खोज सकता है जो चुनावी प्रणाली की ठेठ परीक्षा से हटकर, विजन के धरातल पर देश को अपना पक्ष बताना चाहते हैं। राज्यसभा की सीटें विशुद्ध राजनीति से हटकर मानी जाती रही हैं।

अब चीखने-चिल्लाने की सोहबत में यहां भी आसमान घट रहा है। राज्यसभा की वोटिंग के बाद 37 नए सांसद जुड़ेंगे। दस राज्यों की खाली सीटों में कांग्रेस के लिए हिमाचल एक बड़ा ठौर होगा। इस साल 72 सीटों पर चुनाव होंगे और इस तरह भाजपा का पलड़ा थोड़ा सा और भारी हो सकता है। मौजूदा राज्यसभा में भाजपा के 103 और एनडीए के 126 सांसद हंै। हिमाचल के बहुत सारे मुद्दे केंद्र में जब्त हैं। बात डबल इंजन की विरासत पर नहीं रुकती, बल्कि हिमाचल के चिरागों को हक की रोशनी चाहिए। आखिर केंद्र की आंखों में आंख डाल कर कौन बात करेगा कि हमें दूर से चिलमन के झरोखों से क्यों देखा गया। अगर शिमला में बजट सत्र आरडीजी से तपा है, तो यही मंसूबे दिल्ली में कब जाहिर होंगे। क्या सत्ता को केंद्रीय सत्ता का राजनीतिक प्रश्रय ही चाहिए या प्रदेश के मसलों को उठाने की ताकत चाहिए। ऐसे में अगर कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर के किसी नेता का सियासी विस्थापन हिमाचल की राज्यसभा सीट से दूर करती है, तो यह राज्य की भुजाओं को ही कमजोर करेगा। कई अनुभव प्राप्त पार्टी के नेता या कांग्रेस की नीतियों के समर्थक मिल जाएंगे, जो राज्य की प्राथमिकताओं को जुबां दे सकते हैं। हालांकि अतीत में हमारे सांसदों ने कोई ऐसा काम नहीं किया कि हम वर्षों से लंबित मामलों में बढ़त हासिल करते। आश्चर्य यह कि हिमाचल के संसाधनों पर राष्ट्रीय स्तर की डकैती का पर्दाफाश न हो सका। सांसद बनते रहे, लेकिन विस्थापितों के मसले ज्यों के त्यों रहे। पंजाब पुनर्गठन की लेनदारियां और न्यायोचित मांगें आज भी सिफर रहीं तो इसलिए कि कोई राजनीति से ऊपर उठ कर यह नहीं कह पाया कि अब ‘शानन परियोजना’ हमारी होनी चाहिए। ऐसे में देखें कांग्रेस का ऊंट किस करवट बैठता है और सियासत के दांव पर भाजपा किस ‘हर्ष महाजन’ का नाम पुन: इस्तेमाल करती है।

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